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यहां जीवित है 78 साल पुरानी परंपरा, समाजिक भेदभाव मिटाने की मिलती है सीख

2 वर्ष पहले
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रामलीला का मंचन करते कलाकार
  • राजा दिल दरियाव सिंह ने शुरू कराई थी रामलीला
  • गांव के हर व्यक्ति का होता है प्रतिनिधित्व
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चित्रकूट. जनपद मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर बिहारा गांव में आजादी से पहले शुरू हुई रामलीला मंचन की परंपरा आज भी जीवित है। गांव के हर तबके के लोग रामलीला में प्रतिनिधित्व करते हैं। लोगों का मानना है कि इस परंपरा से सामाजिक व जातिगत भेदभाव में कमी आई है। इसलिए बाहरी कलाकार या कमेटी भी बुलाई नहीं जाती है। 

 

राजा चौबे दिल दरियाव सिंह ने की थी शुरूआत: आजादी से करीब एक दशक पहले 1940 में गांव के राजा दिल दरियाव सिंह ने रामलीला की शुरुआत की थी। अब उनके नाती बंशी बिहारी चौबे अपने दादा की परंपरा को निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि रामलीला गांव वालों के आपसी सहयोग से ही संपन्न होती है। इसमें गांव के ही लोग विभिन्न पात्रों को निभाते हैं। रामलीला में किसी भी प्रकार का जातिगत भेदभाव नहीं किया जाता। 

 

नई पीढ़ी को गर्व: दलित कलाकार साधू, मुकेश आदि का कहना है कि गांव की इस परंपरा पर उन्हें गर्व है। रामलीला के माध्यम से सभी एकजुट होकर रहते हैं। आधुनिकता से परे पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन व थाप पर रामलीला की जाती है। गांव के युवा जितेंद्र मिश्रा बताते हैं कि कुछ साल उन्होंने भी अपने रामलीला में श्रीराम का पात्र निभाया और ऐसी परंपरा उनके गांव में ही है। इससे गांव की अलग पहचान है। 

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