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जब यहां पहुंच फूट-फूटकर रोईं अरुणिमा, रही है ऐसी स्ट्रगलिंग Life

ट्रेन हादसे में पैर कटने के बाद नकली पैर से अरुण‍िमा ने 2013 में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी-एवरेस्ट को फतेह की है।

Danik Bhaskar | Dec 26, 2017, 06:22 PM IST
महाकाल मंदिर में एवरेस्ट फतेह करने वाली पहली दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा को दर्शन से रोकने व अभद्रता की पूरी कहानी सीसीटीवी में कैद हो गई थी। मंदिर समिति ने सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद अपनी गलती स्वीकार ली है। महाकाल मंदिर में एवरेस्ट फतेह करने वाली पहली दिव्यांग अरुणिमा सिन्हा को दर्शन से रोकने व अभद्रता की पूरी कहानी सीसीटीवी में कैद हो गई थी। मंदिर समिति ने सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद अपनी गलती स्वीकार ली है।

लखनऊ. एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिन्हा को उज्जैन के महाकाल मंदिर में सिर्फ इसलिए प्रवेश नहीं करने दिया गया, क्योंकि उन्होंने मंदिर की परंपरा के मुताबिक साड़ी नहीं पहनी थी। इस घटना से वो बहुत दुखी हुईं और वहां से रोते हुए वापस चली आईं। वो मध्य प्रदेश सरकार के बुलावे पर एक कार्यक्रम में शिरकत करने गई थीं। DainikBhaskar.com से खास बातचीत में उन्होंने कहा कि वो एमपी के किसी भी व्यक्ति के बुलावे पर जाऊंगी लेकिन सरकार के बुलाने पर कभी नहीं। अरुणिमा ने इस मामले को लेकर ट्विटर पर पीएम-सीएम मध्य प्रदेश से शिकायत की है। रही है ऐसी स्ट्रगलिंग लाइफ...

- अरुणिमा सिन्हा यूपी के अंबेडकरनगर जिले की रहने वाली हैं। ट्रेन हादसे में पैर कटने के बाद नकली पैर से उन्होंने साल 2013 में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी-एवरेस्ट को फतेह की है। ऐसा करने वाली वो विश्व की पहली महिला पर्वतारोही हैं।
- भारत सरकार ने 2015 में उनकी शानदार उपलब्धियों के लिए चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान-पद्मश्री से उन्हें नवाजा था। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरुणिमा की जीवनी 'बॉर्न एगेन इन द माउंटेन' का लोकार्पण किया था।
- अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबाल खिलाड़ी भी रह चुकी हैं। साल 2011 में लखनऊ से दिल्ली आते वक्त लुटेरों ने उनको ट्रेन से नीचे फेंक दिया था। दूसरी पटरी पर आ रही रेलगाड़ी की चपेट में आने के कारण उनका एक पैर कट गया था।
- इसके बाद उन्होंने अपनी लाइफ में तमाम संघर्ष किए। एक पैर खोने के बाद भी अरुणिमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक पर्वतारोही बनकर एवरेस्ट फतह करने की ठान ली।

बुलंद हौसलों से फतेह किया एवरेस्ट
- अरुणिमा बताती हैं- ''ट्रेन हादसे में मैंने अपना पैर गंवा दिया था। परिवार के सदस्य मेरी हालत देखकर बेहद दुखी रहते थे। मुझे अपना पैर खोने का दुख जरूर था लेकिन मैंने मन ही मन कुछ अलग करने की ठान ली थी।''
- ''मेरे प्रयास को देखकर कभी-कभी लोग मेरा मजाक भी उड़ाते थे, लेकिन मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की। मन में बस एक बात थी कि मुझे मेरा लक्ष्य पा कर ही रहना है।''
- ''एम्स में इलाज के बाद छुट्टी मिलने पर दिल्ली की एक संस्था ने मुझे नकली पैर दिए। फिर मेरे हौसलों को पंख लग गए। मैं जमशेदपुर पहुंच गई। वहां मैंने एवरेस्ट फतह कर चुकीं बछेंद्री पाल से मुलाकात की। सही मायने में उन्होंने ही मेरे हौसलों को बल दिया।''
- "उनकी देख-रेख में मेरा प्रशिक्षण पूरा हुआ और मैं 31 मार्च 2013 को मैंने अपना मिशन एवरेस्ट शुरू किया। 52 दिनों की चढ़ाई के बाद 21 मई 2013 को माउंट एवरेस्ट पर मैंने तिरंगा फहरा दिया।"

रोते हुए बोलीं अरुणिमा
- "जब मुझे मंदिर में प्रवेश नहीं मिला तो मुझे रोना आ गया। मैंने वहां रोते हुए बोला- जहां साक्षात शिव रहते हैं, वहां पर्वत पर चढ़ने में इतनी दिक्कत नहीं हुई, जितनी यहां दर्शन में हुई।''
- ''मैंने उसी समय कहा कि प्रधानमंत्री और मध्य प्रदेश के सीएम से जरूर पूंछूंगी कि आप दिव्यांगों के लिए लोगों में आदर का भाव पैदा करने के लिए मुहि‍म चला रहे हैं और यहां इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है।''
- "मैं मंदिर में भगवान शंकर की चालीसा और रुद्राक्ष की माला लेकर गई थी। कड़ाके की ठंड में हम तीन लोग सुबह तीन बजे ही निकल गए थे, ताकि आरती में शामिल हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य से हमें थोड़ा देर हो गई। इससे जब हम पहुंचे तो आरती शुरू हो गई थी।''
- ''हम लोगों ने मंदिर के बाहर लगी एलईडी में ही देखकर पूरी आरती की। आरती खत्म होने के बाद जब मैं मंदिर के अंदर जाने लगी, तब मेरे साथ अभद्र व्यवहार किया गया।''

पीएमओ-सीएम को किया ये ट्वीट
- "मेरे ट्वीट के बाद एमपी सरकार के मंत्री भूपेंद्र सिंह ने अफसोस जताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि जिला प्रशासन को पूरे घटनाक्रम की जांच के निर्देश दे दिए गए हैं। मप्र सरकार दिव्यांगों के प्रति पूरी तरह संवेदनशील है। आप देश का गौरव हैं, भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में आपका स्वागत है।''

मंदिर प्रशासन ने भी व्यक्त किया दुख
- मंदिर प्रशासन की ओर से नरेंद्र शर्मा ने ट्वीट कर इस घटना पर दुख व्यक्त किया है। उन्होंने अरुणिमा से माफी मांगते हुए मंदिर के कर्मचारियों के कृत्य पर माफी मांगते हुए उन्हें फिर से मंदिर में दर्शन के लिए आमंत्रण भेजा है।

मेरे प्रयास को देखकर कभी-कभी लोग मेरा मजाक भी उड़ाते थे, लेकिन मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की। मन में बस एक बात थी कि मुझे मेरा लक्ष्य पा कर ही रहना है। मेरे प्रयास को देखकर कभी-कभी लोग मेरा मजाक भी उड़ाते थे, लेकिन मैंने कभी इसकी परवाह नहीं की। मन में बस एक बात थी कि मुझे मेरा लक्ष्य पा कर ही रहना है।
मेरे ट्वीट के बाद एमपी सरकार के मंत्री भूपेंद्र सिंह ने अफसोस जताया है। मेरे ट्वीट के बाद एमपी सरकार के मंत्री भूपेंद्र सिंह ने अफसोस जताया है।