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पैसों के लिए बेटी बनी जान की दुश्मन, 85Yr की मां हुई घर छोड़ने को मजबूर

बेला रानी के हसबैंड आचार्य डॉ. केपी भट्टाचार्य एक स्वतंत्रा सेनानी थे।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Feb 22, 2018, 10:56 AM IST

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    फ्रीडम फाइटर की वाइफ बेला रानी

    झांसी. देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानी डॉ. केपी भट्टाचार्या की पत्नी आज वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं। 84 साल की बेला भट्टाचार्या 2 बेटियों और 3 बेटों की मां हैं। लेकिन आज कोई भी बच्चा उनकी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है। अपने बच्चों से लेकर पोते-पोतियों तक को पालने वाली बेला ने अपना दर्द DainikBhaskar.com के साथ साझा किया।

    बेटी ने दीवार में दे मारा था सिर, रोज करती थी मारपीट

    - बेला बताती हैं, "मेरा सबसे बड़ा बेटा दिल्ली में रहता है। उसने नाराज होकर पहले मुझे घर से निकाला। जब मैं अपनी बेटी के घर लखनऊ में रहने आई, तो उसने शुरुआत में तो अच्छा व्यवहार किया, लेकिन धीरे-धीरे वो भी बदलने लगी।"

    - "मेरे पति स्वतंत्रता सेनानी थे। मुझे हर महीने उनकी 1400 रुपए की पेंशन मिलती थी। तीसरे नंबर का बेटा साल 2001 में एक रोड एक्सीडेंट में मारा गया। वो सरकारी नौकरी में था, इसलिए उसके निधन पर 3 लाख रुपए सरकार की तरफ से मिले थे।"

    - "मेरी बेटी की नजर उन पैसों पर थी। वो ही मेरी पासबुक वगैराह रखती थी। एक दिन उसने धोखे से मेरे सिग्नेचर लेकर पूरे तीन लाख रुपए अपने अकाउंट में ट्रांसफर कर लिए।"

    - "जब मुझे बेटी की इस हरकत का पता चला तो मैं उसके खिलाफ कंप्लेंट लिखाने पुलिस स्टेशन चली गई। इस बात से मेरी बेटी चिढ़ गई। जब मैं घर लौटी तो उसने मेरे साथ मारपीट की। मेरा सिर दीवार में दे मारा। फिर उसका मारपीट का सिलसिला हर रोज चलने लगा। तंग आकर मैं उसके घर से भाग गई। पिछले 6 सालों से वृद्धाश्रम में रह रही हूं।"

    हसबैंड थे स्वतंत्रता सेनानी

    - बेला रानी (85) बताती है, ''मेरे हसबैंड आचार्य डॉ. केपी भट्टाचार्या एक स्वतंत्रता सेनानी थे।

    -वह स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में कई बार जेल भी गये थे। सरकार से उन्हें हर महीने पेंशन मिलती थी''।

    - ''मेरे 4 बेटा और एक बेटी थी। सभी को हसबैंड ने अच्छे स्कूल में हायर स्टडीज की पढ़ाई कराई।

    - उसके बाद दौड़ भागकर बेटा शिवेंद्र और बेटी कल्याणी की राजकीय कल्याण निगम में गवर्नमेंट जॉब लगवाई''।

    - ''1990 में हसबैंड और 2001 में थर्ड नंबर के बेटे शिवेन्द्र की रोड एक्सीडेंट कि डेथ हो गई। उसके बाद से 4 बच्चों के साथ ही मैं झांसी के मकान में रहने लगी''।

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    ओल्ड एज होम में हसबैंड की फोटो दिखाती बेला रानी

    पैसों के लिए बच्चों ने ठुकराया

    - बेला बताती है, ''बेटा शिवेंद्र भाई बहनों में तीसरे नम्बर का था। उसकी छोटी बहन कल्याणी भी उसके ऑफिस में साथ काम करती थी''। 31 जून 2001 को शिवेंद्र की डेथ होने पर विभाग से 3 लाख रूपये की सरकारी मदद मिली थी।

    - हसबैंड फ्रीडम फाइटर थे। उन्हें 1345 रूपये हर महीने पेंशन मिलते थे। घर में पैसे को लेने के लिए बच्चों ने आपस में झगड़ना शुरू कर दिया।

    - ''मैं परेशान होकर अपनी शादीशुदा बेटी कल्याणी के पास रहने के लिए आ गई। कुछ दिन तो सब कुछ ठीक रहा लेकिन बाद में मेरी बेटी और पोते ने भी पैसे की मांग शुरू कर दी। मुझें टार्चर किया जाने लगा''।

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    बेला रानी हसबैंड के साथ बच्चे को गोद में लिए हुए

    6 साल पहले छोड़ दिया घर

    - बेला बताती है, ''मेरी बेटी और पोता रोज –रोज पैसे की मांग करते थे। मना करने पर मुझें भूखा रखते थे। मेरे साथ मारपीट करते करते थे''।

    - ''मैंने ये सोचा कि मैं अगर पैसे दे देती हूं तो वे मुझें अच्छे से अपने साथ रखेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बेटी ने मुझसें सिग्नेचर कराकर करीब 3 लाख रूपये अपने एकाउंट में ट्रांसफर करा लिया।

    -पैसे लेने के बाद मुझें और ज्यादा तंग किया जाने लगा। बात –बात पर मेरे साथ मारपीट की जाती थी।

    मैने काफी दिनों तक ये सब बर्दाश्त किया लेकिन जब मारपीट नहीं रुकी तब 6 साल पहले मैंने घर छोड़ दिया''।

    - ''मैं लखनऊ के कुर्सी रोड पर एक ओल्ड एज होम में आकर रहने लगी लेकिन 5 साल तक रहने के बाद में मुझें वहां पर कुछ प्रोब्लम होने लगी। इस कारण मैं मैंने 1 साल पहले उसे छोड़ दिया। मैं सरोजनीनगर के ओल्ड एज होम में आकर रहने लगी। तब से मैं यहीं पर रह रही हूं।

    मुझसें मिलने के लिए घर का अब कोई भी नहीं आता है। बाकी बचे बच्चों ने पहले ही पैसे न देने पर मेरा साथ छोड़ दिया था''।

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    लखनऊ के सरोजनीनगर में बना ओल्ड एज होम

    पराये बने बुढ़ापे का सहारा

    -बेला बताती है, मैं भटक रही थी तब मेरी मुलाकात दिव्य सेवा फाउंडेशन के प्रेसिडेंट दीपक महाजन से हुई। दीपक ने मुझें सरोजनीनगर के एक ओल्ड एज में भर्ती कराया।

    -वह एक बेटे की तरह मेरा ख्याल रखता है। दीपावली हो या होली हर त्योहार वह मेरे साथ ही मनाने के लिए यहां पर मेरे पास आता है। वह मेरे खाने पीने से लेकर दवा का पूरा ख्याल रखता है।

    -ओल्ड एज होम के अंदर मुझें अपनापन महसूस होता है। यहाँ पर केयर टेकर अनुराग दिवेदी और अल्का अपनी मां की तरह मेरी सेवा करते है। यहाँ का पूरा स्टाफ मेरा ख्याल रखता है। मैं अब कभी भी अपने घर वापस नहीं जाना चाहती हूं।

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