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दिल दिमाग से एवरेस्ट पर विजय पाई, पैरों से नहीं : लखनऊ पुस्तक मेले में अरुणिमा सिन्हा

पहले लक्ष्य निर्धारित कीजिए। फिर इस तरह उस तरफ बढ़िए कि ऊपर वाला खुद वह लक्ष्य देने को मजबूर हो जाए - अरुणिमा

dainikbhaskar.com | Last Modified - May 02, 2018, 07:35 PM IST

दिल दिमाग से एवरेस्ट पर विजय पाई, पैरों से नहीं : लखनऊ पुस्तक मेले में अरुणिमा सिन्हा

लखनऊ।‘मैंने अपना मिशन अपने दिल और दिमाग से किया, पैरों से नहीं......फोकस करके अगर कुछ भी किया जाए तो अंततः वह लक्ष्य हासिल हो जाता है।..... अब मेरा लक्ष्य दिसम्बर तक अंटार्कटिका की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराने का है।’

दुर्घटनावश अपना एक पैर खो चुकी एवरेस्ट विजेता अरुणिमा सिन्हा ने ये विचार यहां संगीत नाटक अकादमी परिसर गोमतीनगर में चल रहे लखनऊ पुस्तक मेले में सम्मानित होने के अवसर पर व्यक्त किए। यहां उन्हें साई दिल्ली के निदेशक राजीव सरीन, साई लखनऊ की अधिशासी निदेशक रचना गोविल, अंतर्राष्ट्रीय रेफरी वाटर स्पोट्र्स सुधीर शर्मा, प्रदेश ओलम्पिक संघ के उपाध्यक्ष टीपी हवेलिया, मेला संयोजक मनोज सिंह चंदेल ने स्मृतिचिह्न देकर सम्मानित किया।

21 मई 2013 पर एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ने वाले दिन को सबसे साझा करते हुए पद्मश्री अरुणिमा ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि आज के युग में युवाओं की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे लक्ष्य नहीं निर्धारित करते। जीवन में पहले लक्ष्य निर्धारित कीजिए। फिर इस तरह उस तरफ बढ़िए कि ऊपर वाला खुद वह लक्ष्य देने को मजबूर हो जाए। जब आप संघर्ष से जब कुछ हासिल करते हैं तो वो कहानी पूरी दुनिया जानना चाहती है। अपने कटे हुए पैर को मैंने अपना हथियार या यूं कहें कि अपनी कमज़ोरी को मैंने अपनी ताकत बनाया।

पुस्तक मेले का आज पांचवा दिन था। मेले में डायमण्ड बुक्स, स्कालिस्टक, वेस्टलैण्ड, प्रकाशन संस्थान, सेण्टर फार साइंस एण्ड इन्वार्यनमेण्ट दिल्ली, पब्लिकेशन डिवीजन, फाउण्टेन इंक ब्राडकास्टिंग एण्ड पब्लिशिंग चेन्नई, ईशा फाउण्डेशन कोयम्बटूर, आईआरएच प्रेस इण्डिया मुम्बई, दि गिडिओन्स इंटरनेषनल, विलायत फाउण्डेशन, विधि बुक्स अहमदाबाद, जय बुक्स मुम्बई, राजा बुक्स, द स्टूडेण्ट बुक सेण्टर, पदम बुक कंपनी साक्षी प्रकाशन आदि के स्टालों पर खरीदार देखे गए।

लेखक से संवाद कार्यक्रम में कथाकार शिवमूर्ति ने बताया कि कथा लेखन के लिए सतत अभ्यास और श्रम बहुत जरूरी है। इनसे पहले रचनाकार दयानन्द पाण्डेय प्रशंसकों और पाठकों के बीच थे। इससे पहले काव्यपाठ का कार्यक्रम भी हुआ।

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