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मां ने 7 महीने की बेटी का किया मर्डर, बॉडी बगल में रख पी रही थी खून

10 जुलाई 2004 को हुई इस घटना ने सभी को हिला कर रख दिया था।

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2017, 11:00 PM IST
Mother killed her daughter

लखनऊ. राजधानी के एक चर्चित मामले में 27 नवंबर 2017 को हाईकोर्ट ने अपनी बेटी की हत्यारोपी मां को 13 साल बाद आरोपों से बरी कर दिया है। यहां 2004 में हुई इस घटना ने सभी को हिला कर रख दिया था। एक मां ने अपनी सात माह की बेटी की गला रेत कर हत्या कर दी थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक बेटी को मारने के बाद वो उसका खून भी पी गई थी। महिला दिमागी रूप से बीमार थी। ग्राम प्रधान ने पुलिस को सूचना देकर उसे पुलिस को सौंप दिया था। 13 साल जेल में रहने के बाद उसे कोर्ट ने मंदबुद्धि बताते हुए बरी कर दिया। DainikBhaskar.com ने 13 साल पुराने मामले की पड़ताल की तो हत्यारोपी महिला के पति बुजुर्ग पड़ोसी ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए।

घर लाया तो प्रेग्नेंट निकली पत्नी
- घटना साल 2004 की है। राजधानी के गोंसाईगंज थाना क्षेत्र का रहने वाला रामकुमार रिक्शा चलाता है। रामकुमार के मुताबिक, ''मैं उस समय हजरतगंज इलाके में रिक्शा चलाता था। खाली समय में हम तीन-चार रिक्शा चालक चौराहे (वर्तमान में जीपीओ पार्क) के पास इकट्ठा होते थे।"
- "वहां एक 24-25 साल की लड़की फटे कपड़ों में घूमती रहती थी। देखने से वो मंदबुद्धि लगती थी। वो अक्सर रिक्शे पर बैठ जाती और चलने के लिए कहती।"
- "मेरी उम्र 40 के करीब थी और मेरी शादी नहीं हुई थी। मेरे साथ रहने वाले लोगों ने मुझे कहा कि इसे साथ ले जाओ और पत्नी की तरह रखो।
- अगर ये ठीक हो गई तो तुम्हें पत्नी मिल जाएगी और खाना बनाने का संकट दूर हो जाएगा। मैं उसे घर ले आया। हम पति-पत्नी की तरह रहने लगे।"
- "दो महीने बाद पता चला कि वो 3-4 महीने की प्रेग्नेंट है। मैंने सोचा कि अगर इसे घर से भगाया तो ये कहां जाएगी। इसके साथ फिर से कोई दरिंदगी करेगा। यही सोच कर मैंने उसे घर पर रख लिया।"
- "मैंने उसके बच्चे को भी अपना नाम देने का फैसला किया। उसने घर लाने के 8 महीने बाद एक बेटी को जन्म दिया। धीरे-धीरे वो थोड़ा बहुत घर का काम भी करने लगी थी। वो दाल-चावल भी बनाना सीख गई थी।
- रोटी मैं खुद बनाता था। बस उसकी भाषा समझ नहीं आती थी। समय बीतता गया और बेटी 7 महीने की हो गई। हमने उसका नाम लक्ष्मी रखा था।"

13 साल बाद हाईकोर्ट ने किया बरी
- इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के न्यायमूर्ति अजय लांबा और न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की बेंच ने आरोपी मां की ओर से दाखिल अपील को मंजूर करते हुए उसे बरी कर दिया। आरोपी के मेडिकल टेस्ट में भी ये बात सामने आई कि वो मानसिक तौर पर अस्वस्थ है लेकिन, अपर सत्र न्यायाधीश लखनऊ की कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार दिया था।
- इसके खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। अपील पर फैसला सुनाते हुए बेंच ने अपने निर्णय में सेशन कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा- ''अपर सत्र न्यायाधीश ने मामले पर फैसला लेने में गंभीर गलती की है। वादी ने खुद ही एफआइआर में आरोपी को मंदबुद्धि होने की बात स्वीकर की है। ऐसे में अपर सत्र न्यायाधीश ने मेडिकल ओपीनियन पर भी ध्यान नहीं दिया।''
- इन कमेंट्स के साथ कोर्ट ने भारतीय दंड विधान की धारा-84 का लाभ देते हुए, आरोपी मां को दोषमुक्त करार दिया। साथ ही कोर्ट ने लखनऊ जिला जेल के वरिष्ठ अधीक्षक को अपीलार्थी का इलाज केजीएमयू में कराने के आदेश दिए।

जेल में कई बार मिलने गया था रामकुमार
- रामकुमार ने बताया, ''मैं कई बार पत्नी से मिलने जेल में भी गया था। मैं जानना चाहता था कि किन परिस्थितयों में उसने ऐसा वीभत्स कदम उठाया। लेकिन बार-बार पूंछने के बाद भी उसने कुछ नहीं बताया।''
- ''हर बार सवाल पूछने पर वो खिलखिला कर हंस पड़ती थी। 6 साल पहले मैंने दूसरी शादी कर ली। अब मैं उसे अपने साथ नहीं रखना चाहता।

क्या कहते हैं मानसिक विशेषज्ञ?
इस बारे में वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ शैलेंद्र कुमार के मुताबिक, "मानसिक संतुलन बिगड़ने के बाद व्यक्ति अपने होश में नहीं रहता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के कई स्टेज होते हैं। अगर वो बढ़ गया तो व्यक्ति किसी पर भी हमला कर सकता है। वो खुद को भी नुकसान पहुंचा सकता है।"

क्या कहते हैं वरिष्ठ अधिवक्ता
- हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता असीम सिंह ने बताया, ''धारा- 84 के तहत ये प्रावधान है कि कोर्ट मेडिकल रिपोर्ट्स के आधार पर किसी को दोषमुक्त कर सकती है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ी चूक केस की जांच कर रहे पुलिस अधिकारी ने की है।''
- ''जब वादी ने तहरीर में इस बात का जिक्र किया था कि महिला मानसिक रूप से विक्षिप्त है तो उसका जिक्र जांच रिपोर्ट में किया जाना चाहिए था। पुलिस को उसका मेडिकल चेकअप कराना चाहिए था।''
- ''चार्जशीट फाइल करने के दौरान ही मेडिकल रिपोर्ट को भी कोर्ट में पेश करना चाहिए था। अगर ऐसा होता तो जिस केस को सॉल्व करने में 13 साल का समय लगा, वो पहले ही खत्म हो गया होता।''

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