डॉ. हरिवंश राय बच्चन पुण्यतिथि / पहली बार काव्य पाठ से 101 रुपए मिले थे; कवियों को 'मेहनताना' दिलाने का श्रेय इन्हीं को है

बेटे अमिताभ बच्चन उर्फ मुन्ना और अजिताभ उर्फ बंटी के साथ हरिवंश राय बच्चन। -फाइल बेटे अमिताभ बच्चन उर्फ मुन्ना और अजिताभ उर्फ बंटी के साथ हरिवंश राय बच्चन। -फाइल
प्रयागराज में अमिताभ के साथ पत्नी जया, बेटे अभिषेक, बेटी श्वेता व उनके फुफेरे भाई अनूप रामचन्द्र। -फाइल प्रयागराज में अमिताभ के साथ पत्नी जया, बेटे अभिषेक, बेटी श्वेता व उनके फुफेरे भाई अनूप रामचन्द्र। -फाइल
मुठ्ठीगंज में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन के आवास को जाने वाली गली। मुठ्ठीगंज में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन के आवास को जाने वाली गली।
डॉक्टर बच्चन के आवास का स्वरूप अब बदल चुका है। इसे उन्होंने अपने भतीजे के हाथ बेच दिया था। डॉक्टर बच्चन के आवास का स्वरूप अब बदल चुका है। इसे उन्होंने अपने भतीजे के हाथ बेच दिया था।
भतीजे ने आज भी डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की कुर्सी संजोकर रखी है। भतीजे ने आज भी डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की कुर्सी संजोकर रखी है।
साहित्यकार यश मालवीय ने हरिवंश राय से जुड़े संस्मरणों को साझा किया। साहित्यकार यश मालवीय ने हरिवंश राय से जुड़े संस्मरणों को साझा किया।
X
बेटे अमिताभ बच्चन उर्फ मुन्ना और अजिताभ उर्फ बंटी के साथ हरिवंश राय बच्चन। -फाइलबेटे अमिताभ बच्चन उर्फ मुन्ना और अजिताभ उर्फ बंटी के साथ हरिवंश राय बच्चन। -फाइल
प्रयागराज में अमिताभ के साथ पत्नी जया, बेटे अभिषेक, बेटी श्वेता व उनके फुफेरे भाई अनूप रामचन्द्र। -फाइलप्रयागराज में अमिताभ के साथ पत्नी जया, बेटे अभिषेक, बेटी श्वेता व उनके फुफेरे भाई अनूप रामचन्द्र। -फाइल
मुठ्ठीगंज में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन के आवास को जाने वाली गली।मुठ्ठीगंज में डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन के आवास को जाने वाली गली।
डॉक्टर बच्चन के आवास का स्वरूप अब बदल चुका है। इसे उन्होंने अपने भतीजे के हाथ बेच दिया था।डॉक्टर बच्चन के आवास का स्वरूप अब बदल चुका है। इसे उन्होंने अपने भतीजे के हाथ बेच दिया था।
भतीजे ने आज भी डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की कुर्सी संजोकर रखी है।भतीजे ने आज भी डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की कुर्सी संजोकर रखी है।
साहित्यकार यश मालवीय ने हरिवंश राय से जुड़े संस्मरणों को साझा किया।साहित्यकार यश मालवीय ने हरिवंश राय से जुड़े संस्मरणों को साझा किया।

  • उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में साल 1907 में हुआ था डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का जन्म
  • 1954 में प्रयागराज में कवि सम्मेलन में बिना मेहनताना कविता पाठ करने से मना कर दिया था
  • आयोजक मंडल को माननी पड़ी थी मांग, डॉ. बच्चन के अलावा कई कवियों को मिले थे रुपए
  • 1984 में बेचा था मकान, वह कुर्सी-मेज सहेजकर रखी, जिस पर बैठकर मधुशाला लिखी थी

Dainik Bhaskar

Jan 17, 2020, 02:36 PM IST

प्रयागराज. बैर कराते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला...। डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन का नाम जेहन में आते ही उनकी ये रचना जुबां पर खुद-ब-खुद आने लगती है। बात सात दशक पुरानी है, जब मंचों पर हरिवंश राय अपनी इस काव्य का पाठ करते तो लोग सुध-बुध खो बैठते थे। 1954 में प्रयागराज (इलाहाबाद) में आयोजित कवि सम्मेलन में भरी महफिल में उन्होंने बिना मेहनताना काव्य पाठ करने से मना कर दिया। करीब एक घंटे चली मान-मनौव्वल के बाद आयोजकों को झुकना पड़ा, तब वे काव्य पाठ के लिए तैयार हुए। पहली बार हरिवंश राय बच्चन ने काव्य पाठ से 101 रुपए की कमाई की थी। उन्होंने खुद तो मेहनताना हासिल किया ही अन्य कवियों को भी दिलवाया था। यही से कवियों को उनकी कविता पाठ का मेहनताना देने की परंपरा शुरू हुई, जो अब बदस्तूर जारी है।

टेंट और माइक वाले को मिलता है तो कवियों को क्यों नहीं? 
प्रयागराज के चर्चित कवि यश मालवीय बताते हैं कि बच्चन साहब ने ही कवियों के लिए मानदेय की परंपरा की शुरुआत कराई थी। क्योंकि उससे पहले कवियों का सम्मेलन तो जरूर होता था लेकिन उन्हें कोई पारिश्रमिक नहीं दिया जाता था, सिर्फ मनोरंजन के लिए उपयोग किया जाता था। 1954 में प्रयागराज के पुराने शहर जानसेनगंज में जीरो रोड जाने वाली सड़क पर कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया था। जिसमें डॉ हरिवंश राय बच्चन, गोपीकृष्ण गोपेश, उमाकांत मालवीय सरीखे कई कालजयी कवि बुलाए गए थे। शाम को कार्यक्रम होना था। जिन-जिन कवियों को बुलाया गया था, वह कभी भी मंच पर पहुंच गए थे। उस समय डॉ हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला से लेकर मधुकलश, मधुबाला जैसी काव्य रचनाएं धूम मचा रही थी। इसलिए आयोजकों ने फैसला किया था कि सबसे पहले डॉक्टर बच्चन ही अपनी काव्य रचना सुनाएंगे। सारी तैयारी पूरी थीं। लेकिन आयोजन से ठीक पहले डॉक्टर बच्चन ने काव्य पाठ करने से मना कर दिया। वो बोले, जब आप टेंट वाले, माइक वाले को पैसा देते हो तो कवि को क्यों नहीं?, जबकि कवियों की वजह से ही सारी महफिल सजती है, अन्यथा आयोजन का क्या औचित्य है?

बच्चन को 101, गोपीकृष्ण को 51 और उमाकांत को मिले थे 21 रुपए 
यश मालवीय बताते हैं कि, डॉ. बच्चन के इस निर्णय से आयोजक मंडल अवाक था, लेकिन मंच पर मौजूद कवि डॉ. बच्चन के इस प्रस्ताव से पूर्णतया सहमत थे (लिहाजा किसी ने भी आयोजकों के पक्ष में बात नहीं की) घंटे भर की मान मनौव्वल के बाद जब आयोजक मंडल को लगा कि अब बात नहीं बनने वाली है तो आखिरकार डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन की मांग को स्वीकार किया गया, क्योंकि उनके पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। कवि सम्मेलन खत्म होने के बाद डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन को मेहनताने के रूप में पहली बार आयोजक मंडल ने 101 रुपए दिया था। उनके दोस्त कवि गोपीकृष्ण को 51 रुपए और उमाकांत मालवीय को 21 रूपए का मानदेय दिया गया था। यश मालवीय के मुताबिक इस कवि सम्मेलन में डॉक्टर बच्चन ने अपनी काव्य रचना ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है।' " बच्चे प्रत्याशा में होंगे।" ' नीणों से झांक रहे होंगे,' " ये भाव पंक्षियों पर भाता" सुनाकर स्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी थी।


बच्चा जी की कोठी पर लगता था कवि और साहित्यकारों का जमघट

यश मालवीय बताते हैं कि, हरिवंश राय बच्चन के हृदय में इलाहाबाद बसता था। अपनी आत्मकथा ‘बसेरे से दूर’ में उन्होंने यहां के लोगों को याद भी किया है। यहां उनका दरबार रानीमंडी स्थित बच्चाजी की कोठी पर सजता था। जिसमें धर्मवीर भारती, महादेवी वर्मा, गोपीकृष्ण गोपेश, उमाकांत मालवीय, केशवचंद्र वर्मा, सर्वेश्वर दयाल, जगदीश गुप्त, अज्ञेय जैसे रचनाकार जुटते थे। मैं बाल श्रोता के रूप में उसमें शामिल होता था, कभी-कभी अमिताभ व अजिताभ बच्चन भी उसमें आते थे। इसके अलावा महादेवी के अशोकनगर स्थित आवास पर भी इन लोगों की टीम जुटती थी।

डॉक्टर बच्चन के पिता प्रयागराज में बनाया था आशियाना

27 नवंबर 1907 को हरिवंश राय का जन्म प्रयागराज से सटे प्रतापगढ़ जिले के बाबूपट्टी गांव में हुआ था। पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव और मां सुरसती देवी श्रीवास्तव थीं। पिता प्रताप नारायण ने पहले प्रयागराज के पुराने शहर के चक जीरो रोड पर अपना आशियाना बनाया था। प्रतापगढ़ से आने के बाद वह परिवार सहित यहीं रहते थे। उसके बाद उन्होंने शहर के यमुना किनारे स्थित जमुना क्रिश्चियन कॉलेज के सामने गली में एक 1800 स्क्वॉयर फीट का मकान बनाया था। हरिवंश राय बच्चन ने इसी मकान के एक कमरे में रहकर अपनी पहली काव्य रचना मधुशाला को 1935 में लिखा था। इस मोहल्ले की गलियां आज भी डॉ. बच्चन के यादों की एक चश्मदीद गवाह हैं।

36 साल पहले बेच दिया था 30 हजार रुपए में मकान 
डॉक्टर हरिवंश राय बच्चन ने मुट्ठीगंज स्थित आवास को अपने भांजे रामचंद्र को वर्ष 1984-85 में 30,000 रुपए में बेच दिया था। लेकिन इसके बाद भी हरिवंश राय बच्चन व उनके बेटे अमिताभ बच्चन इस घर को देखने आते रहे। रामचंद्र के चार बेटों के बंटवारे के बाद मकान का पुराना स्वरुप बदल गया है। लेकिन, जिस कमरे में डॉ. हरिवंश राय बच्चन रहते थे, वह कमरा, कुर्सी और मेज आज भी उनके भांजे के पुत्र अनूप रामचंदर ने यादों के रूप में संजो कर रखा है।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना