उप्र / कभी अखबार के लिए 100 रुपए नहीं होते थे इस पीसीएस अफसर के पास, अब जीता मिसेज इंडिया 19 का खिताब



पीसीएस अफसर ऋतु सुहास। पीसीएस अफसर ऋतु सुहास।
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पीसीएस अफसर ऋतु सुहास।पीसीएस अफसर ऋतु सुहास।
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  • पीसीएस ऑफिसर ऋतु सुहास ने 'बूथ दोस्त' नाम से एक खास तरह का मोबाइल एप बनाया 
  • इलेक्शन कमीशन ने ऋतु के कार्य को सराहा, सीएम योगी ने भी किया सम्मानित

आदित्य तिवारी

Sep 17, 2019, 02:27 PM IST

लखनऊ. 2004 बैच की पीसीएस अफसर ऋतु सुहास ने मिसेज इंडिया-2019 का खिताब अपने नाम किया। 10 सितंबर से आयोजित इस प्रतियोगिता में देश के 20 राज्यों से 60 महिलाओं ने हिस्सा लिया था। उन्होंने टैलेंट, कॉस्ट्यूम व प्रश्नोत्तरी राउंड में सभी प्रतिद्वंदियों को पीछे छोड़ा। मिसेज इंडिया 2019 जीतने वाली ऋतु वर्तमान में एलडीए में ज्वांइट सेकेट्री के पद पर तैनात हैं। ऋतु, यूपी कैडर के आईएएस एलवाई सुहास की पत्नी हैं। 

 

21 मेरा लकी रहा  
ऋतु बताती है, वे इस खिताब के लिए पिछले 9 महीने से तैयारी कर रही थीं। जनवरी में लखनऊ में स्टेट लेवेल जीता, इसके बाद इंडिया लेवेल के प्रतियोगिता की तैयारियां शुरू कर दी। इसके लिए डांस, रैंपवॉक जैसी तैयारी की। ऋतु सुहास बताती है कि, मेरा यहां पर 21 नम्बर रहा, जो मेरे लिए लकी रहा। 21 नम्बर मुझे जब मेरा फेरवेल था इंटर में तब मिला था। 

 

ऐसे बीता बचपन

  • ऋतु बताती हैं, वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से हैं। मेरा जन्म 16 अप्रैल 1983 को लखनऊ में हुआ। पापा आरपी शर्मा लखनऊ हाईकोर्ट में एडवोकेट और मां जनक देवी हाउस वाइफ हैं। हम 2 बहन और एक भाई हैं। हमारी पढ़ाई के समय पापा की इनकम ज्यादा नहीं थी। काफी गरीबी में हमारा जीवन गुजरा। छोटी-छोटी जरुरतों को पूरा करने के लिए स्ट्रगल करना पड़ा। मेरे खानदान में लड़कियों के घर से बाहर निकलने को अच्छा नहीं समझा जाता था।
  • मैंने 2003 में जब पीसीएस की तैयारी करने का डिसीजन किया। तब काफी काफी प्रॉब्लम फेस करनी पड़ी। रिश्तेदार मेरे घर से बाहर निकलकर पढ़ाई करने से खुश नहीं थे, लेकिन पैरेंट्स ने मेरा पूरा सपोर्ट किया। मां एक-एक पैसे जोड़ा करती थी। ताकि हम भाई बहन की छोटी-छोटी जरुरतें पूरी हो सकें।
  • ऋतु ने बताया कि, घर में फाइनेंसियल प्रॉब्लम काफी ज्यादा थी, मेरे पास पीसीएस कोचिंग की फीस जमा करने के लिए पैसे नहीं थे। इसलिए मैंने सेल्फ स्टडी करने का डिसीजन लिया। मैं एक इंग्लिश न्यूज पेपर डेली पढ़ती थी। लेकिन महीने के आखिर में मेरे पास पेपर वाले को देने के लिए 100 रुपए भी नहीं जुट पाते थे। मैंने छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। उसके बदले जो पैसे मिलते थे, उससे मैं अपनी छोटी-छोटी जरुरतें पूरी करती थी।
  • मेरी एक फ्रेंड थी, वह भी पीसीएस की कोचिंग करती थी। मैं रोज शाम को उसके घर जाकर उसके नोट्स से अपना नोट्स तैयार करती थी। बाद में उसे पढ़ा करती थी। 2003 में मैंने एग्जाम दिया, लेकिन किसी ने कोर्ट में ऑब्जेक्शन कर दिया, जिसकी वजह से रिजल्ट एक साल बाद डिक्लेयर हुआ। बेरोजगारी के दौर में मेरे लिए एक साल का टाइम काटना बड़ा मुश्किल था। मेरे लिए एक दिन एक साल के बराबर था। 2004 में मेरा रिजल्ट आया और मैं उसमें पास हो गई।

इंटरव्यू के लिए ऐसे करती थी तैयारी
ऋतू बताती हैं, मैं पीसीएस इंटरव्यू के लिए शीशे के सामने रोज बैठकर अपने आप को देखकर बोलने की प्रैक्टिस करती थी। इससे मेरी बोलने की झिझक खत्म हुई और कुछ ही दिनों के अंदर मैंने फर्राटेदार बोलना शुरू कर दिया। मैंने पीसीएस का इंटरव्यू दिया और इंटरव्यू क्वालीफाई कर गई। पहली पोस्टिंग मथुरा में एसडीम के तौर पर हुई। उसके बाद एसडीम आगरा, जौनपुर और सोनभद्र के तौर पर हुई। बाद में अपर नगर आयुक्त इलाहाबाद के पद पर अप्वाइंट हो गई। मेरी मैरिज 2008 में सुहास एलवाई से हुई थी। वो एक इंटरनेशनल लेबल के पैरा शटलर भी हैं। मेरे 2 बच्चे हैं, बेटा और बेटी।

 

क्या है बूथ दोस्त ऐप...बनाने के बाद चर्चा में आई थी ऋतु
ऋतु सुहास ने 'बूथ दोस्त' नाम से एक खास तरह का मोबाइल एप बनाया है। जिसका प्रयोग यूपी निकाय चुनाव में आजमगढ़ जिले में प्रयोग के तौर पर लागू किया गया था। इलेक्शन कमीशन ने ऋतु के इस काम को सराहा। विश्व दिव्यांग दिवस पर सीएम योगी आदित्यना ने इन्हें सम्मानित भी किया था। ऋतू बताती है, मैंने पिछले साल जून में ‘बूथ दोस्त’ नाम से एक मोबाइल एप तैयार किया था, जिसे इस साल चुनाव में लागू किया गया। ये फ्री ऑफलाइन एप है। इसके जरिए आजमगढ़ सदर और तहसील के लोगों ने दिव्यांगों को ट्रेस कर लिया गया था और उनसे फार्म भरवाकर उनसे वोटिंग कराई गई।

 

ऐप की मदद से बने 30 हजार नए वोटर
ऋतु बताती हैं कि, मैंने इस एप के जरिए 30 हजार नए वोटर बनवाए थे, जो कि दिव्यांग थे। ऐप को तैयार करने से पहले मैंने मातृत्व देखरेख के लिए 2 मोबाइल एप ‘कुपोषण का दर्पण’ और ‘प्रेगनेंसी का दर्पण’ तैयार किया था। ये दोनों भी निशुल्क ऐप हैं। इस एप का प्रेग्नेंट वुमन को काफी फायदा पहुंचा। उसी टाइम मुझे लगा कि क्यों न दिव्यांगों के लिए भी इस तरह का कुछ किया।

 

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