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डॉ. बन सकता था ये शहीद, गोली लगी फिर भी दो टेरर‍िस्ट किए ढेर

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2018, 06:00 PM IST

DainikBhaskar.com से बातचीत में शहीद भाई लेफ्टिनेट हरी सिंह बिष्ट की बहन ने अनटोल्ड स्टोरी को बयां की।

Army Day Special Story

लखनऊ. 15 जनवरी को आर्मी डे है। इस खास मौके यूपी के लखनऊ के रहने वाले शहीद लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट की छोटी बहन मोनिका बिष्ट ने DainikBhaskar.com से बात की और अपने बड़े भाई लेफ्टिनेट हरी सिंह बिष्ट के लाइफ से जुड़ी अनटोल्ड स्टोरी को बयां की।

ऐसे बीता था बचपन
- मोनिका बताती हैं- ''बड़े भाई लेफ्टिनेंट हरि सिंह बिष्ट का जन्म 31 दिसंबर 1974 को अल्मोड़ा डिस्ट्रिक्ट के डोबा नामक गांव में एक मिडिल क्लास फैमिली में हुआ था।''
- ''पिता पूरन सिंह आर्मी थे। मां शांति देवी हाउस वाइफ थीं। घर में चार भाई-बहन थे। हरि सिंह सबसे बड़े थे। उनका बचपन लखनऊ में बीता था। शुरुआती पढ़ाई देहरादून में हुई थी।''
- ''उसके बाद हाईस्कूल से लेकर इंटरमीडिएट की पढ़ाई लखनऊ के केंद्रीय विद्यालय से की थी। दोनों में फर्स्ट डिवीजन आए थे। पीजी की पढ़ाई लखनऊ के ही क्रिश्चि‍यन कॉलेज से पूरी की थी। उसके बाद कई कंपटीशन एग्जाम की तैयारी में जुट गए।''

पैरेंट्स नहीं चाहते थे बेटा बने आर्मी मैन
- ''पिता आर्मी में थे। इसलिए मां नहीं चाहती थी, उनका एकलौता बेटा हरि सिंह भी पिता की तरफ आर्मी ज्वाइन करे। उनकी ख्वाहिश थी कि बेटा एक डॉक्टर बने।''
- ''पैरेंट्स की इच्छा के अनुरूप हरि सिंह ने सीपीएमटी का एग्जाम दिया और उसमें सि‍लेक्ट हो गए। लेकिन उन्होंने मेडिकल में एडमिशन नहीं लिया।''
- ''उन्होंने मां से ये कहकर मेडिकल में एडमिशन लेने से इनकार कर दिया और कहा- डॉक्टर बनना मेरी नहीं आप लोगों की इच्छा थी। इसलिए मैं इस एग्जाम में बैठा। लेकिन मेरी इच्छा देश के लिए सिपाही बनने की है।''
- ''आप मुझे एक मौका जरूर दीजिए। उसके बाद 1996 में उनका सि‍लेक्शन आर्मी स्कूल में टीचर के रूप में हो गया। वहां पर कुछ दिनों तक टीचिंग की।''
- ''उसके बाद पिता के कहने पर टीचिंग कि जॉब छोड़कर सीडीएस की तैयारी करने लगे। इसी बीच उनका सि‍लेक्शन एमबीए में हुआ, लेकिन उन्होंने इसके लिए भी इनकार कर दिया।''

ऐसे पूरा हुआ आर्मी में जाने का सपना
- ''हरि सिंह की आर्मी ज्वाइन करने की इच्छा 4 अगस्त 1998 में पूरी हुई। उनका सि‍लेक्शन आर्मी ऑफिसर के तौर पर हुआ। डेढ़ साल के ट्रेनिंग के बाद 11 दिसंबर 1999 को वे गोरखा रायफल्स में आर्मी ऑफिसर के रूप में ड्यूटी ज्वाइन किया। उस टाइम पैरेंट्स भी काफी खुश हुए थे।''
- ''उन्हें इस बात की ज्यादा खुशी थी कि उनका बेटा कड़ी मेहनत से अपने दम पर इस पद पर पहुंचा है। 16 जनवरी 2000 को हरी सिंह शाहजहांपुर के गोरखा रायफल में ड्यूटी करने के लिए रवाना हो गये।
- ''उसके बाद 8 मई 2000 को लेफ्टिनेंट हरि सिंह डेढ़ महीने की अपनी छुट्टी पर घर वापस आए। लखनऊ छुट्टी पर आने पर तीनों बहनों ने भाई को गले लगाकर खुशी का इजहार किया था।''

दुश्मनों से लड़ते हुए ऐसे हुए थे शहीद
- ''17 जून 2000 को सिर्फ तीन दिन की छुट्टी पर अचानक से हरि सिंह घर आए थे। परिवार के साथ छुट्टियां मनाई। ड्यूटी पर लौटते टाइम मां से ये वादा किया- दिसंबर में एक महीने की छुट्टी लेकर घर आउंगा। लेकिन घर वाले इंतजार करते रह गए और हरि सिंह कभी घर वापस लौट कर नहीं आए।''
- ''21 जुलाई 2000 को उन्हें जानकारी मिली कि जम्मू कश्मीर के पुंछ जिले के मानधर इलाके के मंझियारी गांव में आतंकियों का एक गिरोह छिपा हुआ था। हरि सिंह ने अपनी टीम के साथ सर्च ऑपरेशन शुरू किया। आतंकियों की तरफ से काफी गोलाबारी हुई। उस गोलाबारी में एक गोली से हरि सिंह बुरी तरह से घायल हो गए।''
- ''इसके बाद भी उन्होंने पीर पंजाल रेजीमेंट के हिजबुल मुजाहिदीन के डिवीजनल कमांडर आबू अहमद तुर्की और दूसरा आतंकी हूजी का एरिया कमांडर अबू हमजा को मार गिराया। सेना ने घरवालों को बताया कि हरि सिंह देश के लिए जंग लड़ते हुए शहीद हो गए है।''

राष्ट्रपति के हाथों मिला था ये वीरता पुरस्कार
- ''दुश्मनों से वीरता से लड़ते हुए शहीद होने पर देश के राष्ट्रपति ने बड़े भाई हरि सिंह को शौर्य चक्र से सम्मानित किया। ये अवार्ड मेरी मां शांति देवी को दिल्ली के राष्ट्रपति भवन में दिया गया था।''

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