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900 सालों से इस मंदिर में बिना सिर वाली मूर्तियों की होती है पूजा, ये है वजह

प्रतापगढ़ के गोंडे गांव में बने 900 साल पुराने अष्टभुजा धाम मंदिर की मूर्तियों के सिर औरंगजेब ने कटवा दिए थे।

Dainik Bhaskar

Jan 26, 2018, 06:15 PM IST
Special Story on ashtabhuja dham mandir in Pratapgarh

लखनऊ. DainikBhaskar.com की 'शानदार Inडिया' सीरीज में आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे मंदिर के बारे में, जहां देवी-देवताओं की ज्यादातर मूर्तियों पर सिर ही नहीं है। वैसे तो लोग खंडित मूर्तियों की पूजा नहीं करते हैं, लेकिन यहां इन मूर्तियों को 900 सालों से संरक्षित किया जा रहा है और इनकी पूजा भी की जाती है। औरंगजेब ने कटवा दिए थे मूर्तियों के सिर...

- बता दें कि राजधानी से 170 किमी दूर प्रतापगढ़ के गोंडे गांव में बने 900 साल पुराने अष्टभुजा धाम मंदिर की मूर्तियों के सिर औरंगजेब ने कटवा दिए थे। शीर्ष खंडित ये मूर्तियां आज भी उसी स्थिति में इस मंदिर में संरक्षित की गई हैं।

औरंगजेब ने दिया था ये आदेश

- ASI के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, मुगल शासक औरंगजेब ने 1699 ई. में हिन्दू मंदिरों को तोड़ने का आदेश दिया था।

- उस समय इसे बचाने के लिए यहां के पुजारी ने मंदिर का मुख्य द्वार मस्जिद के आकार में बनवा दिया था, जिससे भ्रम पैदा हो और यह मंदिर टूटने से बच जाए।

आगे की स्लाइड्स में जानें कैसे एक सेनापति की नजर मंदिर के घंटे पर पड़ गई और मूर्तियों के सिर काट दिए गए...

Special Story on ashtabhuja dham mandir in Pratapgarh

घंटे पर पड़ी थी सेनापति की नजर

 

- मुगल सेना इसके सामने से लगभग पूरी निकल गई थी, लेकिन एक सेनापति की नजर मंदिर में टंगे घंटे पर पड़ गई।

 

- फिर सेनापति ने अपने सैनिकों को मंदिर के अंदर जाने के लिए कहा और यहां स्थापित सभी मूर्तियों के सिर काट दिए गए। आज भी इस मंदिर की मूर्तियां वैसी ही हाल में देखने को मिलती हैं।  

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11वीं सदी का है ये मंदिर

 

- मंदिर की दीवारों, नक्काशियां और विभिन्न प्रकार की आकृतियों को देखने के बाद इतिहासकार और पुरातत्वविद इसे 11वीं शताब्दी का बना हुआ मानते हैं।

 

- गजेटियर के मुताबिक, इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी क्षत्रिय घराने के राजा ने करवाया था।

 

- मंदिर के गेट पर बनीं आकृतियां मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध खजुराहो मंदिर से काफी मिलती-जुलती हैं।

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अष्टभुजा देवी की मूर्ति हुई चोरी

 

- इस मंदिर में आठ हाथों वाली अष्टभुजा देवी की मूर्ति है। गांव वाले बताते हैं कि पहले इस मंदिर में अष्टभुजा देवी की अष्टधातु की प्राचीन मूर्ति थी। 15 साल पहले वह चोरी हो गई।

 

- इसके बाद सामूहिक सहयोग से ग्रामीणों ने यहां अष्टभुजा देवी की पत्थर की मूर्ति स्थापित करवाई।

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कोई नही पढ़ सका मंदिर में लिखा रहस्य
 
- इस मंदिर के मेन गेट पर एक विशेष भाषा में कुछ लिखा है। यह कौन-सी भाषा है, यह समझने में कई पुरातत्वविद और इतिहासकार फेल हो चुके हैं।

 

- कुछ इतिहासकार इसे ब्राह्मी लिपि बताते हैं तो कुछ उससे भी पुरानी भाषा का, लेकिन यहां क्या लिखा है, यह अब तक कोई नहीं समझ सका।

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क्या कहते हैं मंदिर के पुजारी?
 
- मंदिर के पुजारी रामसजीवन गिरि ने बताया कि इस मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा लगा पाना काफी मुश्किल है। इतिहास में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा से इस मंदिर की हालत बेहद दयनीय हो गई है।

 

- इसके जीर्णोद्धार में ग्रामीण काफी मदद करते हैं, लेकिन इस ऐतहासिक धरोहर को बचने के लिए प्रशासनिक मदद बहुत जरूरी है।

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