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कभी इस डकैत से खौफ खाते थे लोग, अब साफ करता है टॉयलेट

बुंदेलखंड के बीहड़ों में कभी सुरेश सर्वोदय के गिरोह का नाम सुन लोग डरते थे।

DainikBhakar.com | Last Modified - Jan 28, 2018, 09:03 AM IST

    • बुंदेलखंड के बीहड़ों में कभी सुरेश सर्वोदय के गिरोह का आंतक था।

      झांसी (यूपी). एक जमाने में बुंदेलखंड के बीहड़ों में सुरेश सर्वोदय के गिरोह का आंतक हुआ करता था। इस गैंग ने अपहरण, हत्या, लूट, डकैती जैसी दर्जनों वारदातों को अंजाम दिया था। आरोप में वह 22 साल तक जेल में रहे। उन्हें 10 साल तक स्पेशल सेल में रखा गया। वहां उनके पैरों में बेड़ियां लगी रहती थी। लेकिन, किताबों ने इनकी जिंदगी बदल दी और सच बोलने लगे। जज के सामने अपना जुर्म कबूल किया तो सुरेश के दिमांग का चेकअप करवाया गया।

      शहीद फिल्म देख बनाया था गिरोह...


      - सुरेश ने बताया, 'मेरा जन्म अगस्त, 1952 में महोबा जिले के सूपा गांव में हुआ था। 12वीं पास करने के बाद मैंने बेईमानों और गरीबों को तंग करने वालों को सबक सिखाने की ठान ली।''
      - ''देश भक्ति पर बनी शहीद फिल्म देखने के बाद मेरे इरादे मजबूत हो गए। युवावस्था में आते-आते मैंने आधा से एक दर्जन सदस्यों का अपना गैंग बना लिया। मेरा गैंग कभी गरीबों, महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को परेशान नहीं करता था।''
      - ''जो भी गरीबों को परेशान करता वह ऐसे ही अमीरों को गैंग लूटता था। एक के बाद एक अनेकों लूटपाट की वारदातों को अंजाम देने लगे। गैंग में सभी के पास हथियार थे। एक अमेरिकन रायफल भी थी।''

      किताब में मिले आइडिया से जेल से हुए फरार
      - ''कई साल तक यूपी और एमपी के बीहड़ में सक्रिय रहने के बीच मेरे ऊपर हत्या, लूट, डकैती, अपहरण के 22 मुकदमे दर्ज हुए। सीबीआई अधिकारी की हत्या के केस में 1973 में मुझे गिरफ्तार किया गया। हमीरपुर जेल में मुझे 'जेल से फरार कैसे हों', जैसी एक किताब मिल गई।''
      - ''इस किताब में मिले आइडिया की मदद से मैं जेल से भाग निकला और गैंग के साथ फिर से सक्रिय हो गया। 1977 में उन्हें दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया। कानपुर जेल में 10 साल तक मैरे पांवों में बेड़ियां पड़ी रहीं।''
      - ''मैं जिस जेल में रहता था कोर्ट भी वहीं लगती थी। जज जेल ही आते थे। मैं 22 साल तक हमीरपुर, महोबा, नैनी (इलाहाबाद), कानपुर, आगरा, झांसी की जेल में रहा। 1999 में मुझे छोड़ दिया गया। औरैया जिले में हत्या का 39 साल पुराना मुकदमा अभी भी चल रहा है।''

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      इस गैंग ने अपहरण, हत्या, लूट, डकैती जैसी दर्जनों वारदातों को अंजाम दिया था।

      जेलर ने गांधी कहकर बुलाया


      - ''जेल में मैंने राधा कृष्णन की 'द डिस्कवरी ऑफ फेथ' पढ़ी। इसके बाद से मेरे मन में पढ़ने का शौक जाग गया। इसके बाद महात्मा गांधी, टॉलस्टॉय, सहित कई लेखकों की किताबों के साथ गीता, कुरआन भी पढ़ा।''
      - ''मैंने जेल में रहने के दौरान सत्य बोलने की ठान ली थी और अपने केस में वकील करने से इनकार कर दिया था। अदालत में पेशी के दौरान जज द्वारा पूछने पर कहा कि आप न्याय करना चाहते हैं। सरकारी वकील भी न्याय चाहते हैं।''
      - ''आप सब न्याय चाहते हैं। मैं भी न्याय चाहता हूं। तो फिर वकील की क्या जरूरत। मैंने उन्हें सब सच बता दिया। उसे समय परिजनों को लगा कि मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। मेरा दो बार मानसिक बीमार होने का दावा कर चेक अप कराया गया।''
      - ''22 साल तक जेल में रहने के बाद परिजनों द्वारा हाईकोर्ट से अपील की गई। इसके बाद मुझे छोड़ दिया गया।''

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      10 साल तक स्पेशल सेल में रखा गया। वहां उनके पैरों में बेड़ियां लगी रहती थी।

      लिखा गया कई लेख

      - हमीरपुर जेल में अधीक्षक रहे पूर्व अपर महानिदेशक कारागार प्रशासन एवं सुधार विभाग एमएल प्रकाश ने सुरेश सर्वोदय को लेकर अखबारों में कई लेख लिखे। उन्होंने कहा, ''जेल में नौकरी के दौरान ऐसा कैदी नहीं देखा। सुरेश जेल में कैदियों को सुधरने को प्रेरित करने लगा था।''
      - ''सफाई करना, हमेशा सच बोलना, जेल में गांधी टोपी लगाना, खादी के कपड़े पहनना उसकी आदत थी। इसे देख उसके पैरों की बेड़ियां कटवा दी थीं। वह उन्हें आधुनिक गांधी बताते हैं। ट्रेन में स्मोकिंग मना करने पर उन्हें कई बार थप्पड़ पड़ चुका है। कोई अगर मारता है तो वह दूसरा गाल आगे कर देते हैं।''

      हिंदी के साथ इंग्लिश में रखते हैं अच्छी पकड़
      - सुरेश जेल से छूटने के बाद गांधीवादी हो गए। कभी हथियारों से लैस रहते वाले अब खादी का कुर्ता, सिर पर गांधी टोपी, झोले में गांधी की किताबें और साफ-सफाई के सामान लिए रहते हैं।
      - वह 12वीं तक पढ़े हैं, लेकिन अंग्रेजी पर अच्छी पकड़ है। ट्रेन में सफर के दौरान कोच में झाड़ू लगाने के साथ ही ट्रेन की टॉयलेट भी रगड़ कर साफ कर देते हैं।​

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    Web Title: Books Change Life Of Dreaded Dacoit In Jhansi
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