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इस वजह से दुनिया ध्यानचंद को कहती है हॉकी का जादूगर, हिटलर ने दिया था ऐसा ऑफर

DainikBhaskar.com | Last Modified - Dec 03, 2017, 11:39 AM IST

मेजर ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर हिटलर जर्मन सेना में उन्हें बड़ा ओहदा देना चाहता था।
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    मेजर ध्यानचंद 14 साल की उम्र में ही हॉकी खेलने लगे थे।

    झांसी. देश को 3 ओलिंपिक गोल्ड मेडल जिताने वाले हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की 03 दिसंबर को डेथ एनिवर्सिरी है। DainikBhaskar.com आज आपको इस महान प्लेयर की लाइफ से जुड़े कुछ किस्सों के बारे में बताने जा रहा है। इसके लिए हमने इनके बेटे अशोक ध्यानचंद से बात की।हिटलर अपनी सेना में बड़ा ओहदा देना चाहता था...

    - केंद्रीय कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. सुनील तिवारी ने बताया, बर्लिन ओलिंपिक में शानदार प्रदर्शन के बाद जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी की नागरिकता और सेना में बड़ा ओहदा देने की पेशकश की। हालांकि ध्यानचंद ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
    - मेरज ध्यानचंद ने कई यादगार मैच खेले, लेकिन उनके लिए 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।

    चांद की रोशनी में खेलते थे हॉकी, नाम ध्यान सिंह से पड़ गया ध्यानचंद
    - अशोक ध्यानचंद ने बताया, मेजर ध्यानचंद 14 साल की उम्र में ही हॉकी खेलने लगे थे। पहले उनका नाम ध्यान सिंह था।
    - अक्सर वे चांद की रोशनी में ही हॉकी की प्रैक्टिस करते थे। इससे उनके नाम के पीछे चांद जुड़ गया, जो बाद में ध्यानचंद हो गया।

    शर्त हारने पर कुंदनलाल सहगल ने गाए थे 14 गाने
    - बॉलिवुड एक्टर पृथ्वीराज कपूर ध्यानचंद के बहुत बड़े फैन थे। एक बार मुंबई में हो रहे एक मैच में वो अपने साथ सिंगर कुंदन लाल सहगल को ले आए।
    - मैच के आधे समय तक कोई गोल नहीं हो पाया था। इस पर सहगल ने कहा था, हमने आपका बहुत नाम सुना है। मुझे ताज्जुब है कि आप में से कोई आधे समय तक एक गोल भी नहीं कर पाया।
    - ध्यनाचंद ने हंसते हुए सहगल से कहा था- हम जितने गोल मारेंगे, आप उतने गाने हमें सुनाएंगे?
    - सहगल ने भी हामी भर दी। दूसरे हाफ में ध्यानचंद और उनकी टीम ने मिलकर 12 गोल दागे। लेकिन मैच के आखिरी तक सहगल स्टेडियम छोड़ कर जा चुके थे।
    - दूसरे दिन ध्यानचंद को स्टूडियो में बुलाने के लिए सहगल ने अपनी कार भेजी। लेकिन जब ध्यानचंद्र वहां पहुंचे, तब तक सहगल का गाना गाने का मन नहीं हुआ, जिसपर ध्यानचंद बहुत निराश हुए।
    - लेकिन अगले दिन सहगल खुद उस जगह पहुंचे गए, जहां ध्यानचंद और टीम रुकी हुई थी। सहगल ने खिलाड़‍यों को 14 गाने सुनाए और एक-एक घड़ी गिफ्ट में भी दी।


    विदेशी धरती पर जूते मोजे उतार नंगे पावं खेले थे ध्यानचंद
    - मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक बताते हैं, जर्मनी के बर्लिन के हॉकी स्टेडियम में जर्मनी और भारत के बीच उस ऐतिहासिक मैच को देखने के लिए 40 हजार लोग पहुंचे थे। बड़ौदा के महाराजा और भोपाल की बेगम भी मैच देखने पहुंचे थे।
    - जर्मन खिलाड़ियों ने भारत की तरह छोटे-छोटे पासों से खेलने की तकनीक अपना रखी थी। हाफ टाइम तक भारत सिर्फ एक गोल से आगे था।
    - इसके बाद मेजर ध्यान चंद ने अपने स्पाइक वाले जूते और मोजे उतार दिए और नंगे पांव खेल के मैदान में डट गए। जर्मन खिलाड़ियों की समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है। भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया और इसमें तीन गोल ध्यानचंद ने किए थे।

    लोग समझते थे इनकी हॉकी में लगे है चुंबक
    - मेजर ध्यानचंद के गेम को देखते हुए ऐसी अफवाह उड़ी कि उनकी हॉकी में कहीं चुंबक तो नहीं लगा है, जिससे बॉल हॉकी में चिपक जाती हो।

    - यह जानने के लिए हॉलैंड में लोगों ने उनकी हॉकी स्टिक तुड़वा दी थी, जिसमें अफवाह झूठी निकली थी।

    - इस खिलाड़ी ने किस हद तक अपना लोहा मनवाया होगा, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ऑस्ट्र‍िया की राजधानी वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है, जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं।




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    मेजर ध्यानचंद ने 16 साल की उम्र में ही ब्रिटिश इंडियन आर्मी को ज्वाइन कर लिया था।
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    चांद की रोशनी में ही हॉकी की प्रैक्टिस करते थे। इससे उनके नाम ध्यान सिंह से ध्यानचंद पड़ गया।
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    1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था।
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    बर्लिन ओलिंपिक में शानदार प्रदर्शन के बाद हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी की नागरिकता और सेना में बड़ा ओहदा देने की पेशकश की था।
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