उप्र / कानपुर के 18 गांवों में आज भी जिवित 100 साल पुरानी परंपरा; रंगपंचमी पर होगी होली की धूम



प्रतीकात्मक। प्रतीकात्मक।
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प्रतीकात्मक।प्रतीकात्मक।

  • होली पर्व पर ग्रामीण अपने घरों में रहते हैं कैद
  • अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जमींदार ने छेड़ी थी जंग, तब से यहां अनूठी परंपरा

Dainik Bhaskar

Mar 21, 2019, 01:14 PM IST

कानपुर. देश में होली की धूम है, लेकिन कानपुर के 18 गांवों में सन्नाटा पसरा है। लोग यहां घरों में कैद हो जाते हैं। गंगा किनारे बसे इन गांवों में रंगपंचमी पर्व पर ही होली खेली जाती है। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत होकर यहां रंग-गुलाल उड़ते हैं, जिसमें सभी सराबोर हो जाते है। इसके पीछे 100 साल पुरानी "लगान विरोधी" जंग की कहानी है, जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां के जमींदार ने छेड़ी थी। उस जंग की याद में क्षेत्र ऐसा डूबा कि आज यह परंपरा बन गई है।

 


ऐसे पड़ी रंगपंचमी की परंपरा
बात वर्ष 1917 की है। यहां के वाजिदपुर निवासी जगन्नाथ इस क्षेत्र के जमींदार थे। उस समय अंग्रेज कलेक्टर लुईस ने किसानों पर भारी लगान लगा दिया था। जगन्नाथ ने 18 गांवों के किसानों के साथ बैठक की और लगान के खिलाफ जंग छेड़ दी। अंग्रेजों ने साजिश कर जगन्नाथ को गिरफ्तार कर लिया। इससे आक्रोशित होकर किसान और ग्रामीणों ने जोरदार आंदोलन किया।

 

इस दौरान होली का त्यौहार भी था, लेकिन किसी ने रंग नहीं खेला। क्योंकि आंदोलन के अगुवा जेल में थे। आंदोलन का इतना दबाव पड़ा कि घबराकर अंग्रेजों ने पंचमी के दिन उनको छोड़ दिया। इसके बाद गांव-गांव जुलूस निकाल कर खुशी मनाई गई और रंग-गुलाल उड़ाया गया। तब से यहां पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा चली आ रही है।

 

इन क्षेत्रों में चल रही परंपरा

पूर्व विधायक रामकुमार बताते हैं कि उनके दादा जगन्नाथ की इस लड़ाई का असर यह हुआ कि आज यहां रंगपंचमी के दिन सभी रंग खेलते हैं। शहरी क्षेत्र के घाऊखेड़ा, देवीगंज, बीबीपुर, गंगा किनारे के वाजिदपुर, प्यौंदी गांव, शेखपुर, मोतीपुर, जानां गांव, किशनपुर, अलौलापुर समेत करीब 18 गांवों में पंचमी को रंग खेलते हैं।

 

प्यौंदी गांव के बुजुर्ग सोनेलाल यादव व शेखपुर के सुनील मांझी बताते हैं कि पिताजी और गांव के अन्य लोग लगान के खिलाफ छेड़ी जंग के बारे में बताया करते थे। आज के युवा पूछते हैं कि पंचमी को हम लोग क्यों रंग खेलते हैं तो उन्हें हम लोग पूरी बात बताते हैं। वह भी गर्व महसूस करते हैं और खुशी-खुशी पंचमी को जमकर रंग खेल इस परंपरा में शामिल होते हैं।

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