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30 फीट चौड़ी धधकती आग में कूदा मंदिर का पंडा, जिंदा निकला तो लोगों ने बंद कर ली आंखे

कूदने की वजह उन्होंने खुद पर प्रहलाद आने को बताया।

Danik Bhaskar | Mar 02, 2018, 08:09 AM IST
इस आग में कूदा था पंडा। इस आग में कूदा था पंडा।

मथुरा. मथुरा से 50 किमी दूर स्थित फालैन गांव में होली की एक अनोखी परंपरा निभाई गई। दिन गुरुवार, तारीख 1 मार्च। हजारों लोगों की भीड़ यह नजारा देखने के लिए इकट्ठा थी। रात तकरीबन 7.50 बजे बाबूलाल ने हवन किया, उसके बाद उसने कुंड में स्नान किया और फिर 8 बजे वो 30 फीट चौड़ी धधकती आग में कूदकर निकल गया। 10 से 15 सेकेंड के बीच बाबूलाल इस पार से उसपार चला गया। उसके शरीर पर जलने का एक निशान तक नहीं था। कूदने की वजह उन्होंने खुद पर प्रहलाद आने को बताया। कौशिक परिवार सदियों से ये परंपरा निभा रहा है। 

 

प्रहलाद का नाम लेते हुए वो आग में कूद गया

 

- मामला मथुरा से 50 किमी दूर कोसीकलां इलाके के फालैन गांव का है। इस अनोखे रिवाज के देखने के लिए हजारों लोग जमा थे।
- गांव में प्रहलाद मंदिर के बाहर 30 फीट चौड़ी होलिका सजाई गई। इसी के बगल में प्रहलाद कुंड है।
- मंदिर में बाबूलाल, प्रहलाद की पूजा में कर रहे थे। वह मन में लगातार प्रहलाद नाम जप रहे थे।
- 01 मार्च को 7.40 पर बाबूलाल, मंदिर से बाहर निकले। उन्‍होंने होलिका की पूजा की।
- इसके तुरंत बाद ग्रामीणों ने होलिका में आग लगा दी। आग की लपटें करीब तीस फीट ऊंची उठने लगीं।
- इस दौरान बाबूलाल की बहन उन्‍हें प्रहलाद कुंड तक ले गई। यहां बाबूलाल ने डुबकी लगाई और दौड़ते हुए जलती हुई होलिका में कूद गए।
- जब वह आग के बाहर निकले, तो ग्रामीणों ने उन्‍हें लपक लिया। इसके बाद उन्होंने होलिका की परिक्रमा की और घर चले गए।

 

ऐसे की आग में कूदने की तैयारी
 

- कौशिक परिवार के बाबूलाल जलती होली में कूदने के लिए वसंत पंचमी से मंदिर में रह रहे थे।
- 40 दिन तक अन्न त्यागकर वो पानी और फल का सेवन करते रहे।
- बाबूलाल धधकती होलिका में कूदने के दौरान कंधे पर एक गमछा, गले में माला, सिर पर पगड़ी और धोती पहने हुए थे।
- उन्‍होंने बताया कि उनका कौशिक परिवार सदियों से यह परंपरा निभा रहा है।

 

नहीं हुआ नुकसान
 

- बाबूलाल धधकती हुई आग में कूदकर बाहर निकल गए, लेकिन उन्‍हें कोई नुकसान नहीं हुआ।
- उन्‍होंने अपना पैर दिखाया और कहा कि पैर में राख की कालिख लग गई है। इसके अलावा कोई दिक्‍कत नहीं हुई।
- पंडा ने बताया कि जब वह मंदिर में भगवान भक्‍त प्रहलाद का जप कर रहे थे, तभी प्रहलाद उनपर आ गए। इसी वजह से कुंड में डुबकी लगाकर आग में कूद गए।

 

एक साधु के आशीर्वाद से शुरू हुई परंपरा
 

- इस गांव में गोपालजी मंदिर के संत रामानुज दास ने बताया कि कुछ सौ साल पहले गांव में एक साधु ने तपस्या की थी। 
- साधु को सपने में पेड़ के नीचे एक मूर्त‍ि दिखाई दी। अगले दिन उसने कौशिक परिवार से उसी जगह पर खुदाई करवाई।
- खुदाई में इस जगह से भगवान नरसिंह और भक्‍त प्रहलाद की प्रतिमा निकली। इन प्रतिमाओं को उसी जगह पर मंदिर बनाकर स्‍थापित कर दिया गया।
- इसी दौरान साधु ने कौशिक परिवार को आशीर्वाद दिया था कि अगर उनके परिवार के सदस्‍य शुद्ध मन से पूजा करके जलती हुई होलिका से गुजरेंगे तो उन्हें आग का असर नहीं होगा। आग में कूदने वाले व्‍यक्ति को प्रहलाद की तरह आग की लपटें नुकसान नहीं पहुंचाएंगी।
- कौशिक परिवार के 6 सदस्य धधकती आग से निकलने की परंपरा निभा चुके हैं।