BSP सुप्रीमो मायावती बचपन में देखती थीं IAS बनने का सपना; पर टीचर बनीं, राजनीति में आईं तो पिता ने छोड़ दिया था साथ / BSP सुप्रीमो मायावती बचपन में देखती थीं IAS बनने का सपना; पर टीचर बनीं, राजनीति में आईं तो पिता ने छोड़ दिया था साथ

बर्थडे आज: माया की जिंदगी का हर पड़ाव कहता है एक दिलचस्प कहानी

dainikbhaskar.com

Jan 14, 2019, 09:39 PM IST
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लखनऊ। BSP सुप्रीमो मायावती का जन्म 15 जनवरी 1956 को हुआ था। आज उनका 63वां जन्मदिन है। मायावती बचपन में IAS अफसर बनना चाहती थीं। लेकिन वे पहले टीचर बनीं और फिर राजनीति में आईं। पॉलिटिक्स में आने पर उनके पिता ने उनका साथ तक छोड़ दिया था। उनके राजनीतिक करियर से लेकर जिंदगी के हर मोड़ की कहानी बेहद दिलचस्‍प है। हाल ही में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ लोकसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन की घोषणा की है। आइए जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें......

राजनीति में आने से पहले दिल्‍ली में थीं टीचर

- 15 जनवरी, 1956 को मायावती ने एक साधारण परिवार में जन्म लिया। इसके करीब 11 महीने बाद बाबा भीमराव अंबेडकर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। मायावती का जन्म नई दिल्ली में एक सरकारी कर्मचारी प्रभु दयाल और रामरती के घर हुआ था।
- उनके पिता दूरसंचार विभाग में क्लर्क के पद पर तैनात थे। मां रामरती ने अनपढ़ होने के बाद भी बच्‍चों को शिक्षा दिलाई। इनके छह भाई और दो बहने हैं। इनका पुश्तैनी गांव यूपी के गौतमबुद्ध नगर जिले में बादलपुर है।
- मायावती अपनी आत्मकथा में लिखती हैं ग्रैजुएशन के बाद दिल्ली के कालिंदी कॉलेज से एलएलबी और उसके बाद बीएड किया। फिर दिल्ली के एक स्कूल में टीचर बन गईं। बचपन में देखा आईएएस बनने का सपना पूरा करने के लिए तैयारी भी करने लगीं।

साधारण टीचर से पार्टी सुप्रीमो बनने की कहानी

- मायावती बाबा साहब डॉ. अंबेडकर की जीवनी और उनकी किताबें पढ़कर दलित आंदोलन में शामिल हुईं। इन किताबों से मायावती का पहला परिचय उनके पिता ने कराया था।
- मायावती आत्मकथा में लिखती हैं, "तब मैं आठवीं में थी। एक दिन पिता से पूछा अगर मैं भी डॉ. अंबेडकर जैसे काम करूं तो क्या वे मेरी भी पुण्यतिथि बाबा साहब की तरह ही मनाएंगे?"
- - एक साधारण टीचर से अपना करियर शुरू करने वाली मायावती ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे। उनके पिता ने उन्हें राजनीति में जाने से रोका, जिसके चलते उन्‍हें अपने पिता को छोड़ने का दर्द सहना पड़ा।
- सके बावजूद भी उन्‍होंने कभी हार नहीं मानी और सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गईं। बताते चलें कि मायावती अभी तक यूपी की चार बार सीएम बन चुकी हैं।
- उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय इसलिए लिया ताकि जीवनभर समग्र और एकनिष्ठ भाव से बहुजन समाज के लोगों की सेवा में स्वयं को समर्पित कर सकें।
आगे पढ़ें: कांशीराम से मुलाकात के बाद शुरू हुआ राजनीतिक सफर....

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कांशीराम से मुलाकात के बाद शुरू हुआ राजनीतिक सफर 
- मायावती की मुलाकात कांशीराम से कैसे हुई, इसके पीछे भी एक कहानी है। साल 1977 जनता पार्टी द्वारा दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में 'जाति तोड़ो' नामक एक तीन दिवसीय सम्मलेन आयोजित किया गया था। 
- यह कार्यक्रम मायावती की जिंदगी में टर्निंग प्‍वॉइंट बना। यहां नेतागण अपने संबोधन में हरिजन शब्द प्रयोग कर रहे थे। ऐसे में, जब मायावती की बारी आई तो उन्‍होंने हरिजन शब्द पर आपत्ति जताई। 
- उन्‍होंने कहा-एक ओर जाति तोड़ने की बात हो रही है और दूसरी ओर ऐसे शब्‍दों का प्रयोग हो रहा है। उनकी इस बात को सुनकर लोगों ने उनके विचारों की काफी सराहना भी की थी। इसी घटना से मायावती का राजनीतिक करियर शुरू हुआ।

आगे पढ़ें: जब कांशीराम ने कहा देश में आईएएस की नहीं, नेता की जरूरत है....

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जब कांशीराम ने कहा देश में आईएएस की नहीं, नेता की जरूरत है

- एक बार कांशीराम मायावती के घर उनसे मिलने पहुंचे। यहां आकर उन्‍होंने देखा कि मायावती की टेबल कई सारी किताबें रखी थीं और वह पढ़ाई कर रही थीं। इस दौरान कांशीराम ने माया से पूछा कि आप क्‍या बनना चाहती हैं, तो उन्‍होंने जवाब दिया कि आईएएस। 
- इसके बाद कांशीराम ने कहा कि देश में IAS की कमी नहीं है, बल्कि एक अच्‍छे नेता की कमी है। यदि नेता अच्‍छा होगा तो अधिकारी काम भी अच्‍छा करेंगे। इसके बाद से मायावती ने पढ़ाई छोड़ दी और राजनीति में आने का फैसला ले लिया।

बामसेफ से की शुरुआत, छोड़ दिया घर

- मायावती पहले बामसेफ और फिर डीएस फोर में सक्रिय हुईं। दोनों संगठनों की स्थापना क्रमश: 1978 और 1981 में हुई थी। यह वह समय था जब दलित आंदोलन का कोई भविष्य नहीं दिखता था।
- 1984 में बहुजन समाज पार्टी बनने पर मायावती सक्रिय राजनीति में उतरीं, पर पिता इसके विरोध में थे। पिता ने कहा- अगर कांशीराम का साथ नहीं छोड़ा तो उन्हें परिवार से अलग कर दिया जाएगा। 
- मायावती लिखती हैं, "पिता जानते थे लड़की घर छोड़कर नहीं जा सकती। उन्होंने मुझ पर दबाव बनाया, लेकिन मैंने उनकी नहीं सुनी।" इसके बाद मायावती ने घर छोड़ दिया।

आगे पढ़ें: जब मायावती ने लड़ा पहला चुनाव....

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जब मायावती ने लड़ा पहला चुनाव

- मायावती ने राजनीति में कदम तो रख दिया था, लेकिन उन्हें अभी बहुत संघर्ष करना था। बसपा के गठन के बाद उन्होंने 1985 में बिजनौर से लोकसभा का उपचुनाव लड़ा। इस चुनाव में वह 61,504 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। 
- इसके बाद मायावती 1987 में हरिद्वार सीट से चुनाव लड़ी और 1,25,399 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। ऐसे में, बड़े संघर्षों के बाद वह साल 1989 में बिजनौर से 1,83,189 वोटों के साथ पहली बार सांसद के लिए चुन ली गईं।

गेस्ट हाउस कांड ने बदली मायावती की जिंदगी

- साल 1993 में बसपा और सपा में गठबंधन हुआ था। इस गठबंधन ने चुनाव जीता और समझौते के तहत मुलायम सिंह यूपी की सीएम बने। इसके बाद आपसी खींचतान के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। 
- इससे मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई। इस बात से नाराज होकर सपा के कार्यकर्ता एमपी और एमएलए के नेतृत्व में मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंचकर उसे घेर लिया। 
- यहां बसपा सुप्रीमो मायावती कमरा नंबर 1 में रुकी थीं। वहां मौजूद बसपा के एमएलए और कार्यकर्ता मौजूद थे, उन्हें सपा कार्यकर्ताओं ने मारपीट कर बंधक बना लिया। इसी घटना के बाद बाद हुए विधानसभा चुनावों में मायावती बीजेपी के समर्थन से यूपी की मुख्यमंत्री बनीं।  

आगे पढ़ें: कैसे बढ़ा बसपा का जनाधार...

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कैसे बढ़ा बसपा का जनाधार

- वरिष्‍ठ पत्रकार कमल जैन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि बसपा ने यूपी से शुरुआत की, साल 1985 में बसपा मान्यता प्राप्त पार्टी बन गई थी। साल 1989 में हुए आम चुनावों में जब बिजनौर से मायावती चुनाव जीतीं, तब बसपा को कुल 13 सीटें मिली थीं। 
- इसके बाद ये सिलसिला चल पड़ा। वरिष्‍ठ पत्रकार राजेंद्र गौतम बताते हैं इसके बाद मायावती ने यूपी के साथ दूसरे राज्यों में अपना जनाधार बढ़ाना शुरू कर दिया।

बसपा में घटती-बढ़ती रही सांसदों की संख्या

- वरिष्‍ठ पत्रकार राजेंद्र गौतम बताते हैं कि बसपा ने 1996 लोकसभा चुनाव में देशभर में 210 उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। इसमें से 9 जीते थे। साल 1998 में 251 प्रत्याशी में केवल छह जीते। साल 1999 में 225 में 14 जीते। 
- 2004 में हुए आम चुनाव में 435 उम्मीदवारों में 19 जीते थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में 438 प्रत्याशियों में 21 जीते। 2009 में हुए आम चुनाव में बसपा को देश भर में 6.17 फीसदी मत मिले।
- मायावती ने 2007 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में जीतीं और चौथी बार फिर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन साल 2012 के विधानसभा चुनावों में बसपा को सत्ता से बाहर जाना पड़ा। साल 2014 के आम चुनावों में भी बसपा को एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी।

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