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जब शख्स ने जज से पूछा इस हिंदी शब्द की अंग्रेजी, मिला ऐसा जवाब

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 02, 2018, 11:08 AM IST

इस एडवोकेट का कोर्ट रूम में हिंदी भाषा में बहस को लेकर कई जजों से तकरार भी हो चुकी है।
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    सिम्बोलिक इमेज।

    इलाहाबाद. यहां इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक शख्स एेसा है, जो पिछले 54 साल से कोर्ट में हिंदी में बहस और क्रॉस क्वेश्चन करता आ रहा है। क्रिमिनल लॉयर के रूप में फेमस इस एडवोकेट की कोर्ट रूम में हिंदी में बहस को लेकर कई जजों से तकरार भी हो चुकी है। सीनियर एडवोकेट दयाशंकर मिश्रा नेDainikBhaskar.com से बातचीत में कोर्ट रूम के कुछ रोचक किस्से शेयर किए।


    Q- आप कहां के रहने वाले हैं, आपकी शिक्षा-दीक्षा कहां से हुई?
    A- मैं मूल रूप से इलाहाबाद के हंडिया का रहने वाला हूं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी माध्यम से एमए और एलएलबी तक की पढ़ाई की है।


    Q- इलाहाबाद हाईकोर्ट में कब से प्रैक्टिस कर रहे हैं?

    A- 1963 में मैंने एलएलबी एग्जाम पास किया। तभी से प्रैक्टिस करने लगा था, लेकिन रजिस्ट्रेशन साल 1964 में कराया था।

    Q- जज ने कभी आपको बहस के लिए नहीं रोका?

    A- कई बार हिंदी में बहस करने पर जज ने टोका, तो मैंने उनसे कह दिया कि अगर आपको मेरी और राष्ट्र भाषा से दिक्कत है तो केस दूसरी पीठ के सामने भेज दें। मुझे ये बात स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि मैं इंग्ल‍िश नहीं जानता।

    Q- इंग्लिश में बहस न करने की वजह?

    A- किसी भी वकील का अन्नदाता वादकारी होता है। अब वादकारी की भाषा में उसकी बात कोर्ट के समक्ष न रखूं, तो इससे बड़ा कोई दूसरा पाप नहीं हो सकता।

    Q- अब तक कितने मुकदमे लड़ चुके हैं?

    A- आंकड़ा याद नहीं।

    Q- किस प्रकार के क्लाइंट रहे हैं आपके?
    A- डॉ. मुरली मनोहर जोशी, मुंशी जयनारायण से लेकर राजा भैया और अतीक अहमद तक मेरे क्लाइंट रह चुके हैं।

    Q- हिंदी की वजह से कभी किसी क्लाइंट ने नहीं टोका?
    A- बिल्कुल टोका, क्योंकि अधिकांश क्लाइंटों को लगता है कि वकील अगर हिंदी में बहस करता है तो वो कमजोर वकील हैं। लोगों को लगता है कि अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा जानकार होता है।

    Q- कोई यादगार घटना?
    A-हां, एक बार एक बंगाली जस्टिस आए थे। जो हिंदी में बहस करने को लेकर नाराज हो गए थे। जिस पर मैंने उनसे पूछा था कि महोदय हिंदी शब्द 'ऐसी-की-तैसी और चर्र-चर्र' का इंग्लिश में अनुवाद करके मुझे बताएं। जैसे कोई वादी कहता है कि उसके प्रतिवादी ने कहा कि मैं तेरी ऐसी की तैसी कर दूंगा या फिर कोई पेड़ तेज आंधी में चर्र-चर्र करके गिर गया। ऐसे में इनका इंग्लिश अनुवाद क्या होगा। इस पर जज साहब को मैंने लगातार 3 दिन तक टोका, लेकिन वह इसका अंग्रेजी में अनुवाद नहीं बता पाए। आखिरकार मेरी बहस हिंदी में ही सुनी।

    आगे कि स्लाइड में पढ़िए दयाशंकर मिश्रा की कुछ यादगार घटनाओं के बारे में...

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    सीनियर एडवोकेट दयाशंकर मिश्रा क्रिमिनल लॉयर के रूप में प्रसिद्ध हैं। (फाइल)

    Q- आपकी सबसे चर्चित बहस कौन थी?
    A- सबसे चर्चित बहस साल 1973 में पुलिस आंदोलन को लेकर थी। उस समय पुलिस के हेड कांस्टेबल और कांस्टेबलों ने आंदोलन किया था। उस समय पुलिस वालों ने पुलिस परिषद का गठन किया था। जिसमें बवाल हो गया था, कानपुर में बवाल हो गया था और कई लोग मारे भी गए थे। इसमें 169 पीएसी के जवानों को आजीवन कारावास की सजा हुई थी। उस दौरान मैंने पुलिस वालों की तरफ से बहस किया था और 150 जवान बरी हो गए थे। मात्र 6 लोगों को आजीवन कारावास की सजा हुई थी, शेष की मौत हो गई थी।


    Q- कोई दूसरी यादगार बहस?

    A- साल 1984-85 में आपातकाल के दौरान राष्ट्ररीय सुरक्षा अधिनियम के तहत नजरबंद किए गए वीकेएस चौधरी, मुरली मनोहर जोशी और मुंशी जगतनारायण की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर बहस हुई थी। मैने हिंदी में बहस किया था। उस वक्त हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कुंवर बहादुर अस्थाना की अध्यक्षता में पूर्ण पीठ के सामने बहस हुई थी। जिसमें सीजे ने मेरी बहस से प्रभावित होकर हिंदी में फैसला सुनाया था, बाकी पीठ के 4 सदस्य ने अंग्रेजी में फैसला सुनाया। निर्णय लंबा था, इसलिए कहीं प्रकाशित नहीं हुआ। जिसमें निर्णय नजरबंदियों के पक्ष में हुआ था।

    Q- आपका प्रेरणास्त्रोत कौन था? उनसे कब और कहां मिले?
    A- डॉ.राममनोहर लोहिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक बार मैंने उनकी बहस देखी थी, जिसमें वो हिंदी में बहस कर रहे थे। साल 1966 में लोहिया जी हिंदी में बहस कर रहे थे, तब जस्टिस वशिष्ठ भार्गव ने अंग्रेजी में कहा था कि तुम्हारी हिंदी की बहस बेकार है। इस पर लोहिया ने कहा कि जिस प्रदेश की 95 फीसदी जनता अशिक्षित हो, उसकी भाषा आपको समझ में नहीं आती, इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता। अगर आपकी नियुक्ति का अधिकार मेरे पास होता तो आप 48 घंटे में हिंदी के जानकार बन जाते। उसके बाद डॉ. लोहिया ने आधे घंटे तक इंग्लिश में बहस किया तब उन्हीं जस्टिस ने कहा कि आपकी हिंदी मेरे पल्ले नहीं पड़ रही थी और आपकी इंग्लिश मेरे सहयोगी जज के पल्ले नहीं पड़ी रही है।


    Q- समाजवादी आंदोलन की कोई यादगार घटना जो आपके साथ घटी हो?

    A- समाजवादी आंदोलन के दौरान हम लोगों ने नारा दिया था। गांधी लोहिया की अभिलाषा, चले देशी भाषा। अंग्रेजी में काम न होगा, फिर से देश गुलाम न होगा। इसके बाद टाटा-बाटा में कालिख पोता।

    Q- एेसी कोई और घटना, जिससे आप प्रभावित हुए हो?

    A- मेरी हिंदी की बहस से प्रभावित होकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रामवृक्ष मिश्रा ने कहा था कि जितने सशक्त और संवैधानिक तरीके से हिंदी में बहस हो सकती है, अंग्रेजी में कतई नहीं हो सकती है। एक बार दक्षिण भारतीय जस्टिस कलमाजी जगन्नाथ शेट्टी यहां आए थे। उन्होंने जब मेरी बहस सुनी तो कहा कि भद्र पुरुष एक महीने का समय चाहता हूं। एक महीने में हिंदी समझ लूंगा। उसके बाद आपके इस मुकदमे की बहस मैं ही सुनूंगा। उसके बाद उन्होंने हिंदी सीखा और फिर बहस सुनकर निर्णय हिंदी में सुनाया।

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