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400 साल पुराने इस झांसी के किले पर अंग्रेजों ने बरसाए थे तोप के अनगिनत गोले

ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने साल 1613 में झांसी किला बनवाया था। ये किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Nov 18, 2015, 07:00 AM IST

  • झांसी.रानी लक्ष्मीबाई साल 1858 में अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गई थीं। उनकी वीरता के किस्से लोगों के जहन में आज भी बसे हुए हैं। इन्हीं किस्सों में झांसी में स्थित लक्ष्मीबाई का किला भी शामिल है। इस ऐतिहासिक इमारत का एक-एक कोना उनके साहस का गवाह है। एक समय में अंग्रेजों ने अस्तित्व खत्म करने के लिए किले पर 60-60 सेर वजनी तोपों के गोले बरसाए थे। यही नहीं, उन्होंने कई बार इस पर आक्रमण भी किया। इसके बावजूद 400 साल से ये किला पूरी शान के साथ खड़ा है।
    ओरछा के राजा वीर सिंह देव ने 1613 ई. में झांसी किला बनवाया था। किला बंगरा नामक पहाड़ी पर बना है। वैसे तो ये किला निर्माण काल के बाद अलग-अलग राजाओं के अधीन रहा, ताकतवर मराठों का इस पर सैकड़ों साल तक शासन रहा, लेकिन बहादुरी की मिसाल बने इस किले को रानी लक्ष्मीबाई के नाम से ही जाना जाता है।
    साल 1853 में झांसी की रानी बनी थीं लक्ष्मीबाई
    पिता शिवराम भाउ के बाद गंगाधर राव झांसी के राजा बने। शादी के कुछ समय बाद रानी ने एक बेटे को जन्म दिया, लेकिन उसकी असमय मृत्यु हो गई। साल 1853 में राव के निधन के बाद लक्ष्मीबाई झांसी की रानी बनी थीं।
    एक साल बाद ही रानी को छोड़ना पड़ा किला
    राजा गंगाधर राव के निधन से पहले ही रानी ने एक पुत्र को गोद लिया था, लेकिन अंग्रेजों ने दामोदर राव को दत्तक पुत्र मानने से इनकार कर दिया। इस वजह से 28 अप्रैल 1854 को रानी लक्ष्‍मीबाई को ये किला छोड़ना पड़ा। वो काफी दिनों तक 'रानी महल' में रहीं (पहले इस जगह को सरकारी आवास कहा जाता था, लेकिन लक्ष्मीबाई के रहने के कारण इसे रानी महल कहा जाने लगा)।
    1857 में फिर से हुआ आधिपत्‍य
    इसी बीच विद्रोही सैनिकों ने 'खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का और हुक्म रानी लक्ष्मीबाई' का कहते हुए उन्‍हें अपना नेता मान लिया। रानी ने सैनिकों की मदद से अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया। इसके बाद भीषण युद्ध हुआ और 12 जून 1857 को लक्ष्मीबाई ने फिर से झांसी राज्य पर आधिपत्य जमा लिया और किले में आ गईं।
    Photos By: Ram Naresh Yadav
    आगे की स्लाइड्स में पढ़िए, रानी लक्ष्मीबाई ने कब किया झांसी और किला छोड़ने का फैसला...
  • साल 1858 में झांसी छोड़ने का किया फैसला
    21 मार्च 1858 को अंग्रेज कैप्टन ह्यूरोज झांसी आया और हमला कर दिया। 500 पठान अंगरक्षकों की सेना के साथ इसी किले के बाहर रानी ने युद्ध किया। अंग्रेजों ने झांसी पर 60-60 सेर के तोप के गोले बरसाए, फिर भी रानी के तोपचियों ने अंग्रेजों को शांत कर दिया। इसके बाद भी मौजूद रहीं विषम परिस्थितियों के बीच रानी ने 3 अप्रैल 1858 को झांसी छोड़ने का निर्णय लिया। इसके बाद रानी इस किले और झांसी में कभी लौट कर नहीं आ पाईं।
    किले में ये चीजें हैं आकर्षण का केंद्र
    किले में रानी झांसी गार्डन, शिव मंदिर, गुलाम गौस खान, मोतीबाई और खुदा बख्‍श की मजार टूरिस्टों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। साथ ही रानी का पंचशील महल और कड़क बिजली तोप को भी किले का मुख्य आकर्षण माना जाता है। गुलाम गौस खान कड़क बिजली तोप चलाया करते थे। यहां फांसी गृह भी है। रानी की शादी से पहले यहां गुनहगारों को फांसी दी जाती थी, लेकिन लक्ष्मीबाई के आग्रह करने पर इसे रोक दिया गया।
    क्या कहते हैं टूरिस्ट
    एक टूरिस्ट अरिंदम घोष ने बताया कि ये किला आज भी रानी की बहादुरी को जिंदा बनाए हुए है। इसकी एक-एक ईंट रानी के साहस की साक्षी रही है। वहीं, रश्मि ने कहा कि यहां से शहर का खूबसूरत नजारा दिखता है। ये किला झांसीवासियों के साथ-साथ दूसरों को भी उर्जा दे रहा है।
    आगे की स्लाइड्स में देखें, किले की फोटोज...
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Web Title: Rani Laxmi Bai Birthday Special Story On Jhansi Fort In Uttar Pradesh
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