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यहां पेड़ से छलांग लगाकर लोग देते थे जान, मिले थे सैंकड़ो कंकाल-ये थी परंपरा

Dainikbhaskar.com अक्षय वट और इससे जुड़े मिथ और मान्यताओं के बारे में बताने जा रहा है।

सूर्य प्रकाश त्रिपाठी | Last Modified - Jan 09, 2018, 11:03 AM IST

    • मान्यता है- अक्षय वट वृक्ष के नीचे जो भी इच्छा व्यक्त की जाती थी वो पूरी होती थी।

      इलाहाबाद (यूपी).यहां संगम तट पर लगे माघ महीने में कल्पवासियों और श्रद्धालुओं का जमघट लगा हुआ है। पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रयाग में स्नान के बाद जब तक अक्षय वट का पूजन एवं दर्शन नहीं हो, तब तक लाभ नहीं मिलता है। मुगल सम्राट अकबर के किले के अंदर बने पातालपुरी मंदिर में स्थित अक्षय वट सबसे पुराना मंदिर बताया जाता है।Dainikbhaskar.comअक्षय वट और इससे जुड़े मिथ और मान्यताओं के बारे में बताने जा रहा है।

      अकबर के किले के अंदर बने पातालपुरी मंदिर में स्थित है अक्षय वट

      - यहां के पुजारी अत्रि मुनि गोस्वामी बताते हैं, ''पौराणिक कथाओं के अनुसार जब एक ऋषि ने भगवान नारायण से ईश्वरीय शक्ति दिखाने के लिए कहा था। तब उन्होंने क्षण भर के लिए पूरे संसार को जलमग्न कर दिया था। फिर इस पानी को गायब भी कर दिया था। इस दौरान जब सारी चीजें पानी में समा गई थी, तब अक्षय वट (बरगद का पेड़) का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा था।''

      - आज इस किले का इस्तेमाल भारतीय सेना द्वारा किया जा रहा है। जमीन के नीचे बने इस मंदिर में फेमस अक्षय वट है।
      - इस किले में एक सरस्वती कूप भी बना है। जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं से सरस्वती नदी जाकर गंगा-यमुना में मिलती थी।
      - इसके बारे में कहा जाता है कि मुगलों ने इसे जला दिया था। क्योंकि पहले स्थानीय लोग इसकी पूजा करने के लिए किले में आते थे।
      - मान्यता है कि इस वृक्ष के नीचे जो भी इच्छा व्यक्त की जाती थी वो पूरी होती थी।

      मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग लगा देते थे छलांग
      - यहां के पुजारी अरविंद नाथ बताते हैं, ''अक्षय वट वृक्ष के पास कामकूप नाम का तालाब था। मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग यहां आते थे और वृक्ष पर चढ़कर तालाब में छलांग लगा देते थे।''
      - ''644 ईसा पूर्व में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था। तब कामकूप तालाब मैं इंसानी नरकंकाल देखकर दुखी हो गया था।''
      - ''उसने अपनी किताब में भी इसका जिक्र किया था। उसके जाने के बाद ही मुगल सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया।''
      - ''इस दौरान उसे कामकूट तालाब और अक्षयवट के बारे में पता चला। तब उसने पेड़ को किले के अंदर और तालाब को बंद करवा दिया था।''
      - ''अक्षय वट वृक्ष को अकबर और उसके मातहतों ने कई बार जलाकर और काटकर नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए।''
      - ''हालांकि यह भी कहा जाता है कि अकबर ने ऐसा इसलिए किया कि वो लोगों की जान बचा सके।''


      यहां 3 रात रुके थे भगनान राम-सीता
      - पुजारी प्रयाग नाथ गोस्वामी बताते हैं, ''भगवान राम और सीता ने वन जाते समय इस वट वृक्ष के नीचे तीन रात तक निवास किया था।''
      - ''अकबर के किले के अंदर स्थित पातालपुरी मंदिर में अक्षय वट के अलावा 43 देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित है।''


      अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी
      - इसमें ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित वो शूल टंकेश्वर शिवलिंग भी है, जिस पर मुगल सम्राट अकबर की पत्नी जोधा बाई जलाभिषेक करती थी।
      - शूल टंकेश्वर मंदिर में जलाभिषेक का जल सीधे अक्षय वट वृक्ष की जड़ में जाता है। वहां से जमीन के अंदर से होते हुए सीधे संगम में मिलता है।
      - ऐसी मान्यता है कि अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी भी बहती है। संगम स्नान के बाद अक्षय वट का दर्शन और पूजन यहां वंशवृद्धि से लेकर धन-धान्य की संपूर्णता तक की मनौती पूर्ण होती है।

      प्रयाग नाम के पीछे ये है मान्यता
      - पुजारी अरविंद नाथ के मुताबिक, ''ब्रह्मा जी ने वटवृक्ष के नीचे पहला यज्ञ किया था। इसमें 33 करोड़ देवी-देवताओं का आह्वान किया गया था।''
      - ''यज्ञ समाप्त होने के बाद ही इस नगरी का नाम प्रयाग रखा गया था, जिसमें 'प्र' का अर्थ प्रथम और 'त्याग' का अर्थ यज्ञ से है।

      सीता ने अक्षय वट को दिया था ये आशीर्वाद
      - बताया जाता है, ''जब राजा दशरथ की मृत्यु के बाद पिंड दान की प्रक्रिया आई तो भगवान राम सामान इकट्ठा करने चले गए। उस वक्त देवी सीता अकेली बैठी थी तभी दशरथ जी प्रकट हुए और बोले की भूख लगी है, जल्दी से पिंडदान करो।''
      - ''सीता कुछ नहीं सूझा। उन्होंने अक्षय वट के नीचे बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ के लिए दान किया। उस दौरान उन्होंने ब्राह्मण, तुलसी, गौ, फाल्गुनी नदी और अक्षय वट को पिंडदान से संबंधित दान दक्षिणा दिया।''
      - ''जब राम जी पहुंचे तो सीता ने कहा कि पिंड दान हो गया। दोबारा दक्षिणा पाने के लालच में नदी ने झूठ बोल दिया कि कोई पिंड दान नहीं किया है।''
      - ''लेकिन अक्षय वट ने झूठ नहीं बोला और रामचंद्र की मुद्रा रूपी दक्षिणा को दिखाया। इसपर सीता जी ने प्रसन्न होकर अक्षय वट को आशीर्वाद दिया।''
      - ''कहा कि संगम स्नान करने के बाद जो कोई अक्षय वट का पूजन और दर्शन करेगा। उसी को संगम स्नान का फल मिलेगा अन्यथा संगम स्नान निरर्थक हो जाएगा।''

      पातालपुरी मंदिर में है 43 देवी-देवताओं की मूर्ति
      - पातालपुरी मंदिर के अंदर अक्षयवट, धर्मराज, अन्नपूर्णा विष्णु भगवान, लक्ष्मी जी, श्री गणेश गौरी, शंकर महादेव, दुर्वासा ऋषि बाल्मीकि, प्रयागराज, बैद्यनाथ, कार्तिक स्वामी, सती अनुसुइया, वरुण देव, दंड पांडे महादेव काल भैरव ललिता देवी, गंगा जी, जमुना जी, सरस्वती देवी, नरसिंह भगवान, सूर्यनारायण, जामवंत, गुरु दत्तात्रेय, बाणगंगा, सत्यनारायण, शनि देव, मार्कंडेय ऋषि, गुप्त दान, शूल टंकेश्वर महादेव, देवी पार्वती, वेणी माधव, कुबेर भंडारी, आरसनाथ-पारसनाथ, संकट मोचन हनुमान जी, कोटेश्वर महादेव, राम- लक्ष्मण सीता, नागवासुकी दूधनाथ, यमराज, सिद्धिविनायक एवं सूर्य देव की मूर्ति स्थापित है।

      प्रयाग में स्नान के बाद जब तक अक्षय वट का पूजन एवं दर्शन नहीं किया जाता, तब तक किसी भी श्रद्धालु को पुण्य लाभ नहीं मिलेगा।
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      अक्षय वट वृक्ष के पास कामकूप नाम का तालाब था। मोक्ष प्राप्ति के लिए आते थे लोग और वृक्ष पर चढ़कर छलांग लगा देते थे।
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      ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित शूल टंकेश्वर शिवलिंग भी है, जिसपर मुगल सम्राट अकबर की पत्नी जोधाबाई जलाभिषेक करती थी।
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      कामकूप तालाब में इंसानी नरकंकाल देखकर हैरान हो गया था। उसके जाने के बाद मुगल सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया।
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      आज भी अक्षय वट मंदिर के बाहर प्रमाण प्रति लगी है।
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