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राज्यसभा में कैंडिडेट भेजने से लेकर यूपी में राजनीतिक जमीन तलाशने तक, एक्सपर्ट्स ने बताये मायावती के निर्णय के रीजन

हालाँकि मायावती ने साफ़ किया है कि उपचुनावों में सपा को दिए गए समर्थन को गठबंधन न माना जाए।

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 07:15 PM IST
अखिलेश और मायावती (फाइल फोटो) अखिलेश और मायावती (फाइल फोटो)

लखनऊ. 25 साल बाद बसपा ने एक बार फिर सपा से हाथ मिलाया है। हालाँकि मायावती ने साफ़ किया है कि उपचुनावों में सपा को दिए गए समर्थन को गठबंधन न माना जाए। बल्कि मायावती ने इसे एक डील बताया है। उपचुनावों से पहले बसपा के इस एलान के सिलसिले में dainikbhaskar.com ने सीनियर पॉलिटिकल जर्नलिस्ट हेमंत तिवारी, राजेंद्र के गौतम और कमल जयंत से बातचीत की।

राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं मायावती

-एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2012 विधानसभा चुनाव, 2014 का लोकसभा चुनाव और फिर 2017 के विधानसभा चुनावों के बाद बसपा की स्तिथि लगातार कमजोर होती जा रही है। आलम यह है कि बसपा अपने बलबूते राज्यसभा और विधानपरिषद में अपना एक सदस्य भी नहीं भेज सकती है।
-साथ ही उसके बड़े और चर्चित नेता भी बसपा का साथ छोड़ चुके हैं जोकि बसपा के लिए एक झटके की ही तरह है।
-ऐसे में सपा को उपचुनावों में समर्थन देने के बहाने मायावती बसपा की राजनीतिक जमीन को परखना चाहती हैं। क्योंकि दलितों की मसीहा के नाम से फेमस मायावती ऐसी नेता है जो पार्टी कैडर के वोट को किसी भी कैंडिडेट को ट्रांसफर कर सकती हैं।

लोकसभा चुनावों से पहले की टेस्टिंग है यह समर्थन

-एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह समर्थन लोकसभा चुनावों से पहले की टेस्टिंग की तरह है। अगर यह फैसला सफल हुआ तो आगामी लोकसभा चुनावों में यह गठबंधन का भी रूप ले सकता है।
-चूँकि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस-सपा का गठबंधन सफल नहीं रहा था यही वजह है कि ठीक 2019 से पहले होने वाले उपचुनावों में विपक्ष ने गठबंधन करना उचित नहीं समझा। ऐसे में जब कांग्रेस ने अपने कैंडिडेट्स की घोषणा कर दी तो अगले दिन सपा ने भी अपने कैंडिडेट मैदान में उतार दिए। हालाँकि कांग्रेस दोनों सीटों पर ही लड़ाई में नहीं दिखाई दे रही है।

अपना कैंडिडेट राज्यसभा भेजना हो सकता है मकसद

-एक्सपर्ट्स कहते हैं कि राजनीतिक मैदान में अपना दबदबा दिखाने का उद्देश्य भी इस समर्थन के पीछे हो सकता है।
-23 मार्च को राज्यसभा का इलेक्शन होना है। यूपी से सबसे ज्यादा दस सीटें खाली हो रही हैं। जिसमे से 8 सीट भाजपा के खाते में जाएगी जबकि एक सपा और एक पर पेंच फंसा है। मायावती ने अपने बयान में भी साफ़ कहा है कि सपा को समर्थन इसलिए दिया है कि वह हमारे कैंडिडेट को राज्यसभा भेजेंगे। बदले में 5 मई 2018 को विधानपरिषद की खाली हो रही 13 सीट में से एक सपा का सदस्य को हम वोट देंगे।

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अखिलेश और मायावती (फाइल फोटो)अखिलेश और मायावती (फाइल फोटो)
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