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हनुमान चालीसा से पृथ्वी-सूर्य की दूरी नाप रहे हैं इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स

कॉलेज की डायरेक्टर का कहना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई को एक सेट ढर्रे से हटाने के लिए उन्होंने ये पहल की है।

dainikbhaskar.com | Last Modified - Aug 12, 2015, 09:22 AM IST

  • 12 अगस्त को इंटनेशनल यूथ डे मनाया जाता है। इस अवसर पर dainikbhaskar.com आपको ऐसे स्टूडेंट्स से मिलाने जा रहा है, जो मॉर्डन साइंस जैसे कठिन सब्जेक्ट को वेद-पुराण से जोड़कर आसान बना रहे हैं। साथ ही इंजीनियरिंग की पढ़ाई के पुराने ढर्रे पर न चलकर इसे नए आयाम की तरफ ले जा रहे हैं।
    लखनऊ.'जुग सहस्त्र जोजन पर भानू, लिल्यो ताहि मधुर फल जानू', हनुमान चालीसा की ये लाइनें तो आपने खूब सुनी होंगी, लेकिन ये जानकर हैरानी होगी कि राजधानी के स्टूडेंट्स इसी दोहे से सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी कैलकुलेट कर रहे हैं। जी हां, एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई कर रहे ये छात्र मॉर्डन साइंस को वेद-पुराण से जोड़कर पढ़ते हैं। इससे उन्हें कठिन से कठिन चीजें भी आसानी से समझ में आ जाती हैं। कॉलेज की डायरेक्टर का कहना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई को एक सेट ढर्रे से हटाने और छात्रों पर दबाव कम करने के लिए उन्होंने ये पहल की है।
    स्टूडेंट्स के अनुसार, उन्हें मॉर्डन टेक्निक से इस तरह के डिस्टेंस कैलकुलेट करने का फॉर्मूला तो पता है, लेकिन वे प्रोफेसर डॉ. भरतराज सिंह की प्रेरणा से साइंस को वेद-पुराण और रचनाओं के साथ जोड़कर पढ़ते हैं। इससे न सिर्फ इंजीनियरिंग की पढ़ाई इंट्रेस्टिंग बन जाती है, बल्कि इन्हें आगे चलकर इनवायरमेंट फ्रैंडली इनोवेशन की भी प्रेरणा मिलती है।
    ऐसे कैलकुलेट होता है डिस्टेंस?
    बीटेक के छात्र ज्ञानेंद्र ने बताया कि 'युग' का मतलब चार युगों कलयुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग से है। कलयुग में 1200 साल, द्वापर में 2400 साल, त्रेता में 3600 और सतयुग में 4800 साल माने गए हैं, जिनका कुल योग 12000 साल है। 'सहस्त्र' का मतलब 1000 साल है। 'योजन' का मतलब 8 मील से होता है (1 मील में 1.6 किमी होते हैं)। अब अगर 1 योजन को युग और सहस्त्र से गुणा कर दिया जाए तो 8 x 1.6 x 12000 x 1000=15,36,00000 (15 करोड़ 36 लाख किमी), जोकि सूर्य से पृथ्वी के बीच की प्रमाणिक दूरी है।
    क्या है दोहे का अर्थ
    'जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु। लील्यो ताहि मधुर फल जानू' इस दोहे का सरल अर्थ यह है कि हनुमानजी ने एक युग सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित भानु यानी सूर्य को मीठा फल समझकर खा लिया था।
    आगे की स्लाइड्स में पढ़िए, इननो-वैदिक इंजीनियरिंग के और भी हैं फंडे...
  • इननो-वैदिक इंजीनियरिंग के और भी हैं फंडे
    इस कॉलेज के डायरेक्टर डॉ. बीआर सिंह की मानें तो उन्होंने अपने काम के दौरान पाया कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई एक सेट ढर्रे पर चलती है। इससे छात्रों पर हमेशा दबाव बना रहता है और रुचि भी कम हो जाती है। इसलिए उन्होंने छात्रों की पढ़ाई को इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए इंस्टीट्यूट में एक वैदिक-साइंस सेंटर की इसी साल स्थापना की।
    तकनीक और संस्कृति को जोड़कर होती है पढ़ाई
    यहां पर स्टूडेंट्स को तकनीक और संस्कृति को जोड़कर ये बताया जाता है कि हमारे प्राचीन वेद-पुराण और ग्रंथों में उस समय के वैज्ञानिक भारत का इतिहास छुपा है। बस जरूरत है, उसको डिकोड करने की। इस सेंटर में एयरोडाइनामिक जैसी इंजीनियरिंग टेकनिक्स के साथ-साथ ऐसे इनोवेशन करने पर जोर दिया जाता है, जो प्राचीन काल की आविष्कारों की तरह इको फ्रैंडली हो। ऐसे में 'इननो-वैदिक' इंजीनियर्स की तैयार हो रही ये पौध आगे चलकर हमारी साइंस को एक अलग ही आयाम देगी।
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Web Title: Engineering Study By Vedic Mythology Special Story On Youth Day
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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