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कभी 'इस' गब्बर का चंबल में था आतंक, 116 लोगों के काटे थे नाक-कान

झांसी. एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने हाल ही में अपकमिंग मूवी 'सोन चिरैया' में अपना फर्स्टलुक सोशल मीडिया पर शेयर किया।

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 12:13 PM IST
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झांसी. एक्टर सुशांत सिंह राजपूत ने हाल ही में अपकमिंग मूवी 'सोन चिरैया' में अपना फर्स्टलुक सोशल मीडिया पर शेयर किया। फिल्म में सुशांत का लुक शोले के गब्बर से इंस्पायर है। फिल्म की शूटिंग चंबल में चल रही है, इसमें सुशांत के साथ मनोज वाजपेयी और भूमि पेडनेकर हैं। रणवीर शौरी और आशुतोष राणा भी अहम भूमिका निभाते नजर आएंगे। इसकी स्टोरी चंबल के डाकूओं की कहानी पर बेस्ड है। dainikbhaskar.com आपको चंबल के असली डाकू के बारे में बताने जा रहा है, जिसका चंबल में आतंक था।

पुलिस वालों के नाक-कान काट लेता था गब्बर...

- डाकू गब्बर सिंह के कई किस्से तत्कालीन IPS अफसर केएफ रुस्तमजी की डायरी में दर्ज थे। रुस्तमजी 50 के दशक में मध्य प्रदेश पुलिस के महानिरीक्षक थे।
- रुस्तमजी की लिखी डायरी को IPS अधिकारी पीवी राजगोपाल ने एक किताब की शक्ल दी, जिसका नाम 'द ब्रिटिश, द बैंडिट्स एंड द बॉर्डरमैन' है। इसी किताब के आधार पर हम आपको असली गब्बर की लाइफ के किस्से बता रहे हैं।
- 1926 में भिंड जिले में जन्म लेने वाला गबरा उर्फ कुख्यात डाकू गब्ब सिंह डांग गांव का रहने वाला था। 1955 में गब्बर ने गांव छोड़ दिया और डाकू कल्याण सिंह गूजर के गैंग में शामिल हो गया। कई वारदातों को अंजाम दिया।
- लेकिन गब्बर की दोस्ती कल्याण गूजर के साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चली। कुछ महीने बाद ही गब्बर ने अपना अलग गैंग बना लिया। समय के साथ-साथ उसका नाम चंबल की घाटियों में गोलियों के साथ गूंजने लगा था।
- बीहड़ों में लोग उसके नाम से खौफ खाने लगे। पुलिस महकमा भी उसकी हरकतों से परेशान था। पुलिस रिकार्ड में उसके नाम से मामले बढ़ते जा रहे थे।

- भिंड, ग्वालियर, इटावा, जालौन, ढोलपुर में गब्बर का इतना खौफ था कि उसके बारे में कोई बात करने को भी तैयार नहीं होता था।
- किसी तांत्रिक ने गब्बर से कहा था कि अगर वह अपनी कुल देवी को 116 लोगों के कटे हुए नाक-कान चढ़ाएगा, तो पुलिस या किसी और की गोली उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी। यह बात उसके दिमाग में घर कर चुकी थी।

- उसके बाद उसने सैंकड़ों लोगों के नाक-कान काट डाले, जिनमे अधिकतर पुलिस वाले शामिल थे।

ऐसे हुआ था इस खतरनाक डाकू का खातमा
- यूपी, एमपी और राजस्थान की राज्यों की पुलिस गब्बर को तलाश रही थी, लेकिन उसे पकड़ना बहुत मुश्किल था। इसी वजह से पुलिस ने उसके सिर पर 50 हजार रुपए का नकद इनाम रखा था। उस दौर में यह भारत में किसी वॉन्टेड अपराधी के सिर पर रखा गया सबसे बड़ा इनाम था।
- जब-जब पुलिस और उसके गिरोह का आमना-सामना होता था, तो उल्टे मुठभेड़ में पुलिस को ही ज्यादा नुकसान झेलना पड़ता था।
- उस दौर में चंबल में करीब 16 गैंग थे, लेकिन गब्बर का गैंग सब पर भारी थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी चबंल के हालात और डाकूओं के गिरोह को लेकर काफी फिक्रमंद थे।
- 1959 में एक अहम बैठक में गब्बर को खत्म करने के लिए योजना बनाई गई और उसे खत्म करने का जिम्मा युवा पुलिस अधिकारी राजेंद्र प्रसाद मोदी को सौंपा गया। उस वक्त मोदी डिप्टी एसपी थे, उन्होंने उसी साल कुख्यात डकैत पुतलीबाई के खिलाफ चलाए गए ऑपरेशन में भागीदारी की थी।
- लेकिन गब्बर का एनकाउंटर IPS के.एफ. रुस्तमजी ने किया था। 13 नवंबर को पुलिस ने गब्बर के ठिकाने को घेर लिया। दोनों तरफ से जबर्दस्त गोलीबारी हुई। मोदी ने डाकूओं पर 2 ग्रेनेड फेंके, फिर भी दूसरी तरफ से फायरिंग जारी थी।
- एक ग्रेनेड गब्बर सिंह के पास गिरा और उसका जबड़ा बुरी तरह जख्मी हो गया था। कुछ देर बाद रुस्तमजी ने गब्बर को मार गिराया।

कुछ ऐसी है 'सौन चिरैया' की स्टोरी
- इश्किया और उड़ता पंजाब जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक अभिषेक चौबे चंबल के डाकूओं के जीवन पर बेस्ड एक नई फिल्म लेकर आ रहे हैं।
- इसके लिए सुशांत और भूमि धौलपुर शहर से सटे गांवों, चांदपुर, सानपुर, भैंसेना, भमरौली, जैतपुर सहित बीहड़ों में लोकल कल्चर सीख रहे हैं। भूमि स्थानीय भाषा, कुआं से पानी भरना, खाना बनाना आदि सीख रही हैं।
- उनके साथ एक छोटी 12 साल की बच्ची होती है, जिसका नाम सौन चिरैया है। उसका किडनैप हो जाता है। उसके किडनैप के ईर्द-गिर्द फिल्म की कहानी घूमती है।

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