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अयोध्या 6 दिसंबर 1992 / एक दिन पहले ही तय हो गया था ढांचा गिराएंगे कारसेवक; बेकाबू भीड़ को न फोर्स संभाल पा रही थी, न उनके नेता

विवादित ढांचे की फाइल फोटो। विवादित ढांचे की फाइल फोटो।
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विवादित ढांचे की फाइल फोटो।विवादित ढांचे की फाइल फोटो।

  • विवादित ढांचा गिरने वाले दिन की आंखों देखी, घटना को कवर करने वाले पत्रकारों ने बताई कहानी
  • अयोध्या के स्थानीय पत्रकारों ने कारसेवकों से बातचीत कर स्टोरी फाइल की थी- 6 दिसंबर की शाम तक गिर जाएगा ढांचा

Dainik Bhaskar

Dec 05, 2019, 08:05 AM IST
लखनऊ. 6 दिसंबर 1992 को उत्तरप्रदेश की सियासत ने अचानक करवट बदल ली थी। कारसेवकों की बेकाबू भीड़ ने यहां का ढांचा गिराया था। ढांचा गिरने के साथ उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों की सरकारें भी गिर गई थीं। कारसेवा करने के लिए पहुंचे लोगों को जब उनके नेताओं ने बताया कि वह यहां सिर्फ चबूतरे की धुलाई-सफाई करेंगे तो वह भड़क गए और ढांचे पर चढ़कर उसे गिराने लगे। उस दिन अयोध्या में रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार बताते हैं कि 5 दिसंबर की शाम को ही तय हो गया था कि कारसेवक ढांचा गिरा देंगे।
  • वैन से फाड़ना पड़ा था मीडिया का स्टीकर, महंत और कारसेवकों को कार में बैठाकर निकले

    वैन से फाड़ना पड़ा था मीडिया का स्टीकर, महंत और कारसेवकों को कार में बैठाकर निकले

    सीनियर जर्नलिस्ट वीएन दास

    सीनियर जर्नलिस्ट वीएन दास बताते हैं कि विहिप के आह्वान पर 6 दिसंबर को देशभर से लाखों कारसेवक आए थे। कारसेवा के दिन सुबह विहिप वे संतों की सभा शुरू हुई, जिसमे भाजपा के कई दिग्गज नेता भी मौजूद थे। यहां मंदिर शिलान्यास के चबूतरे पर आगे के निर्माण को लेकर कारसेवा करने रामभक्त आए थे। विवादित स्थल के सामने मानस भवन की आखिरी मंजिल के छत पर देश भर से आए पत्रकारों को समाचार कवर करने की व्यवस्था विहिप ने की थी, लेकिन कारसेवा की जगह जब शिलान्यास के चबूतरे की केवल धुलाई-सफाई करने का ऐलान किया गया तो कारसेवक नाराज हो गए।  इस बीच एक जत्था बैरीकेडिंग को तोड़ कर आगे बढ़ गया। जय श्रीराम के नारे लगाता हुआ विवादित ढांचे पर चढ़ कर उसे तोड़ने लगा। थोड़ी ही देर तीनों गुंबदों का काफी हिस्सा कारसेवकों ने ढहा दिया। दोपहर तक हम लोग वहां से अपनी वैन से फैजाबाद ब्यूरो की ओर चल पड़े। उस वैन में महंत नृत्य गोपाल दास को बैठाया और दो घायल कारसेवकों को भी बिठाया साथ ही वैन से मीडिया का स्टीकर हटा दिया, तब हम सकुशल अपने ऑफिस पहुंचे। शाम तक पूरा ढांचा ध्वस्त हो चुका था। रात नौ बजे तक दुर्गा वाहिनी की महिलाओं के सहयोग से नया मंदिर अपना स्वरूप ले चुका था। अयोध्या के स्थानीय पत्रकारों को एक दिन पहले ही सूचना मिल गई थी कि 6 दिसंबर को ढांचा ध्वस्त हो जाएगा। एक दिन पहले जो कारसेवक एकत्र हुए थे, उनका इरादा साफ था कि वह यहां सफाई करने नहीं बल्कि ढांचा गिराने आए हैं।

  • फोटो खींचने वालों को रोकने और पीटने में लगे थे 5-10 कारसेवक

    फोटो खींचने वालों को रोकने और पीटने में लगे थे 5-10 कारसेवक

    वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट मनोज छाबड़ा

    वरिष्ठ फोटो जर्नलिस्ट मनोज छाबड़ा ने बताते हैं कि- 6 दिसंबर 1992 को फोटोग्राफर पर हमला प्री प्लान था, क्योंकि 11.30 पर जैसे ही कारसेवक गुंबद पर चढ़े, पत्रकारों पर हमले शुरू हो गए थे। हर पत्रकार पर 5 से 10 कारसेवक उन्हें मारने में और फोटो खींचने से रोकने में लगे हुए थे। जो भी ग्राउंड पर रिपोर्टिंग कर रहे थे, उन सबको पीटा गया। कारसेवक जब विवादित इमारत के पीछे से चढ़ने लगे तो हम लोग फोटो खींच रहे थे। तभी कारसेवक आक्रामक हो गए। उनका पहला शिकार मैं ही बना। मुझे कारसेवकों ने विदेशी चैनल का फोटोग्राफर समझ लिया, जबकि मैं चिल्लाता रहा कि मैं भारतीय अखबार से हूं। उन्होंने मेरे दोनों हाथ पीछे से पकड़ लिए और लगातार मारते रहे। हमले का अंदाजा होने पर मैंने रील निकालकर जेब में डाल दी थी। कुछ कारसेवकों ने मुझे सलाह दी कैमरा दे दो जान बच जाएगी। मैंने अपना कैमरा उन्हें दे दिया। कैमरा लेने के बाद भी वह शांत नहीं हुए उन्होंने मेरी जेब टटोलनी शुरू कर दी। जेब में रखी कैमरे की रील भी निकाल ली। जैसे-तैसे उनसे पिंड छुड़ा कर मैं वहां से भागा।

  • कारसेवकों ने पीटा भी बचाया भी

    कारसेवकों ने पीटा भी बचाया भी

    फोटो जर्नलिस्ट अशफाक अहमद

    फोटो जर्नलिस्ट अशफाक अहमद बताते हैं कि वह पांच दिसम्बर को ही कवरेज के लिए अयोध्या पहुंच गए थे। उस समय इंटरनेट का दौर नहीं था, इसीलिए कवरेज करके उसी रात हम लोग वापस लखनऊ आ गए थे ताकि दिनभर की जो तस्वीरें थी वो अखबार में फाइल की जा सकें। अगली सुबह 6 दिस्म्बर को आठ बजे तक अयोध्या पहुंचे। अयोध्या पहुंचने के बाद अपनी कवरेज में जुट गए। बाबरी ढांचे के पास कारसेवकों का हुजूम जुटा था। सुबह 11.15 बजे मस्जिद का पहला गुबंद तोड़ दिया गया था। मंच पर लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल उमा भारती, विनय कटियार आदि मौजूद थे। ये लोग कारसेवकों से लगातार उतरने के लिए कह रहे थे। पांच बजे तक ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था। लाखों के भीड़ के बीच कैमरा लेकर फोटो लेना आसान नहीं था। भीड़ लगातार कैमरामैनों को निशाना बना रही थी। उग्र भीड़ ने फोटोग्रॉफरों को टारगेट किया और कैमरे छीन लिए। कार सेवकों ने मारापीटा, बाद में वह ही अस्पताल में भर्ती कराने गए। अयोध्या से एंबुलेंस से फैजाबाद अस्पताल लाया गया था। हाथ और सिर फट गया था। किसी तरह लखनऊ रवाना हुए।

  • कारसेवकों ने जमा कर रखे थे फावड़ा और कुदाल

    कारसेवकों ने जमा कर रखे थे फावड़ा और कुदाल

    सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश शुक्ला

    सीनियर जर्नलिस्ट बृजेश शुक्ला उस समय एक अखबार में राजनीतिक रिपोर्टर के तौर पर काम कर रहे थे। वह बताते हैं कि- 5 दिसम्बर की शाम को ही अयोध्या में तैयारियां होने लगीं थीं। सुबह होते ही कुछ कारसेवक आक्रामक होने लगे। उनकी जिद थी कि हम कारसेवा करेंगे। यह पूरा अभियान विहिप और अशोक सिंघल के कंट्रोल में था। अशोक सिंघल लगातार अपील कर रहे थे कि नीचे आ जाइए नहीं तो चोट लग जाएगी, लेकिन कारसेवक उनकी सुनने को तैयार नहीं थे। उनके हाथों में फावड़ा और कुदाल थे, जो उन्हें किसी ने दिए नहीं थे। वे काफी समय से इन्हें अपने पास एकत्र किए थे। विवादित ढांचे के पास ही दस या साढ़े दस बजे कारसेवकों का एक जत्था बैरियर की तरफ बढ़ा और पुलिस के साथ छीना झपटी करने लगा। उग्र भीड़ ने बैरियर को तोड़ दिया और तेजी से आगे बढ़ गई। लोग गुबंद पर चढ़कर तोड़-फोड़ करने लगे।

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