इटावा / पिता की जिद ने बदली दिव्यांग बेटे की जिंदगी; 5 साल की उम्र में दोनों हाथ गंवाए तो पैरों से थामी कलम

अबु के भाई ने स्कूल जाने के लिए खास तरह की साइकिल डिजाइन की है।
अबु अपने पैरों से कलम पकड़कर होम वर्क करता है। अबु अपने पैरों से कलम पकड़कर होम वर्क करता है।
अबु पैरों की मदद से खुद चाय पीता है। अबु पैरों की मदद से खुद चाय पीता है।
स्कूल में पैरों की मदद से कंप्यूटर चलाता अबु। स्कूल में पैरों की मदद से कंप्यूटर चलाता अबु।
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अबु अपने पैरों से कलम पकड़कर होम वर्क करता है।अबु अपने पैरों से कलम पकड़कर होम वर्क करता है।
अबु पैरों की मदद से खुद चाय पीता है।अबु पैरों की मदद से खुद चाय पीता है।
स्कूल में पैरों की मदद से कंप्यूटर चलाता अबु।स्कूल में पैरों की मदद से कंप्यूटर चलाता अबु।

  •  प्रिंसिपल की सलाह पर पिता ने सोशल मीडिया की मदद से अबु को पैरों से लिखना सिखाया
  • 2 माह में ही पैरों से पेन पकड़कर लिखने लगा अबु, उसके मित्र ऋषभ ने भी की मदद
  • बगैर हाथों के अबु साइकिल से डेढ़ किमी दूर स्कूल तक का सफर रोज तय कर लेता है

दैनिक भास्कर

Jan 20, 2020, 11:39 AM IST

इटावा (उत्तर प्रदेश). दोनों हाथों से दिव्यांग 13 साल का अबु हमजा अपने पैरों से पेन पकड़कर लिखता है और पैरों से ही कंप्यूटर चलाता है। 5 साल की उम्र में 11 हजार केवीए की हाईटेंशन लाइन की चपेट में आने से उसके दोनों हाथ चले गए थे। दोनों हाथ न होने के बावजूद अबु पूरी तरह सामान्य बच्चों की तरह जीने की कोशिश करता है। पैरों से लिखने और कंप्यूटर चलाने के अलावा वह खुद करीब डेढ़ किलोमीटर तक साइकिल चलाकर स्कूल जाता है।

पिता की जिद और अबु की लगन ने जीने का हौसला बढ़ाया
अबु का परिवार इटावा में नई बस्ती इलाके में रहता है। पिता लइकउद्दीन बताते हैं कि अबु को 5 साल की उम्र में करंट लगा था। डॉक्टर्स ने कहा- जान बचाने के लिए बच्चे के दोनों काटने पड़ेंगे। जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बच्चे का इलाज कराया। अबु हादसे से पहले इटावा के रॉयल ऑक्सफोर्ड इंटर कॉलेज में कक्षा 1 का छात्र था। उसका कक्षा 2 का सेशन शुरू हो चुका था। घर आया तो 3 माह तक देखभाल की गई। इसके बाद पिता अपने दिव्यांग बच्चे को लेकर स्कूल पहुंचे। स्कूल प्रबंधन से फिर से आम बच्चों की तरह पढ़ाने की बात कही। पिता का फैसला सुनकर स्कूल प्रबंधन परेशान हो उठा कि इस बच्चे को कैसे पढ़ाया जाए, क्योंकि पढ़ाई के साथ लिखना भी जरूरी होता है।

प्रिंसिपल ने पैरों से लिखवाने की सलाह दी
स्कूल के प्रिंसिपल ने एक दिन अबु के पिता को बुलाया। उनसे बातचीत की और बच्चे को पैरों से लिखवाने की आदत डालने की सलाह दी। पिता ने भी बात मानी और यूट्यूब की मदद से अबु के पैरों में पेन थमा दिया। अबु ने लिखना शुरू किया और केवल 2 माह में ही पैरों से लिखने में माहिर हो गया। आज अबु कक्षा 7 में पढ़ रहा है और उसका सपना कंप्यूटर इंजीनियर बनने का है। अबु पढ़ाई के साथ कुरान भी पढ़ता है।

स्कूल में न कोई धर्म होता है, न कोई जाति
अबु के इस जज्बे और हिम्मत के पीछे जितना उसके मां-बाप और भाई का सहयोग है, कहीं न कहीं उसके दोस्तों का भी साथ है। अबु को नई जिंदगी देने में अहम भूमिका निभाई उसके स्कूल के एक मित्र ऋषभ ने। अबु की मां की तरह स्कूल में ऋषभ उसे खाना खिलाता है। जब अबु को उसके दोस्त ही स्कूल में टॉयलेट लेकर जाते हैं। छुट्टी में स्कूल बैग उसकी साइकिल तक पहुंचाते हैं।

हाथों के बिना साइकिल से स्कूल का सफर
अबु का एक बड़ा भाई है, जिसने अबु के लिए एक खास तरह की साइकिल डिजाइन की है। अबु इसी साइकिल से रोजाना डेढ़ किमी दूर स्कूल आता-जाता है। साइकिल के पैडल के पास ही ब्रेक और हैंडल पर स्टेयरिंग की तरह एक हैंडल लगाया गया जो कि अबु अपने सीने के सहारे मोड़ सकता है। अबु की एक छोटी बहन है, जो उसी के स्कूल में पढ़ती है। छोटी बहन को पिता या उसका भाई लेने आते-जाते हैं लेकिन अबु अपनी साइकिल से अकेला आता-जाता है। अबु के पिता ट्रांसपोर्टर हैं। अबु का बड़ा भाई अपने पिता के साथ उनके काम में हाथ बंटाता है।

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