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मां को तड़पता देख बनना चाहता था Dr., बदल दी 100 भिखारियों की LIFE

शरद पटेल ने DainikBhaskar.com से बातचीत की और अपने एक्सपीरिएंसेज शेयर किया।

Danik Bhaskar | Dec 08, 2017, 12:18 AM IST
यूपी के हरदोई जिले के रहने वाले शरद पटेल की मां को ब्लड कैंसर था। यूपी के हरदोई जिले के रहने वाले शरद पटेल की मां को ब्लड कैंसर था।

लखनऊ. यूपी के हरदोई जिले के रहने वाले शरद पटेल ने ब्लड कैंसर से तड़पती मां को देख डॉक्टर बनने का सपना देखा था। वो चाहते थे कि डॉक्टर बनकर गरीबों का फ्री इलाज करें, लेकिन एक भिखारी से मुलाकात के बाद उसने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़ दिया। डॉ. शकुंतला मिश्रा यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई कर रहे शरद के एक आइडिया ने आज 100 से ज्यादा भिखारियों को आत्म निर्भर बनाकर उनकी लाइफ चेंज कर दी है। DainikBhaskar.com से बातचीत में शरद ने अपने एक्सपीरिएंसेज शेयर किया।

मां को तड़पता देख लिया था डॉक्टर बनने का फैसला
- शरद पटेल (28) बताते हैं- ''मेरा जन्म 24 जुलाई 1989 में हरदोई डिस्ट्रिक्ट के मिरजागंज गांव में हुआ था। पिता मिश्रीलाल पेशे से किसान और मां असरकली देवी हाउस वाइफ थीं।''
- ''घर में हम तीन भाई और एक बहन थे। मैं सेकेंड नंबर का था। बचपन अच्छे से नहीं बीता, फाइनेंसियल प्रॉब्लम से गुजरना पड़ा। पिता की फिक्स इनकम न होने के कारण बड़े मुश्किल हालात में भाई-बहनों ने पढ़ाई कम्प्लीट की।''

- ''2003 में मैं हाईस्कूल में था, उसी टाइम मां को ब्लड कैंसर हो गया। लखनऊ के विवेकानंद हॉस्पिटल में ट्रीटमेंट चल रहा था। मैं डेली हरदोई से लखनऊ मां को देखने आया करता था।''

- ''मां को कैंसर से तड़पता देख मैं खूब रोता था। उस टाइम घर में पैसे की प्रॉब्लम भी थी। 3 साल तक चले इलाज के बाद 3 सितंबर 2003 को मां की डेथ हो गई।''

- ''उसी समय मैंने फैसला किया था कि एक दिन डॉक्टर बनकर गरीबों का फ्री इलाज करूंगा। इसी वजह से इंटर के बाद बीएससी की पढ़ाई की, ताकि डॉक्टर बन सकूं। लेकिन ये ख्वाहिश पूरी न हो सकी।''

- ''2013 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई कर रहा था। एक दिन चारबाग से हरदोई घर जा रहा था। उसी दौरान मेरी नजर नत्था होटल के पास एक भिखारी पर पड़ी। उसके कपड़े फटे हुए थे। वो ठीक से चल फिर नहीं पा रहा था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे।''

- मैं उसके पास गया। उसने बताया- वो दो दिनों से भूखा है। पैसे नहीं है, 10 रुपए चाहिए। उसकी बातों से मेरा दिल भर आया। मैंने उसे पैसे देने के बजाए एक दुकान पर ले जाकर भरपेट खाना खिलाया। खाना खाने के बाद उसने ढेर सारी दुआएं दीं।''

- ''वहीं से मेरे मन के अंदर भिखरियों के लिए कुछ करने की ललक पैदा हुई। मैंने डॉक्टर बनने का इरादा छोड़कर भिखारियों के लिए काम करने का डिसीजन ले लिया।''

इस वजह से पिता ने 6 महीने तक नहीं की थी बात

- ''मैंने 2013 से ही भिखारियों के लिए काम करना शुरू कर दिया। ये बात मेरे बड़े भाई देवेश पटेल और पिता मिश्रीलाल को पता चल गई। भाई ने तो मेरा सपोर्ट किया, लेकिन पापा नाराज हो गए। वे चाहते थे कि मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी कर IAS अधिकारी बनूं। उन्होंने मुझे काफी समझाया। लेकिन मैंने उनकी बात नहीं मानी।''

- ''भाई ने मेरी मुलाकात मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित संदीप पांडेय से कराई। मैंने उनसे मिलकर 'भिक्षावृति मुक्ति अभियान' के बारे में चर्चा की। वे तैयार हो गए।''

- ''2010 में भिखारियों के लिए काम करने पर लोगों ने मेरा खूब मजाक उड़ाया। कोई मुझे बेवकूफ तो कोई पागल कहता था। कुछ लोगों ने समझाने की भी कोशिश की। कहा, तुम पागल हो गए हो क्या? भीख मांगना तो भिखारियों का काम होता है। उन्हें भीख मांगना छुडवाकर आखिर क्या साबित करना चाहते हो। लेकिन मैंने किसी की बात का कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप अपने काम में लगा रहा।''

- ''2014 में मैंने संदीप पांडेय के साथ मिलकर भिक्षावृति मुक्ति अभियान की शुरुआत की और भिखारियों के जीवन में सुधार लाने के लिए काम करने लगा। इस वजह से पापा मुझसे से नाराज हो गए और 6 महीने तक मेरे से बात नहीं की।''

- ''बाद में उन्हें लगा कि बेटा मेरी बात नहीं मानेगा तो उन्होंने मुझसें बात करना शुरू कर दिया। इस टाइम घरवाले मेरे काम से काफी खुश हैं। बड़े भाई और पापा दोनों मिलकर मुझे पैसे भेजते रहते हैं।''

एक आइडिया ने बदल दी 100 से ज्यादा भिखारियों की लाइफ

- ''मैंने जब भिक्षावृति मुक्ति अभियान के लिए वालंटियर्स के रूप में काम करना शुरू किया तब तरह तरह के भिखारियों से मेरी मुलाकात हुई। मैंने उनके भीख मांगने के तौर तरीकों का काफी गहनता से अध्ययन किया। इस दौरान मेरी एक अलग तरह के भिखारी पर नजर पड़ी। वह रोज पांव पर मलहम लगाकर मन्दिर के बाहर बैठकर भीख मांगता है।''

- ''मेरे मन में ये आइडिया आया कि उन्हें भीख देकर या खाना खिलाकर हम एक या दो टाइम उनका पेट भर सकते हैं, लेकिन ये इस प्रॉब्लम का प्रापर सॉल्यूशन नहीं होगा। इससे बेरोजगारी और बढ़ेगी। दूसरे लोग भी देखादखी काम-धंधा छोड़कर भीख मांगना शुरू कर देंगे, इसलिए क्यों न हम उन्हें कोई काम सीखा दे या उनकी काउंसिलिंग करें, ताकि वे भीख मांगना छोड़कर कोई काम धंधा करें।''

- ''मैंने भिखारियों के बीच जाकर उनका भरोसा जीता और उन्हें भीख मांगना छोड़कर मेहनत मजदूरी करने के लिए प्रेरित किया। 100 से ज्यादा भिखारियों ने मुझ पर भरोसा किया। उन्होंने भीख मांगना छोड़कर रिक्शा चलना, चाट के ठेले लगाना, शादी विवाह और होटलों में काम करना शुरू कर दिया।''

शरद कहते हैं, 2003 में मां की ब्लड कैंसर से तड़प तड़पकर मौत हो गई थी। तभी मैंने डॉक्टर बनने का फैसला किया था। शरद कहते हैं, 2003 में मां की ब्लड कैंसर से तड़प तड़पकर मौत हो गई थी। तभी मैंने डॉक्टर बनने का फैसला किया था।
शरद बताते हैं, रेलवे स्टेशन पर मुझे एक भि‍खारी मिला था, उससे मिलकर मैंने डॉक्टर बनने के फैसले को बदल दिया। शरद बताते हैं, रेलवे स्टेशन पर मुझे एक भि‍खारी मिला था, उससे मिलकर मैंने डॉक्टर बनने के फैसले को बदल दिया।