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आर्मी अफसर की बेटी है ये किन्नर, शादियों में ठुमकों के साथ करना चाहती हे ये भी

17 सालों से शादियों में नाचने वाली एक किन्नर अब नॉर्मल और नाचगाने की लाइफ एकसाथ जी रही है।

Danik Bhaskar | Jan 25, 2018, 06:58 PM IST

लखनऊ. पिछले 17 सालों से यूपी की राजधानी में होने वाली शादियों में नाचने वाली एक किन्नर अब नॉर्मल और नाचगाने की लाइफ एकसाथ जी रही है। उन्होंने इग्नू में एग्जाम देने के बाद अब रेलवे की जॉब के लिए प्रिप्रेशन शुरू कर दिया है। वो अब रेलवे में जॉब करना चाहती है, लेकिन साथ ही शादी-पार्टियों में ठुमके भी लगाती हैं। बता दें कि किन्नर सुधा एक रिटायर्ड आर्मी अफसर की बेटी हैं। इन्होंने DainikBhaskar.com के साथ अपनी स्टोरी को शेयर की।


रेलवे में जॉब कर करना चाहती है ये काम

- सुधा बताती हैं, "मैं रेलवे में टीटी की जॉब करना चाहती हूं। इसके लिया रोजाना अपने बीजी लाइफ से दो से तीन घंटे का टाइम निकालकर रेलवे की जॉब के लिए सेल्फ प्रिप्रेशन कर रही हूं।"

- "मैं टीटी की जॉब कर नकली किन्नरों को पकड़ना चाहती हूं। जो किन्नर बनकर लोगों को बेजवह परेशान करते हैं। मेरा सपना है कि 2018 तक मुझे रेलवे की जॉब मिल जाए।"
- "मैं सीएम योगी आदित्यनाथ और पीएम नरेंद्र मोदी से ये मांग करना चाहती हूं कि वे यूपी के पढ़े लिखे ट्रांसजेंडर को नौकरी में आने का मौक़ा दें।"

ऐसे पता चला नॉर्मल नहीं है सुधा

 

- सुधा बताती हैं, "मैं बिहार के सीवान की रहनेवाली हूं। मेरे पापा अमरनाथ आर्मी में जनरल थे। हम पांच भाई-बहन थे। बहनों में मैं दूसरे नंबर पर थी। मां की मौत हो चुकी है। दोनों भाई दिल्ली में जॉब करते हैं और बहनें मैरिड हैं।"
- "मैं तब छठवीं में थी जब मुझे लगा कि मैं अपने क्लासमेट्स से अलग हूं। मेरा बॉडी स्ट्रक्चर देखकर लोग मजाक बनाते थे। सिर्फ मुझे ही नहीं, मेरी फैमिली को भी पब्लिकली ताने दिए जाते थे- तुम्हारी बेटी तो किन्नर जैसी है, इसे नाचने-गाने भेज दो।"
- "मैं घर आकर अकेले में घंटों रोती थी। भाई-पापा तो बाहर वालों से लड़ाई भी कर लेते थे कि हमारी बेटी को ऐसे क्यों कह रहे हो। वो मुझे सपोर्ट करते थे, कभी मुझसे कुछ नहीं कहा, लेकिन फिर भी मुझे बुरा लगता था।"

चार साल बाद लिया घर छोड़ने का फैसला

 

- सुधा के मुताबिक, ''मैं 14 साल की उम्र में घर से भागकर लखनऊ आ गई। तब मैं 10वीं की स्टूडेंट थीं।''
- "मैं बड़ी हो रही थी और लोगों के ताने बढ़ रहे थे। मैंने सोचा कि मेरी वजह से फैमिली क्यों परेशान हो। इसलिए 1999 में ट्रेन पकड़कर लखनऊ आ गई।"
- "मैं चारबाग स्टेशन पर खड़ी थी। कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या करूं। मैंने एक ऑटोवाले से शहर में किन्नरों के घर के बारे में पूछा तो वो मुझे सहादतगंज छोड़ गया। मेरी जेब में कुल 100 रुपए थे। मैं वहां पता पूछते हुए किन्नर समाज तक पहुंच गई, जहां मेरी मुलाकात अखाड़े के गुरु से हुई।"

पापा नहीं करते बात

 

- सुधा किन्नर अखाड़ा में संध्या गुरु से मिली और उन्होंने खुशी-खुशी उसे अपने साथ रख लिया।
- सुधा बताती है, "उन्होंने मुझे मां-बाप का प्यार दिया। 17 साल से उनके साथ हूं और आगे भी रहना चाहती हूं। बस, अब नाच-गाना अच्छा नहीं लगता।"
- वो रेलवे में नौकरी करना चाहती हैं, जिसके लिए इग्नू में एडमिशन लिया है। सुधा जीके, हिस्ट्री आदि सब्जेक्ट्स की किताबें पढ़ती रहती हैं। वो रेलवे एग्जाम की तैयारी में जुटी हैं।
- क्या फैमिली से बात होती है, इस पर उन्होंने बताया, "पापा को छोड़कर सभी से बात होती है। पापा आज भी मेरे घर से भागने वाली बात से नाराज हैं।"