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यूपी उपचुनाव: योगी समेत 24 मंत्रियों के दौरे, फिर भी गोरखपुर-फूलपुर में सपा गठबंधन की जीत, ये हैं 9 बड़े कारण

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Mar 14, 2018, 07:08 PM IST

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    सपा प्रदेश कार्यालय पर जश्न मनाते सपा कार्यकर्ता।

    लखनऊ.गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है। दोनों सीटों पर बीजेपी की करारी हार हुई है। योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर सीट जीतने के लिए 9 मार्च तक 17 जनसभाएं की थीं। वहीं, 14 मंत्री के साथ 8 सांसद और 10 विधायक में गोरखपुर में डटे रहे। जबकि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की सीट फूलपुर में सीएम योगी ने 1 मार्च से 9 मार्च को 5 रैलियां की इसके साथ 10 मंत्री,7 विधायक और 4 सांसदों ने भी किया प्रचार किया लेकिन बीजेपी गोरखपुर और फूलपुर सीट पर हार हुई है।


    गोरखपुर में बीजेपी की हार के 4 बड़े कारण ?

    पॉलिटिकल एक्सपर्ट सीनियर जर्नलिस्ट प्रदीप कपूर, श्रीधर अग्निहोत्री और गोरखपुर के रहने वाले जर्नलिस्ट रशाद लारी ने dainikbhaskar.com को हार के कारण बताए।

    1- गोरखपुर वीआईपी सीट से ज्यादा मठ से आये योगी की सीट मानी जाती रही है। ऐसे में योगी खुद चुनाव लड़ते हैं तो मठ के प्रति आस्था होती लेकिन किसी दुसरे कैंडिडेट के प्रति वह आस्था नहीं दिखाई दी। जनता का यह रुझान मतदान के दिन ही साफ हो गया था जब 43% वोटिंग हुई।
    2-गोरखपुर में समाजवादी पार्टी ने छोटी पार्टियों निषाद और पीस पार्टी से गठबंधन कर निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को कैंडिडेट बनाया। चूंकि गोरखपुर में निषाद 18.37% हैं जबकि मुस्लिम 10.50% हैं। सपा के एलायंस में पीस पार्टी का जुड़ना और कांग्रेस का लड़ाई से बाहर होने की वजह से मुस्लिम वोटों का बिखराव भी नहीं हुआ। साथ ही बीएसपी का समर्थन भी मिला जिससे बीएसपी का कैडर वोट दलित 15.75% भी भरी संख्या में आया. यही वजह रही कि सपा कैंडिडेट को जीत मिली।
    3- लोकल मुद्दों पर सिर्फ बयानबाजी भी बीजेपी को ले डूबी। जैसे मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी से हुई बच्चों की मौत, उस पर बीजेपी नेताओं की गलत बयानबाजी साथ ही अभी तक एम्स प्रोजेक्ट की शुरुआत भी नहीं हुई जबकि फर्टिलाइजर फैक्ट्री का काम भी नहीं शुरू हुआ और सीएम योगी एम्स और फर्टिलाइजर फैक्ट्री को उपलब्धियों में गिनाते रहे।
    4- गोरखपुर में बीजेपी की इंटरनल लड़ाई भी एक बड़ी वजह हार के लिए जिम्मेदार है। जिस तरह से सीएम योगी अपने कैंडिडेट को उतारना चाह रहे थे लेकिन बीजेपी नेतृत्व ने उनकी बात को न मानते हुए मठ से बाहर के कैंडिडेट को तरजीह दी। साथ ही ग्राउंड लेवल पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को तरजीह न देना भी बीजेपी के विपक्ष में नतीजा ले गया। ऐसे में उसका असर भी देखने को मिला।


    फूलपुर में बीजेपी के हार के कारण?

    पॉलिटिकल एक्सपर्ट सीनियर जर्नलिस्ट रतन मणि लाल, प्रदीप कपूर और श्रीधर अग्निहोत्री ने पूलपुर में बीजेपी की हार के 6 कारण बताए।

    1- फूलपुर में वोटिंग परसेंटेज 2014 में 50.19% था जबकि उपचुनाव में 38% वोटिंग हुई है। इस तरह 12.19% कम वोटिंग हुई है। इसका मतलब जिन्होंने भी वोट डाला है वह बंट गया है। ऐसे में यही माना जाता है कि सत्ता पक्ष का जो कैंडिडेट है उसके लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है। जैसा की रिजल्ट में भी सामने आया है। शुरूआती फर्स्ट राउंड में ही सपा कैंडिडेट आगे हो गया था। सपा को 2647 वोट मिले थे जबकि बीजेपी 2257 वोट मिले थे। इसके बाद लगातार सपा कैंडिडेट ने बढ़त बनाये रखी।

    2- उपचुनाव में विधानसभावार आंकड़े देखे तो रिजल्ट साफ़ हो जायेगा। फाफामऊ विधानसभा में 43%, सोरांव विधानसभा में 45%, फूलपुर विधानसभा में 46.32%, शहर उत्तरी विधानसभा में 21.65%, शहर पश्चिमी विधानसभा में 31% वोटिंग हुई है। इसमें 3 विधानसभा ग्रामीण क्षेत्र की है जहां ज्यादा वोटिंग हुई है। जबकि शहर की 2 विधानसभा सीटों पर कम वोटिंग हुई है। बीजेपी शहर की पार्टी मानी जाती है ऐसे में बीजेपी को शहर से वोट तो मिले लेकिन गठबंधन को ग्रामीण क्षेत्र से ज्यादा वोट मिले।

    3- फूलपुर चुनाव में दलित, पटेल और मुस्लिम निर्णायक कास्ट फैक्टर है। दलित जहां 22% हैं वहीं, मुस्लिम 17% हैं। जबकि पटेल 17% हैं। ऐसे में इन तीनों के वोट पाने वाला ही विनर हुआ है। बीएसपी समर्थित सपा कैंडिडेट को दलित, मुस्लिम के वोट के साथ पटेल वोट भी अच्छी तादाद में मिले। जबकि निर्दलीय कैंडिडेट अतीक अहमद भी मुस्लिम वोटों पर कुछ खास फर्क नहीं डाल पाए। उन्हें अपने परंपरागत वोट मिले जिसका फायदा बीजेपी को नहीं मिला। बीजेपी के कैंडिडेट पटेल होने के बावजूद पटेल वोटों में ज्यादा सेंध नहीं लगा पाए। इसलिए सपा-बसपा समर्थित कैंडिडेट की जीत हुई। आपको बता दे कि फूलपुर लोकसभा में ब्राह्मण ​7%, ​वैश्य ​7%, ​​कायस्थ ​6%, ​​​यादव ​6%, ठाकुर 4% और अन्य 15% हैं।

    4-फूलपुर सीट कभी भी बीजेपी का गढ़ नहीं रही। 1996 से 2004 तक यह सपा के खाते में रही। जबकि 2009 का चुनाव यहां से बीएसपी जीती थी। 2009 में भी लगभग 38% वोटिंग हुई थी। कम वोटिंग का फायदा बीएसपी को हुआ था और तब सपा कैंडिडेट अतीक अहमद हार गए थे। 2014 में मोदी लहर में बीजेपी के केशव प्रसाद मौर्य ने यह सीट निकाली थी। 2014 में केशव का जितना पार्टी की जीत से ज्यादा उनकी सेल्फ जीत थी क्योंकि उनकी खुद की लोकल लेवल पर पकड़ थी।

    5- फूलपुर में बीजेपी संगठन सीरियस नहीं दिखाई दिया। बीजेपी ने जो कैंडिडेट उतारा उस पर बाहरी होने का ठप्पा लगा। कौशलेन्द्र पटेल वाराणसी के मेयर रह चुके हैं। पटेल होने के नाते उन्हें कैंडिडेट बनाया गया क्योंकि इस लोकसभा क्षेत्र में 17% पटेल हैं। लेकिन स्थानीय कार्यकर्ता इससे निराश हो गए। जिससे जनसंपर्क में कमी आई और चुनाव बीजेपी हार गयी। चूंकि जब केशव मौर्य जीते थे तब वह बीजेपी अध्यक्ष थे तो उन्होंने पार्टी का पूरा सिस्टम भी यूज किया होगा।
    6-आखिरी समय में कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल नंदी ने मुलायम को रावण और मायावती को शूर्पनखा बताया था। साथ ही योगी ने भी सपा-बसपा गठबंधन को सांप-छछूंदर बताया था। जिससे दलित और ओबीसी एक जुट हो गए।

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    सीएम योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
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