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302Yr पहले जिनके बारे में हुई थी भविष्यवाणी, उस क्वीन के रोल में HIT हुई ये एक्ट्रेस

DainikBhaskar.com झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आपको बताने जा रहा है जिनके रोल से उल्का गुप्ता को पहचान मिली।

राम नरेश यादव | Last Modified - Jan 20, 2018, 01:12 PM IST

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    उल्का गुप्ता ने 11 साल की उम्र में टीवी पर झांसी की रानी बनकर आ चुकी है।

    झांसी (यूपी). टीवी शो 'झांसी की रानी' में मनु का रोल करने वाली एक्ट्रेस उल्का गुप्ता इन दिनों मां पार्वती की भूमिका में नजर आ रहीं हैं। इन्होंने मां पार्वती के रोल के लिए काफी मेहनत की है फिर भी वह उतनी लाइम लाइट में नहीं है जितनी की मनु बनकर लोगों के जेहन में छाई हुई थीं। DainikBhaskar.com उन्हीं वीरांगना झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आपको बताने जा रहा है। जिनके रोल से उल्का गुप्ता को पहचान मिली थी।

    302 साल पहले हुई थी भविष्यवाणी...

    - फ्रांस के महान फिजिशियन रहे नास्त्रेदेमस ने सन् 1555 में झांसी की रानी के लिए भविष्यवाणी की थी। उन्होंने कहा था कि, "अपना साम्राज्य छिनता देख एक महान रानी मर्दाना ढंग से मुकाबला करेगी। वो अकेली घोड़े पर सवार होकर दुश्मनों के सैलाब को पार कर जाएगी। मरते दम तक वह दुश्मनों के बीच तहलका मचाएगी।"

    - लक्ष्मी बाई ने अपने साहस और वीरता से इस भविष्यवाणी को 302 साल बाद 1857 में सच कर दिखाया था। अब इस वीरांगना की जिंदगी पर फिल्म बन रही है।

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    उल्का ने झांसी की रानी का रोल किया था।

    काशी में हुई थी भविष्यवाणी
    - लक्ष्मी बाई का जन्म में काशी (बनारस) में मोरोपंत तांबे और भागीरथी बाई के घर हुआ था। उन्होंने अपनी बेटी का नाम मणिकर्णिका रखा था। जिस पेशवा के दरबार में मोरोपंत तैनात थे, वो मणिकर्णिका को छबीली कहकर बुलाते थे।
    - काशी के विद्वानों ने भी इनके जन्म के साथ ही घोषणा कर दी थी कि मणिकर्णिका नामक यह कन्या राजरानी ही बनेगी। 1842 में काशी के विद्वानों की भविष्यवाणी सच साबित हुई और इनका विवाह झांसी के महाराजा गंगाधर राव से हुआ।
    - गंगाधर राव ने मणिकर्णिका का नाम लक्ष्मी बाई रखा था। दोनों को जल्दी ही एक बेटा हुआ, लेकिन वो जन्म के 3 महीने बाद ही चल बसा। इस गम में राजा की भी मृत्यु हो गई थी।

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    मां पार्वती के रोल के लिए काफी मेहनत की है फिर भी उतनी लाइम लाइट नहीं मिला।

    अंग्रेजों को लक्ष्मीबाई ने ऐसे दी थी शिकस्त

    - गंगाधर के निधन के बाद अंग्रेज खुलकर सामने आ गए थे। उनके फरमान के बाद रानी को किला छोड़ना पड़ा। 28 अप्रैल, 1854 को रानी किला छोड़ सरकारी आवास 'रानी महल' में रहने लगीं। जून, 1857 में विद्रोही सैनिकों ने अंग्रेजों के विरूद्ध झंडा फहराते हुए रानी को अपना नेता घोषित कर दिया।

    - सैनिकों ने 'खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का और हुक्म रानी लक्ष्मीबाई का' का नारा बुलंद किया। रानी के सैनिकों व अंग्रेजों के बीच भीषण युद्ध हुआ और रानी ने इसमें जीत हासिल की। इसके साथ ही रानी ने अंग्रेजों को धूल चटाकर 12 जून, 1857 को एक बार फिर किले पर कब्जा करते हुए झांसी साम्राज्य पर आधिपत्य हासिल कर लिया।

    - 21 मार्च 1858 को ह्यूरोज का झांसी आना हुआ। उसने आते ही झांसी पर हमला कर दिया। लक्ष्मी बाई ने किले के बाहर 500 पठान अंगरक्षकों की सेना के साथ अंग्रेजों का मुकाबला कर रही थीं। अंग्रेजों ने झांसी पर तोप के गोले बरसाए, लेकिन रानी के तोपचियों ने अंग्रेजी सैनिकों को शांत कर दिया।

    - जल्दी ही अंग्रेज झांसी पर हावी हो गए और रानी को पिता मोरोपंत तांबे, कुछ रिश्तेदारों और पठान अंगरक्षकों के साथ झांसी छोड़कर जाना पड़ा। रानी ने झांसी छोड़ते वक्त पुरुष वेश धारण किया कर लिया।

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    रानी लक्ष्मीबाई के रोल से उल्का को पहचान मिली।

    बेटे को पीठ पर बांध किया था युद्ध
    - लक्ष्मी बाई ने बेटे और राजा के निधन के बाद एक बच्चे को गोद लिया था। झांसी छोड़ते वक्त उन्होंने उसे दुपट्टे से अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधा था। रानी भाण्डेरी गेट से होते हुए कालपी की ओर चली गईं और वहां से ग्वालियर पहुंची।
    - रानी ने अंग्रेजों से भीषण युद्ध किया, लेकिन उनके सैनिक मारे गए। फिर भी रानी दुश्मनों का सिर कलम करते हुए आगे बढ़ीं। इस दौरान रानी एक बड़ा नाला पार करने की कोशिश कर ही रहीं थीं, तभी उनकी एक साथी को अंग्रेजों ने घेर लिया।
    - रानी मदद के लिए मुड़ गईं, उन्होंने अपनी महिला सिपाही को बचाया, लेकिन अचानक दुश्मन सेना के सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया। सिर पर तलवार से हुए वार ने उनकी जान चली गई। महान वीरांगना 18 जून, 1857 को वीरगति को प्राप्त हुईं।

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Web Title: Special Story Of Rani Laxmi Bai In Jhansi
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