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27 साल से बिस्तर पर मां-4 साल से नहीं उठी बेटी, इच्छा मृत्यु के फैसले पर कहा- अच्छा है वन टाइम डेथ

मस्कुलर डिसट्रॉफी से पीड़ित हैं मां-बेटी।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Mar 10, 2018, 12:11 PM IST

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    इच्छा मृत्यु पर कोर्ट का फैसला सुनकर मां-बेटी की आंख से खुशी के आंसू निकल आए। (दाएं- मां शशि और बाएं बेटी अनामिका)

    कानपुर. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा म्रत्यु पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने इच्छा मृत्यु को मंजूरी देते हुए कहा- सभी को सम्मान से मरने का अधिकार है। कानपुर में मस्कुलर डिसट्रॉफी से पीड़ित मां-बेटी को जब इसकी जानकारी हुई तो उनके चेहरे ख़ुशी से खिल उठे। उन्होंने कहा, घुट-घुटकर मरने से अच्छा है वन टाइम डेथ। हमने भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को खून से लेटर लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग की थी।

    27 साल से बिस्तर पर मां, 4 साल से नहीं उठ पाई बेटी

    - कानपुर शहर के शंकराचार्य नगर की रहने वाली शशि मिश्र के पति की 15 साल पहले मौत हो चुकी है। शशि मस्कुलर डिस्ट्रॉफी नाम की बीमारी से पीड़ित हैं।

    - वो चलने-फिरने में असमर्थ हैं। बीते 27 साल से बेड पर हैं। 6 साल पहले इकलौती बेटी अनामिका (33) भी इसी बीमारी की चपेट में आकर लाचार हो गई। शशि के मुताबिक, बेटी के इलाज में पूरी जमा-पूंजी खत्म हो गई। रिश्तेदारों ने मदद तो की लेकिन बाद में उन्होनें भी किनारा कर लिया। अब हम मोहल्ले के लोगों के रहमो-करम पर जीने को मजबूर हैं।


    - अनामिका ने बी कॉम किया हुआ है। उन्होंने बताया- मेरे पिता एक बिजनेसमैन थे। मां की 1985 में अचानक तबियत खराब हुई। तब हमें पता चला था कि इनको मस्कुलर डिस्ट्रॉफी है। जब तक पिता जी थे, उन्होंने मां का इलाज कराया। उनकी मौत के बाद घर की जमा पूंजी, जमीन बेचकर हम इलाज कराते रहे।

    - मैंने स्कूल में पढाया और कोचिंग पढ़कर मां का इलाज कराया और घर के खर्चे चलाए। लेकिन अब इस बीमारी ने मुझे भी अपनी चपेट में ले लिया। 4 साल से मैं भी बिस्तर पर हूं।

    - उन्होंने कहा, मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को बहुत पॉजिटिव मानती हूं। जब कोई इच्छा मृत्यु के लिए रिक्वेस्ट करता है तो इसके पीछे बहुत से रीजन होते हैं। हम लोग फिजिकली, मेंटली, इमोश्नली सरवाइव नहीं कर पा रहे हैं।

    - आप हर पल मर रहे होते हैं और मौत का वेट कर रहे होते हैं। आपको यह भी नहीं पता होता कि इसका एंड कब होगा। वो तकलीफ एक दिन की तकलीफ से बहुत ज्यादा होती है। जब आप इच्छा मृत्यु के लिए जा रहे हो तो उसमें 10 से 15 दिन का जो भी समय लगेगा, उन दिनों को आप एन्जॉय कर सकते है। मैं देखूंगी कि कहां पर मर्शी किलिंग के लिए आवेदन करना है, इस प्रोसेस को समझूंगी।

    - इंडियन एसोशियेशन मस्कुलर डिसट्रॉफी के यूपी प्रेसिडेंट डॉ. ए. के. अग्रवाल ने कहा, मस्कुलर डिसट्रॉफी बीमारी से इंडिया में 0.3 प्रतिशत लोग ग्रसित हैं। इसका इलाज देश के बाहर यूरोपीय कंट्री में भी नहीं है। इसमें पूरी बॉडी हिल भी नहीं सकती है। किसी उम्र में इसका अटैक आ सकता है। इस बीमारी में कोई भी नॉर्मल नहीं रह जाता। यह बीमारी सर्वाइकल से स्टार्ट होती है।

    - इसमें इंसान फिजकली रूप से कमजोर होता है, लेकिन मानसिक रूप से स्ट्रॉंग। यदि किसी ने इस बीमारी को खुद पर हावी होने दिया तो इसका असर मानसिकता पर पड़ सकता है।

    - इंडिया से बहार यूरोपीय कंट्री में इस बीमारी से ग्रसित लोग आम जीवन जीते हैं। वह पढ़ने, मॉल में घूमन, मूवी देखने जाते हैं क्योंकि वहां पब्लिक प्लेस पर रैम्प बने हैं। लेकिन यहां सड़कों पर कहीं भी दिव्यंगों के लिए ऐसा नहीं है। रैम्प बनाने को लेकर मैंने पीएम, राष्ट्रपति को लेटर भी लिखा है।

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    27 साल से शशि बिस्तर पर ही हैं।
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    इंडियन एसोशियेशन मस्कुलर डिसट्रॉफी के यूपी प्रेसिडेंट डॉ. ए. के. अग्रवाल ने कहा, इसका इलाज नहीं है।
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    फैसले के बाद अनामिका ने कहा- रोज-रोज मरने से अच्छा है वन टाइम डेथ।
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Web Title: Right To Passive Euthanasia News
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