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यहां लगता है आशिकों का मेला, मनचाहे लाइफ पार्टनर के लिए मांगते है मन्नत

झांसी. यूपी के बांदा जिले में केन नदी किनारे भूरागढ़ दुर्ग में 'आशिकों का मेला' लगता है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 01, 2018, 10:00 PM IST

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    सिम्बोलिक इमेज।

    झांसी. यूपी के बांदा जिले में केन नदी किनारे भूरागढ़ दुर्ग में 'आशिकों का मेला' लगता है। यहां अपने प्रेम को पाने की चाहत में अपने प्राणों की बलि देने वाले नट महाबली का प्रेम मंदिर है। 14 जनवरी को हजारों प्रेमी जोड़े यहां आकर पूजा-अर्चना कर मन्नत मांगते हैं।

    जब राजा की बेटी को हुआ नौकर से प्यार...

    - मंदिर के पुजारी त्यागी महाराज ने बताया कि मंदिर में विराजमान नटबाबा भले इतिहास में दर्ज न हों, लेकिन बुंदेलियों के दिलों में नटबाबा के बलिदान की छाप हमेशा रहेगी।

    - ये जगह आशिकों के लिए किसी इबादतगाह से कम नहीं है। मकर संक्रांति के मौके पर शादीशुदा जोड़े और सैकड़ों प्रेमी जोड़े यहां मन्नत मांगते हैं।

    - नदी किनारे बसे एक गांव का रहने वाला युवक लोकेंद्र बताता है - 600 साल पहले महोबा जि‍ले के सुगिरा के रहने वाले नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग के किलेदार थे। यहां से कुछ दूर मध्य प्रदेश के सरबई गांव के एक नट जाति का 21 साल बीरन किले में नौकर था।
    - किलेदार की बेटी को बीरन से प्यार हो गया और उसने अपने पिता से शादी की जिद की। इस पर किलेदार नोने अर्जुन सिंह ने बेटी के सामने शर्त रखी कि अगर बीरन नदी के उस पार बांबेश्वर पर्वत से किले तक सूत (कच्चा धागे की रस्सी) पर चढ़कर पार करेगा, तो ही वो शादी कराएंगे।
    - बीरन ने ये शर्त स्वीकार कर ली और खास मकर संक्रांति के दिन सूत पर चढ़कर किले तक जाने लगा। उसने नदी तो पार कर ली, लेकिन जैसे ही भूरागढ़ दुर्ग के पास पहुंचा तो अर्जुन सिंह ने किले की दीवार से बंधे सूत को काट दिया।
    - चट्टान पर गिरकर बीरन की मौत हो गई। किलेदार की बेटी ने जब अपने प्रेमी की मौत देखी, तो वो भी किले से कूद गई और उसी चट्टान पर उसकी भी मौत हो गई।
    - इसके बाद किले के नीचे ही दोनों प्रेमी युगल की समाधि बना दी गई, जो बाद में मंदिर में बदल गई।

    इकतरफा प्‍यार को भी मिलती है मंजिल
    - समाज सेवी आशीष सागर ने बताया - नट जाति के बीरन बाबा बचपन से ही तपस्वी थे और राजा की बेटी के प्रेम में सूत पर चलते हुए नदी पार की थी। लेकिन राजा ने धोखे से रस्सी काट दी, जिससे नटबाबा चट्टान पर गिर पड़े और शरीर त्याग दिया।
    - लेकिन इस स्थान में वो अमर होकर वास करते हैं और उन्हीं के श्राप से आज भी ये किला वीरान पड़ा है। उसके बाद से सिद्ध देवता के रूप में नटमहाबली के दरबार में आए जरूरतमंदों की हर मन्नत पूरी होती है।
    - दीप्ति कहती हैं - यहां मन्नत मांगने पर मनचाहा वर मिलता है। वहीं, रेखा का कहना है कि हर साल यहां मन्नत मांगने पर परीक्षा में सफलता भी मिलती है।

    - इतना ही नहीं, यहां कोई इकतरफा प्रेमी भी अपनी अरदास लेके आता है और अगर उसका प्‍यार सच्‍चा है तो उसे उसका प्‍यार जरूर मिलता है। नटबाबा सिद्ध स्थान होने के साथ प्रेम का प्रतीक भी है।

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    मंदिर में विराजमान नटबाबा प्यार का प्रतीक माने जाते हैं।
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