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ग्राउंड रिपोर्ट: महंत ने अपने घर में छिपाई थी मुस्ल‍िम फैमिली, अयोध्या से दोस्ती की 4 अनसुनी कहानियां

बाबरी विध्वंश के बाद आज भी वहां कई हिन्दू-मुस्लिम अच्छे दोस्त हैं।

रवि श्रीवास्तव/आदित्य तिवारी | Last Modified - Feb 08, 2018, 07:13 PM IST

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    अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम किया जा रहा है।

    अयोध्या.6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में लाखों कारसेवक जमे थे। हर घर में जय श्रीराम का नारा सुनाई पड़ रहा था, फिर मस्जिद विध्वंस की खबर आई। अयोध्या सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में दंगे भड़क गए थे, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने धर्म की सीमाएं लांघ कर अपने हिन्दू-मुस्लिम दोस्तों की मदद की थी। सुप्रीम कोर्ट में आज (8 फरवरी, 2018) से एक बार फिर अयोध्या मामले की सुनवाई शुरू हो गयी है। ऐसे में DainikBhaskar.com के लिए अयोध्या से रवि श्रीवास्तव और आदित्य तिवारी की एक्सक्लूसिव ग्राउंड रिपोर्ट...


    महंत ने किया था मुस्लिम बच्चे का नामकरण

    -अयोध्या के सरयू नदी के किनारे बने गोलाघाट पर हमारी मुलाकात 70 साल के सलीम से हुई। उन्होंने बताया बहुत कम ही लोग हैं जो मेरे असली नाम को जानते हैं। उन्होंने इसके पीछे एक इंट्रेस्टिंग किस्सा सुनाया।
    -सलीम ने बताया कि हमारा असली नाम 'भोला' है। यह नाम राम-लक्ष्मण मंदिर के महंत रामलखन दास ने रखा था। मेरे पिता का मंदिर के महंत से बहुत ज्यादा मिलना-जुलना था। घर के बगल में ही मंदिर था तो महंत भी घर पर आया करते थे।
    -1948 में जब मेरा जन्म हुआ तो महंत रामलखन ने मेरी अम्मी (मां) से कहा कि इसका नाम मैं रखूंगा तो उन्होंने 'भोला' नाम रखा। उसके बाद घर वालों ने नया नाम सलीम रखा, लेकिन अयोध्या में मुझे 'भोला' के नाम से जाना जाता है। यहां तक परिवार के लोग भी मुझे भोला ही बुलाते हैं।
    -1992 की बात बताते हुए उनकी आंखों नम हो गईं। किस्सा बताते हुए भोला कहते हैं कि जब दंगा भड़का तो मंदिर के उस समय के एक महंत रामचरित दास ने मुझे और मेरे परिवार को 15 दिनों मंदिर में अपने पास रखा। जिसकी वजह से परिवार की जान बच गई। उन्होंने उस मंजर को याद करते हुए कहा उपद्रवी सडकों पर एक-दूसरे को मार रहे थे। घर जलाए जा रहे थे। ऐसे वक्त में हमें मंदिर के महंत ने सहारा दिया था। अचानक तेज आवाज में उन्होंने कहा- मैं और मेरा परिवार उस एहसान का बदला नहीं चुका सकते हैं।
    - अयोध्या में चूड़ियों का कारोबार है। भोला कहते हैं कि आज भी कई संत-महंत मेरे बहुत अच्छे दोस्त हैं और चाय-नाश्ता भी उनके होता रहता है। कभी-कभी घर पर दावतें भी होती हैं। आज (7 फरवरी) एक हिन्दू दोस्त के घर में शादी में जाना है।

    मूर्तिकार सुरेश के साथ आदित्य तिवारी की ग्राउंड रिपोर्ट...

    -भोला से मुलाकात के बाद मैं अयोध्या संस्थान के प्रशासनिक भवन की तरफ गया। जहां सड़क किनारे एक मूर्तिकार की दुकान दिखाई दी। दुकान में 65 के साल के व्यक्ति ने अपना नाम सुरेश सोनी बताया। बातचीत के दौरान मैंने उनसे रामचंद्र परमहंस और हाशिम अंसारी की दोस्ती की बात छेड़ी तो उन्होंने भी दंगे के समय की अपनी दोस्ती का एक किस्सा बताया।
    -उन्होंने बताया कि मेरा एक दोस्त था लतीफ जिसकी गारंटी पर मुझे यह दुकान मिली है। हम लोग महोबा जिले से 1970 में अयोध्या में बसने आए थे। कारीगरी तो थी लेकिन कोई ठौर नहीं था। उसके बाद मेरी दोस्ती लतीफ से हुई। लतीफ मदद की और अपनी गारंटी पर दुकान दिलवाई। मेरे मोहल्ले में इकलौता लतीफ का परिवार रहता है। लतीफ से दोस्ती के बाद उसके घर से थोड़ी दूर पर मैंने भी अपना घर बना लिया।
    -1992 का किस्सा सुनाते हुए सुरेश ने कहा- जब दंगे हो रहे थे तो अयोध्या भी शांत नहीं था। हर दिन कुछ न कुछ अनहोनी वाली खबर सुनाई देती थी। हम जहां रहते थे वहां लतीफ का इकलौता मुस्लिम घर था।
    -अयोध्या में हुए दंगों में बाहरी लोग ज्यादा थे जबकि अयोध्या के लोग एक दुसरे को बचाने में जुटे हुए थे। जब उपद्रवियों की नजर लतीफ के घर पर पड़ी तो हमने घर में बाहर से ताला लगा दिया और कई दिन तक मैं और मेरा परिवार उनके घर के बाहर पहरा देता रहा। चुपके से लतीफ के परिवार को खाना भेजता था। उसके बीवी बच्चों को अपने घर ले आया था।
    -हालांकि लतीफ की 3 साल पहले मौत हो गई है, लेकिन आज भी उनके घर से आना जाना रहता है। चलते चलते सुरेश कहते हैं कि 1992 का दंगे ने भले ही कई लोगों को दूर कर गया लेकिन कईयों को बहुत करीब भी कर दिया था। उनमें से लतीफ का परिवार भी है।


    दंगों में हिन्दू दोस्त के घर हफ्ते भर रहा

    -अयोध्या कोतवाली से करीब 100 मीटर दूर चूड़ी की एक दुकान है जहां मैने अतीक अहमद से बात की। यह दुकान मुझे कई वर्षों पुरानी लगी जिस कारण मैं उस दुकानदार के पास मिलने पहुंच गया। अतीक ने बताया यह दुकान करीब 25 साल पुरानी है। हिन्दुओं की बस्ती में मैं इकलौता मुस्लिम हूं जिसका परिवार रहता है।
    -1992 का दौर याद कर अतीक कहते हैं कि जब दंगा हुआ तो मेरा परिवार बहुत डर गया था। हम उस बस्ती में इकलौते मुस्लिम थे तब मैंने अपने दोस्त सर्वेश से मदद मांगी। सर्वेश ने मेरे परिवार को तकरीबन एक हफ्ते तक अपने घर में रखा। बिना किसी भेदभाव के हमें खाना खिलाया और रहने की जगह दी। उन्होंने बताया कि सर्वेश ने अपने बिस्तर में मेरे बच्चों को सुलाया और वो खुद हफ्ते भर जमीन पर सोए।
    - उन्होंने बताया कि सर्वेश के कई रिश्तेदारों ने हमें घर में रखने का विरोध भी किया था लेकिन उसने किसी की नहीं सुनी। हम आज भी दिन में दो से तीन बार मिलते हैं। साथ में चाय-पानी होता है उसी तरह घर के सदस्य भी मिलते जुलते हैं।

    राम-मंदिर के पत्थर तराश रहे रजनीकांत के बचपन के दोस्त का नाम है आसिफ

    - करीब 4.32 पर मैं कार सेवक पुरम पहुंचा। टीनशेड के नीचे पत्थरों के बीच बैठे एक आदमी से मैंने हालचाल पूछा। हालचाल का जबाव देते हुए वह पत्थर पर डिजाइन बना रहे थे। बातचीत में उन्होंने बताया मैं गुजरात का रहने वाला हूं और पांच साल से यहां पर काम कर रहा हूं। उन्होंने बताया कि गुजरात में मेरा बचपन भी मुस्लिम दोस्तों के साथ ही बीता है।
    - दोनों लोगों का घर आस-पास ही है। काम करना भी एक साथ ही शुरू किया था लेकिन मैं अयोध्या आ गया अब मेरा दोस्त आसिफ भी काम करने के लिए अयोध्या आना चाहता हैं।

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    70 साल के सलीम को अयोध्या में भोला के नाम से जाना जाता है।
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    एक मुस्लिम दोस्त की मदद से सुरेश को दुकान मिली थी।
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    अतीक ने बताया हिन्दू दोस्त ने रिश्तेदारों का विरोध कर बचाई थी परिवार की जान।
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    रजनीकांत 5 साल पहले अयोध्या में बसे हैं।
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Web Title: Ground Report Of Dainikbhaskar Related To Ayodhya
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