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ये हैं 'यूपीकोका' के वो अहम प्रावधान जिनका विपक्ष कर रहा है विरोध

यूपीकोका का विपक्ष विधानसभा में हंगामा कर रहा है।

Dainik Bhaskar

Dec 21, 2017, 12:04 PM IST
फाइल । फाइल ।

लखनऊ. यूपी में अपराध पर लगाम लगाने और संगठित अपराध से निपटने के लिए यूपी सरकार ने बुधवार को 'यूपीकोका' का ड्राफ्ट विधानसभा में चर्चा के लिए पेश किया। इस ड्रफ्ट के प्राविधानों को लेकर विपक्ष ने पिछले कई हफ्तों से ही कड़ा रूख अपना रखा है। इसको लेकर विधानसभा और विधानपरिषद में जोरदार हंगामा हुआ। इसमें मीडिया पर इनडायरेक्टली प्रतिबंध लगाना भी शामिल है। Dainikbhaskar.com बता रहा है कि इसमें कौन से ऐसे प्रावधान हैं जिनको लेकर विपक्ष हमलावर हो रहा है।

1 सूचना देने, प्रकाशित करने पर भी लगी शर्त

-इस ड्राफ्ट में सबसे पहला प्रावधान है जिसमें किसी व्यक्ति को संसूचित करना या उसके साथ सहयोजन करना जो किसी अवैध कार्य में वास्तिविक जानकारी के साथ सहायता करता है। तो उस पर यूपीकोका लगेगा।
-ऐसा विश्वास करने का कारण स्पष्ट होता हो की वो व्यक्ति संगठित अपराध करने वालों के सिंडीकेट में शामिल हो, या उससे जुड़े लोगों की सहायता करने में किसी प्रकार से शालिल है। या उनको सही साबित करने को लेकर किसी प्रकार से सहायता करना चाहे। संगठित अपराध से जुड़े किसी व्यक्ति को फाइनेंशियल या अन्य किसी प्रकार से वो भी 'यूपीकोका' का दोषी पाया जाएगा।

2 बगावत या किसी को उकसाने के प्रसास करना भी संगठित अपराध की श्रेणी


-संगठित अपराध करने या इस प्रकार का सिंडीकेट चलाने अथवा उसमें शामिल होने वाला व्यक्ति। इस प्रकार का अवैध काम करने को उकसाना या किसी को बगावत के लिए भड़काने वालों को इसमें शामिल किया जाएगा।
-किसी प्रकार से सिंडीकेट के निमित्त बनना, हिंसा का प्रयोग कराना या हिंसा, अभित्रास, दबाव की धमकी या उत्कोच, प्रलोभन या लालच के साधन द्वारा या आर्थिक लाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से काम कराना भी सिंडीकेट में शामिल होगा। बगावत को बढ़ावा देने वालों को भी इसी श्रेणी में शामिल किया जाएगा।
सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन या हिंसात्मक प्रयोग भी सिंडीकेट की श्रेणी है।
-सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए आंदोलन के दौरान हिंसात्मक होना अथवा सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले भी इसी श्रेणी में रखे जाएंगे।
पुलिस की गवाही पर ही सजा का प्रावधान, किसी कोर्ट में चैलेंज नहीं कर सकेंगे।
-इसमें शामिल लोगों को पुलिस के द्वारा दर्ज किये गए केस को या प्रस्तुत किये गए साक्ष्यों को ही सबूत मानकर उनको सजा दी जा सकती है।
-जब तक सिद्ध न हो जाए कि वो निर्दोष है, तब तक विशेष न्यायालय उस व्यक्ति को ही दोषी माना जाएगा। कोई दोषी जेल से बाहर नहीं जा सकेगा, मुलाकाती से मिलने की अनुमति नहीं होगी।
-कोई भी दोषी व्यक्ति इलाज के लिए जेल से बाहर नहीं जा सकेगा। सीएमओ की लिखित संस्तुति पर डीएम की अथवा डीएम स्तर के किसी अधिकारी के सिवाय किसी भी इलाज के लिए जेल से बाहर नहीं जा सकेगा।
-जेल में किसी भी व्यक्ति से चाहे वो परिवार का सदस्य ही क्यों न हो, उसे मिलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। यदि परिवार या किसी सदस्य का मिलना जरूरी हो। तो भी डीएम की अथवा उसके स्तर के अधिकारी की अनुमति जरूरी के साथ सिर्फ सप्ताह में 2 व्यक्ति ही मिल सकेंगे।

3 किसी अधिकारी या केस से जुड़े व्यक्ति पर कोई कार्यवाई नहीं की जा सकती


-कानून के तहत आने वाले किसी अधिकारी या राज्य सरकार के कर्मचारी या राज्य अपराध नियंत्रण प्राधिकरण के किसी अधिकारी के विरुद्ध, किसी ऐसे कार्य के लिए जो इसके अधीन या ऐसे नियमों के अधीन पारित किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूवर्क किया गया हो या सद्भावपूर्ण किया जाना प्रतीत हो, ऐसे किसी अधिकारी कर्मचारी या व्यक्ति पर कोई विधिक कार्यवाई नहीं की जाएगी।


क्या कहना है विपक्ष का

-नेता विपक्ष रामगोविंद चौधरी ने कहा- "इमरजेंसी के समय जिस कानून के तहत विपक्ष को दबाने के लिए जेल में डाला गया था, ठीक वही परिस्थिति आने वाली है। भाजपा ने पत्रकारों के साथ-साथ अपने हक की आवाज उठाने वाले लोगों को जेल में भेजने के लिए कानून लाई है। अगर ये कानून यहां लागू हो जाता है, तो निश्चित तौर पर बहुत बुरी स्थिति होगी। लोकतंत्र खतरे में है। ये तानाशाही सरकार सिर्फ अपने अहंकार में खोई है।"

-नेता विरोधी दल कांग्रेस अजय सिंह ने कहा- 'ये पूरी तरह से सरकार के खिलाफ बोलने वाले लोगों को डराने के लिए कानून को ला रही है। जिससे सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को चाहे वो नेता हो, या पत्रकार सबको चुप कराया जा सके। ये बहुत डरावनी स्थिति है। अब इसकी क्या जरूरत आ गई, जबकि पहले से ही आईपीसी सीआरपीसी की कई धाराएं मौजूद हैं।"

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