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पिता बेचते हैं चूड़ी, रेडियो स्टेशन्स में गाने वाला बेटा ऐसे बना नेशनल प्लेयर

शनिवार को ललितपुर में यूपी के राज्यपाल ने जितेंद्र को अच्छे प्रदर्शन के लिए सम्मानित किया।

उज्जवल सिंह | Last Modified - Feb 04, 2018, 02:50 PM IST

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    हाल ही में हुए नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल कॉम्पटीशन में जितेंद्र यूपी की तरफ से खेले थे।

    झांसी.कहते हैं अगर हौसले बुलंद हों तो कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है यूपी के ललितपुर के रहने वाले जितेंद्र पाठक ने। जितेंद्र बचपन से ही दिव्यांग हैं। महज 1 साल की उम्र में वो पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी की चपेट में आ गए थे, तब से उनके दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया। वहीं, शनिवार को ललितपुर में एक कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे यूपी के राज्यपाल ने जितेंद्र को सम्मानित किया। पैसों के अभाव में नहीं मिला स्पोर्ट व्हीलचेयर...

    - बता दें कि हाल ही में हुए नेशनल व्हीलचेयर बास्केटबॉल कॉम्पटीशन में जितेंद्र यूपी टीम से खेल रहे थे, जो सेमीफाइनल तक पहुंची थी। इस दौरान जितेंद्र को पैसों के अभाव में स्पोर्ट व्हीलचेयर नहीं मिल सका। इसके बावजूद भी जितेंद्र ने नॉर्मल व्हीलचेयर से इस कॉम्पटीशन में हिस्सा लिया और शानदार प्रदर्शन किया।

    चूड़ियों की दुकान चलाते हैं पिता

    - जितेंद्र के पिता की चूड़ियों की दुकान है। जितेंद्र तीन भाई-बहन में सबसे बड़े हैं। बचपन से ही जितेंद्र ब्राइट स्टूडेंट रहे हैं। जितेंद्र ने कभी अपनी दिव्यांगता को अपने सपनों पर भारी नहीं पड़ने दिया। वो हमेशा से ही आर्ट्स और स्टडी में अव्वल रहे।

    रेडियो में लोक गायक भी हैं जीतेंद्र

    - जितेंद्र अच्छे सिंगर भी हैं। उनकी अच्छी आवाज के चलते उन्हें रेडियो में लोक गीत गाने का भी मौका मिला। झांसी, लखनऊ और दिल्ली में कई रेडियो स्टेशन्स पर अपनी गायकी की वजह से जितेंद्र काफी वाहवाही लूट चुके हैं।

    आगे की स्लाइड्स में जानें कैसे जितेंद्र को बास्केटबॉल खेलने की उम्मीद जागी...

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    दिव्यांगों को बास्केटबॉल खेलते देख जगी ललक

    - जितेंद्र ने बताया- "एक बार मैं रेडियो प्रोग्राम के लिए दिल्ली गया था। वहां मैंने देखा कि बहुत से दिव्यांग व्हीलचेयर पर बैठकर बास्केटबाल खेल रहे थे। मेरे मन में भी बास्केटबाल खेलने की ललक जागी। मैंने जब इस बारे में जानकारी ली तो पता चला की व्हीलचेयर 35 हजार रुपए का है। इतने पैसे इकट्ठा करना मेरे लिए संभव नहीं था।"

    नार्मल व्हीलचेयर के सहारे शुरू की प्रैक्टिस

    - जितेंद्र ने बताया- "मैंने ठान लिया कि मुझे बास्केटबॉल खेलकर एक प्रतिष्ठा बनानी है। मेरे पास स्पोर्ट व्हीलचेयर खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, जिसके बाद मैंने नॉर्मल व्हीलचेयर के सहारे ही खेलना शुरू किया। धीरे-धीरे मैंने यूपी की टीम में जगह बना ली।"

    - "वहां भी मुझे स्पोर्ट व्हीलचेयर नहीं मिली। मैंने साधारण व्हीलचेयर से ही मैच खेला। मैंने नेशनल मैच खेलते हुए तेलंगाना के खिलाफ अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन हम जीत नहीं पाए। अब भी मेरी प्रैक्टिस जारी है।"

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    नहीं मिली कोई भी सरकारी मदद

    - जितेंद्र बताते हैं- "स्पोर्ट व्हीलचेयर के अभाव में मुझे अपना खेल आगे बढ़ाने में काफी परेशानी हो रही है। आज तक मुझे कोई भी मदद नहीं मिली है। मुझे सरकार की मदद मिले या नहीं मैं अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए संघर्ष करता रहूंगा।"

    - "अगर योजनाओं की बात करें तो सकरार की ओर से दिव्यांगों के खेलों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जाती हैं। 2001 के राइट्स ऑफ पर्सन ऑफ डिसैबिलिटी एक्ट के बाद से इसमें और तेजी आई है। लेकिन, दिव्यांगों के लिए अगर अलग से स्पोर्ट्स बॉडी हो तो शायद उन्हें और भी बढ़ावा मिल सकेगा।"

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    बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया से भी नहीं मिली मदद

    - उन्होंने बताया- "बास्केटबॉल के लिए व्हीलचेयर बास्केटबॉल फेडरेशन ऑफ इंडिया नाम की एक नेशनल बॉडी 2014 से एक्टिव है। ये फेडरेशन दिल्ली, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में समय-समय पर वर्कशॉप आयोजित करता रहता है। अब तक 256 प्रतिभागी इसकी वर्कशॉप्स में हिस्सा ले चुके हैं। लेकिन वहां से भी मुझे कोई मदद नहीं मिली।"

    सरकार से की ये गुजारिश

    जीतेंद्र का कहना है कि "मैंने शासन-प्रशासन सभी से मदद मांगी, लेकिन किसी ने मदद नहीं की। सरकार ने हमारे लिए अभी तक कुछ नहीं किया है। मेरी सरकार से गुजारिश है कि मुझे और बाकी दिव्यांग खिलाड़ियों को भी अच्छी सुविधाएं दी जाएं ताकी हम भी देश के लिए मेडल ला सकें।"

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