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नहीं देखा होगा ऐसा 'कुंवारा बाप', रोड पर तड़पते ढाई साल के मासूम दो दी नई LIFE

यूपी की राजधानी निवासी 58 साल के एकूलाल संदील रियल लाइफ 'कुंवारा बाप' हैं।

Dainik Bhaskar

Jan 23, 2018, 01:37 PM IST
इंसानियत की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं एकूलाल और अकबर। इंसानियत की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं एकूलाल और अकबर।

लखनऊ. रियल लाइफ में सही मायनों में 'कुंवारा बाप' बनने वाले एकूलाल संदील ने मंगलवार 23 जनवरी को अंतिम सांस ली। 58 साल के इस शख्स ने 11 साल पहले जो इंसानियत की मिसाल पेश की थी, जिंदगी के अंतिम पलों में वही उनका आखिरी सहारा बनी। उन्होंने एक दूसरे धर्म के लावारिस बच्चे को नई जिंदगी देने के लिए खुद कभी शादी नहीं की थी। DainikBhaskar.com हिंदू बाप और मुस्लिम बेटे की यही जज्बाती कहानी अपने रीडर्स को बता रहा है।

भूख से झटपटा रहा था ढाई साल का मासूम, ऐसे हुई संदील से मुलाकात

- अकबर बताता है, "2002 की बात है, मैं तब ढाई साल का था। मैं शहर के कैसरबाग लाल बारादरी के पास लावारिस पड़ा था। मुझे बस अपना नाम पता था 'अकबर'। पापा (एकूलाल) तब वहां चाय का ठेला लगाते थे। उन्होंने मुझे भूख से तड़पता देखा। वो मेरे पास आए और पूछा कि मैं कौन हूं, मेरे अम्मी-अब्बू कहां हैं, लेकिन मुझे कुछ भी याद नहीं था। भूख की वजह से मैं काफी बीमार था।"
- "वो अपना काम-धंधा छोड़कर मुझे बलरामपुर हॉस्पिटल लेकर गए और मेरा इलाज करवाया। कुछ दिनों में मेरी सेहत सुधरी तो वे मेरे मम्मी-पापा को ढूंढने में लग गए, लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं चल सका। तब से मैं इन्हीं के पास रह रहा हूं। यही मेरे अम्मी-अब्बू हैं। वो हिंदू हैं, लेकिन मेरी परवरिश उन्होंने मुस्लिम बच्चे की तरह की है। अब मेरी बारी है कि मैं बीमारी के दिनों में उनका ध्यान रखूं।"
- अकबर अब 17 साल के हैं और प्रेजेंट में 12वीं क्लास में हैं।

अच्छे दिनों में साथ एकूलाल और अकबर। अच्छे दिनों में साथ एकूलाल और अकबर।

दारू के नशे में पिता ने छोड़ा दिया था अकबर को लावारिस

 

- अकबर बताते हैं, "मेरा परिवार इलाहाबाद का रहनेवाला है। बाप का नाम मोहम्मद अब्बास और मां का नाम शहनाज बानो है। मेरी एक बहन और भाई भी है। जब पापा (एकूलाल) को मैं मिला तो उन्होंने टीवी-रेडियो पर एड दिया था कि गुमशुदा बच्चा मिला है, किसी का हो तो आकर ले जाए। दो साल बीत गए, लेकिन मुझे कोई लेने नहीं आया।"
- "मेरा बाप इलाहाबाद में जूते-चप्पल की फेरी लगाता था। वो बहुत दारू पीता था। वो मुझे लेकर ठेके पर दारू पीने गया था और नशे में धुत होने के बाद उसी दुकान पर छोड़ गया। मैं इलाहाबाद से लखनऊ कैसे पहुंचा, यह नहीं जानता। मैं तब ढाई साल का था।"

अकबर 12वीं के स्टूडेंट हैं। अकबर 12वीं के स्टूडेंट हैं।

पहले हुई मारपीट, फिर कोर्ट केस... पर जुदा नहीं हुए बाप-बेटे

 

- अकबर बताते हैं, "पापा (एकूलाल) मुझे अकेले ही पाल रहे थे। उन्होंने आज तक शादी नहीं की है। दो साल बाद 2004 में मेरे इलाहाबाद वाले अम्मी-अब्बू मुझे लेने लखनऊ पहुंचे। उन्होंने पापा के साथ मारपीट भी की, लेकिन मोहल्ले वालों ने बीच-बचाव कर मुझे पापा से बिछड़ने से बचा लिया।"
- "साल 2005 में मेरे बाप मोहम्मद अब्बास ने कोर्ट में मुकदमा किया कि पापा मुझे बंधुवा मजदूर बनाकर यहां रखे हैं, लेकिन कोर्ट में भी पापा को जीत मिली। जज ने कहा था कि अगर हिंदू-मुस्लिम के बीच शादी हो सकती है, तो पिता-बेटे का रिश्ता भी हो सकता है। हमें कोई जुदा नहीं कर सकता। हमेशा साथ ही रहेंगे।"
- "पापा मेरे लिए रोज खाना बनाकर दूकान खोलने के लिए जाते थे। फिर छुट्टी होने पर मुझें स्कूल से लेने के लिए आते थे। मेरी देखभाल करने वाला घर में कोई और दूसरा नहीं था। अब उनके बुरे वक्त में मैं उनका सहारा बनूंगा।"

अकबर अकेले अपने पिता की देखरेख कर रहे हैं। अकबर अकेले अपने पिता की देखरेख कर रहे हैं।

बेटे को पढ़ाई नमाज, दिलाई इस्लामी तालीम

 

- अकबर बताते हैं, "पापा हिन्दू हैं, लेकिन उन्होंने कभी मुझसे किसी धर्म को फॉलो करने के लिए नहीं कहा। वो कहते हैं, जिसमें मन लगे उसी धर्म को मानो। हम घर पर ईद और दिवाली दोनों मनाते हैं। उन्होंने मुझे इस्लामी तालीम दिलवाने के लिए मदरसे में एडमिशन करवाया था। मजहबी तालीम के बाद मेरा एडमिशन क्वींस इंटर कॉलेज में करवाया, जहां से मैं अभी 12वीं की पढ़ाई कर रहा हूं।"
- अकबर के पापा तीन दिन से बीमार हैं और हॉस्पिटल में एडमिट हैं। वे बताते हैं, "उनकी देखरेख करने वाला घर में कोई दूसरा नहीं है। मैं पूरे दिन उनके पास रहता हूं। दुकान बंद हो चुकी है। जैसे-जैसे लोगों को पापा की बीमारी की खबर मिल रही है, वे मदद के लिए आगे आ रहे हैं।"
- "पापा अब कुछ खा-पी नहीं पा रहे। उनसे मिलने के लिए जो लोग आते हैं, मुझे बिस्किट, नमकीन या फ्रूट्स देकर जा रहे है। उसी को खाकर मैं दिन गुजार रहा हूं।"

एकूलाल चाय की दुकान चलाते हैं। एकूलाल चाय की दुकान चलाते हैं।

हिंदू एकूलाल की परवरिश की थी मुसलमान ने

 

- ढाई साल के अकबर को नई जिंदगी देने वाले एकूलाल की परवरिश एक मुसलमान ने की थी। वो 9 साल के थे जब लखनऊ स्थित चौधरी होटल के मालिक चौधरी मुजतबा हुसैन ने उन्हें पनाह दी थी। हुसैन अब इस दुनिया में नहीं हैं। उनके बेटे चौधरी हसन इमाम ने एकूलाल का पूरा इतिहास बताया।
- हसन इमाम बताते हैं, "एकूलाल मध्य प्रदेश के रहने वाले थे। वे 9 साल के उम्र में घर से भाग कर लखनऊ आए थे। यहां पर उनकी मुलाकात मेरे पिता से हुई और पिताजी ने इन्हें अपना बच्चा मानकर परवरिश करने की ठान ली।"
- "एकूलाल यहीं हमारे होटल में रहते थे और छोटा-मोटा काम कर देते थे। कुछ दिनों बाद इनके पिता विश्वभर तलाशते हुए होटल आए। पिताजी ने इनसे अपनी फैमिली के साथ जाने के लिए कहा, लेकिन ये नहीं माने। उनके घरवाले दबाव डाल रहे थे, लेकिन मेरे पिताजी ने समझाया कि लड़का जवान है, गुस्से में कोई गलत कदम न उठा ले। उनके समझाने पर वे एकूलाल को यहीं छोड़ गए।"
- "मेरे पिताजी की डेथ के बाद कुछ दिन ये हमारे होटल में रुके, लेकिन फिर किसी बात पर नाराज होकर लाल बारादरी के पास चाय का ठेला लगाना शुरू कर दिया। तब से यहीं हैं।

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इंसानियत की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं एकूलाल और अकबर।इंसानियत की अनोखी मिसाल पेश कर रहे हैं एकूलाल और अकबर।
अच्छे दिनों में साथ एकूलाल और अकबर।अच्छे दिनों में साथ एकूलाल और अकबर।
अकबर 12वीं के स्टूडेंट हैं।अकबर 12वीं के स्टूडेंट हैं।
अकबर अकेले अपने पिता की देखरेख कर रहे हैं।अकबर अकेले अपने पिता की देखरेख कर रहे हैं।
एकूलाल चाय की दुकान चलाते हैं।एकूलाल चाय की दुकान चलाते हैं।
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