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मेरी बटालियन मेरे बाप की...ब्र‍िगेड‍ियर ने कुछ यूं बताई सेना की कहानी

लखनऊ: रिटायर्ड ब्रिगेडियर अमूल्य मोहन ने बताया, आर्मी में हर व्यक्ति भावनाओं से जुड़ा होता है।

दिनेश मिश्र | Last Modified - Jan 15, 2018, 02:02 PM IST

    • ब्र‍िगेड‍ियर अमूल्य मोहन (र‍िटायर्ड)। फाइल

      लखनऊ. इंडियन आर्मी दुनिया भर की टाॅप 10 देशों में से एक है। ऐसे में 15 जनवरी को 'आर्मी डे' के मौके पर DanikBhaskar.com ने रिटायर्ड ब्रिगेडियर अमूल्य मोहन से व‍िशेष बातचीत की। उन्होंने कहा, आर्मी में हर व्यक्ति भावनाओं से जुड़ा होता है। अनुशासन के जरिए हम उसे बरकरार रखते हैं। एक साधारण व्यक्ति भी जब सेना में आता है तो उसका पूरा परिवार जिंदगी भर के लिए सेना से जुड़ जाता है। उन्होंने कहा, ''जब मैं बटाल‍ियन में था तो अध‍िकारी कहते थे, बटाल‍ियन मेरे बाप की है। मुझे गर्व है क‍ि आज मेरा बेटा भी मेजर है और कहता है क‍ि मेरी पलटन मेरे बाप की पलटन है।'' पापा फ्रीडम फाइटर थे, उनके क्रांतिकारी रूख ने मुझे आर्मी मैन बना दिया...

      - ब्रिगेडियर अमूल्य मोहन ने बताया, ''मैं मूलरूप से आगरा का रहने वाला हूं। बाद में पिता स्व. हर मोहन स्वरूप के अपने आंदोलन और क्रांतिकारी कामों के चलते बार-बार ट्रैवल की दिक्कत होने पर वो लखनऊ में ही आकर बस गए।''
      - ''इसके बाद पूरा परिवार हमेशा के लिए यहीं का हो गया। वो फ्रीडम फाइटर थे। कई बार अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने की वजह से वो जेल भेजे गए। जब देश आजाद हुआ, तब उन्हें ताम्रपत्र दिया गया।''
      - ''उनकी बचपन की ढेर सारी क्रांतिकारी कहांनियों के बीच मैं बड़ा हो रहा था। उनकी कहांनियों ने जैसे मेरे अंदर बचपन से ही एक सैनिक को जगा रखा था, इसीलिए मैं सेना में भर्ती हो गया।''
      - ''इस वक्त मेरा छोटा बेटा चिन्मय मोहन आर्मी में मेजर है। बड़ा बेटा तन्मय मोहन को बाॅलीवुड पसंद आया तो वो मुम्बई में है। वो कई फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर है।''
      - ''पत्नी ने हमेशा मेरा साथ दिया है। बच्चों पर आज गर्व है तो उसके पीछे सिर्फ मेरी पत्नी संगीता मोहन हैं, वो प्रोफेशनल टीचर हैं।''

      सैनिक स्कूल के बाद ब्रिगेडियर बनने तक सेना का हूं
      - मैंने सरोजनी नगर के सैनिक स्कूल से ही बेसिक एजूकेशन ली थी। 1973 में एनडीए में सेलेक्शन के बाद 3 साल तक वहां ट्रेनिंग ली। फिर 1 साल देहरादून मिलि‍ट्री एकेडमी में ट्रेनिंग चली।
      - दिसम्बर 1976 को मेरी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद मुझे पहली पोस्टिंग सेकेंड लेफ्टिनेंट के तौर पर पर जम्मू एंड कश्मीर में मिली। वहां के राजौरी, पुंछ इलाके में 3 साल गुजारे।
      - फिर नागालैंड में आंतरिक लड़ाई हो रही थी, वहां पर मोर्चा संभाला। इसके बाद कुछ दिनों के लिए मुझे कमांड सेंटर लखनऊ भेजा गया।
      - 1996-2000 तक मैं पूर्वोत्तर के राज्यों में ही रहा। 2005 में ब्रिगेडियर बना और उसके बाद ईस्टर्न चाइना बॉर्डर, सिक्किम के पास में पोस्ट रहा। 2012 में रिटायर हुआ।


      कश्मीर में फाइनेंस्ड टेरर है, पूर्वोत्तर में समस्याओं ने बना दिया
      - ''जम्मू-कश्मीर में जो टेररिज़्म आप देखते हैं वो प्लांड है। जिसे हमारे पड़ोसी राज्यों के जरिए फाइनेंस किया जाता है। जिससे वहां के लोकल लोगों को परेशानी होती है।''
      - ''अगर सेना को वहां से हटाया जाता है, तो सबसे पहले वहां के लोकल जो लोग हैं, उन्हें मार दिया जाएगा। ताकि वो पूरे एरिया में अपने लोगों को वहां का रिहायशी बना सकें।''
      - ''इसी तरह से जो टेररिज़्म पूर्वोत्तर राज्यों में हैं, वो कश्मीर से बिल्कुल अलग है। वहां की लोकल समस्याओं की वजह वो आंदोलनकारी हो गए। जिसे अब कुछ अराजक तत्व उकसाकर बढ़ावा देते हैं।''
      - ''सबसे ज्यादा समस्या नागालैंड, मणिपुर, आसाम में अपने ही देश के लोग हैं। जो समस्याओं और परेशानियों को लेकर अपनी बात कहते हैं, लेकिन गलत लोग उन्हें अपने हित के लिए भड़काकर देश के और सेना के खिलाफ ही आंदोलन कराते हैं। पूवोत्तर में अपने अस्तित्व को लेकर लड़ाई है, जिसको बाहरी देश बढ़ावा देते हैं।''

      हां-मेरी बटालियन मेरे बाप की है, यही हर जवान के जुबान पर रटा है
      - ''मैं जब पहली बार जम्मू एंड कश्मीर में पोस्टेड हुआ तो उस वक्त न्यू पोस्टिंग थी, जूनियर था। एक शाम को शांति के माहौल में सब बैठे हुए थे।''
      - ''तभी वहां पोस्टेड सूबेदार से किसी समकक्ष अधिकारी ने मजाकिया कमेंट करते हुए कुछ कहा तो उसने बोला- मैं आर्मी से बाहर क्यों जाऊं। इस पर उस अधिकारी ने कहा- तो क्या ये बटालियन तेरे बाप की है। इस पर सूबेदार बोला-हां, ये बटालियन मेरे बाप की है। जाकर देख लो कार्यालय के अंदर मेरे बाप का नाम पट्टी पर लिखा है। मेरा हक है यहां रहना। अपनी मर्जी से आया हूं अपने बाप के बचे हुए काम को पूरा करने के लिए।''
      - ''कश्मीर का मौसम ठंडा था, लेकिन वो सीन गर्म हो गया था। फिर हमारे ब्रिगेडियर ने सूबेदार का पक्ष लेते हुए बाकायदे तर्क दिया। क्योंकि आर्मी में 'पैरेंटल पोस्ट' एक कानून है ज‍िसके जरिए किसी भी व्यक्ति को चाहे वो सिपाही हो या अधिकारी। जिस रेजीमेंट या बटालियन से उसके पिता रहे हैं वो उसी में पोस्टिंग पाने का अधिकार रखता है। उस दिन के बाद से मैंने सोच लिया था कि मेरा बेटा भी एक दिन मेरा नाम दिखाकर बोलेगा हां- ये बटालियन मेरे बाप की है।''

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      ब्र‍िगेड‍ियर अमूल्य मोहन का बेटा भी आर्मी में है। फाइल
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      दोनों बेटे के साथ ब्र‍िगेड‍ियर अमूल्य मोहन। फाइल
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      ब्र‍िगेड‍ियर अमूल्य मोहन ने कहा- प‍िताजी थे क्रांत‍िकारी, इसल‍िए ज्वॉइन क‍िया आर्मी। फाइल
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    Web Title: Special Story Of Army Day
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