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उप्र के 3 बड़े अस्पताल / केजीएमयू में हर दिन 3 बच्चों की मौत, वाराणसी के मंडलीय अस्पताल में वेंटिलेंटर नहीं, गोरखपुर में 5 साल में गईं 386 जान

गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्ची। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्ची।
वाराणसी के कबीर चौरा मंडलीय अस्पताल में खाली पड़े बेड। वाराणसी के कबीर चौरा मंडलीय अस्पताल में खाली पड़े बेड।
लखनऊ के केजीएमयू में दिसंबर माह में हुई करीब 60 बच्चों की मौैत। लखनऊ के केजीएमयू में दिसंबर माह में हुई करीब 60 बच्चों की मौैत।
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गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्ची।गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में भर्ती इंसेफेलाइटिस से पीड़ित बच्ची।
वाराणसी के कबीर चौरा मंडलीय अस्पताल में खाली पड़े बेड।वाराणसी के कबीर चौरा मंडलीय अस्पताल में खाली पड़े बेड।
लखनऊ के केजीएमयू में दिसंबर माह में हुई करीब 60 बच्चों की मौैत।लखनऊ के केजीएमयू में दिसंबर माह में हुई करीब 60 बच्चों की मौैत।

  • वाराणसी से पीएम मोदी, लखनऊ से रक्षा मंत्री राजनाथ सांसद, गोरखपुर सीएम योगी का गृहनगर, तीनों जगह संसाधनों की कमी
  • केजीएमयू के बच्चों के डॉक्टर के 50 फीसदी पद खाली, डॉक्टर बोले- जिन बच्चों की हो रही मौत, वे बेहद गंभीर हालत आए थे

Dainik Bhaskar

Jan 05, 2020, 04:07 PM IST

लखनऊ. राजस्थान के कोटा स्थित जेके लोन सरकारी अस्पताल में 35 दिनों में 110 नवजात बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में साल 2017 में ऑक्सीजन की कमी से 60 से अधिक नवजात व ठीक एक साल बाद 2018 में बहराइच जिला अस्पताल में 45 दिनों में 71 बच्चे असमय मौत का शिकार हुए थे। रविवार को दैनिक भास्कर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र राजधानी लखनऊ व प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृहनगर गोरखपुर के बड़े अस्पतालों की पड़ताल की। सभी जगह संसाधनों व मेडिकल स्टॉफ की कमी है। लखनऊ के केजीएमयू अस्पताल में हर दिन औसतन 18 बच्चे भर्ती होते हैं, इनमें 3 की मौत हो जाती है। डॉक्टरों का दावा है कि, परिजन बच्चों को भर्ती कराने में देर करते हैं। संवाददाता आदित्य तिवारी और अमित मुखर्जी  की रिपोर्ट-


किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) लखनऊ

राजधानी में सबसे बड़े हॉस्पिटल में से एक केजीएमयू के बाल रोग विभाग में उत्तर प्रदेश के अलावा पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी मरीज इलाज कराने आते हैं। यहां 315 बच्चों को भर्ती करने की व्यवस्था है। रविवार को यहां 20 बच्चे भर्ती हुए, जो निमोनिया समेत अन्य विभिन्न रोगों से पीड़ित हैं। विभाग के वरिष्ठ संकाय सदस्य डॉ. सिद्धार्थ कुंवर भटनागर ने कहा- गर्मी व बरसात में बाल रोगियों की संख्या अधिक होती है। साल 2019 में 4015 बच्चे भर्ती हुए थे। जिनमें 650 बच्चों की मौत हुई थी। 

दिसंबर 2019 में भर्ती हुए 350 बच्चे
दिसंबर 2019 में बाल रोग विभाग में हर दिन औसतन 18 बच्चों को भर्ती किया गया। एक माह में कुल 350 बच्चे भर्ती हुए। औसतन 2 से 3 बच्चों की मौत प्रतिदिन होती है। डॉक्टरों ने कहा, जिन बच्चों की मृत्यु हुई है, वे बेहद गंभीर हालत में अस्पताल लाए गए थे। 


50% डॉक्टरों के पद खाली 
केजीएमयू के बाल विभाग में 50 फीसदी पद डॉक्टरों के खाली हैं। मौजूदा समय में 10 कंसल्टेंट डॉक्टर हैं, लेकिन जरूरत 20 की है। विभाग में 315 बेड है, 6 बेड इमरजेंसी वार्ड में है। 50 सामान्य श्रेणी के बेड हैं। जब बाल रोगी ज्यादा आते हैं, तब इन बेड पर भर्ती किया जाता है।

सालभर में 650 बच्चों की मौत
बाल रोग विभाग में 2019 में 7,000 बच्चों की ओपीडी हुई है। गंभीर हालत होने पर 4,015 बच्चों को वार्ड में भर्ती किया गया। जिनमें से करीब 650 बच्चों की मौत हुई है। संकाय वरिष्ठ सदस्य डॉ. सिद्धार्थ कुंवर भटनागर ने कहा- गर्मी और बरसात के मौसम में 30 से 35 बच्चे औसतन प्रतिदिन भर्ती किए जाते हैं और ठंड के मौसम में संख्या कम रहती है। पूरे प्रदेश के जिला अस्पतालों से रेफर होकर बच्चे यहां लाए जाते हैं।

वाराणसी के मंडलीय व राजकीय महिला अस्पताल में वेंटिलेंटर नहीं
वाराणसी में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैय्या कराने के लिए मंडलीय चिकित्सालय व राजकीय महिला अस्पताल स्थापित है। लेकिन, दोनों अस्पतालों में बच्चों के लिए वेंटिलेंटर की सुविधा नहीं है। यदि इमरजेंसी में बच्चों को वेंटिलेटर की जरूरत हो तो उन्हें बीएचयू रेफर कर दिया जाता है। शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल का 13 नंबर वार्ड बच्चों का है। रविवार को यहां दो बच्चे भर्ती मिले। सीएमएस बीके श्रीवास्तव ने कहा- दिसंबर व एक साल में कितने बच्चे भर्ती हुए और कितने की मौत हुई, यह आंकड़ा अभी नहीं है। आश्वस्त किया गया कि, कोटा जैसा हाल उनके यहां नहीं है। एनआईसीयू, वेंटिलेटर की सुविधा यहां नहीं है।

राजकीय महिला जिला चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधिकारी आरपी कुशवाहा ने बताया कि उनके पास बाल रोग वार्ड (एसएनसीयू) में 6 बेड हैं। जहां नवजात और 28 दिनों की आयु तक के बच्चों का इलाज होता है। 5 डॉक्टर व 8 स्टॉफ नर्स हैं। वेंटिलेटर नहीं है। हालांकि, 8 वार्मर है। बताया कि, दिसंबर माह में 93 बच्चे भर्ती हुए थे, जिनमें 7 बच्चों की मौत हुई है।

गोरखपुर में इंसेफेलाइटिस के केस कम होने का दावा, पर संसाधनों की कमी

पूरब का शोक कहे जाने वाले दिमागी बुखार (जापानी इंसेफेलाइटिस/एक्यूट इंसेफेलाइिटस सिंड्रोम) केस में गिरावट आने का दावा प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। बीते पांच सालों में यहां 2657 बच्चों में दिमागी बुखार के लक्षण मिले, जिनमें 386 की मौत हुई है। लेकिन, बीआरडी मेडिकल कॉलेज के 100 बेड के पीडियाट्रिक वार्ड बाल रोगियों से भरा है। सरकार दावा करती है कि, अस्पतालों में इलाज मुफ्त है। लेकिन, यहां दवाइयां बाहर से मंगाई जाती हैं।

एक दिन में मंगाए जाते हैं पांच जोड़ी दास्ताने
तीमारदार मंदीप का कहना है कि- उनसे एक दिन में पांच जोड़े तक दस्ताने मंगाए जाते हैं। एक दस्ताने की कीमत बाजार में पांच रुपए हैं। इसके अलावा ग्लूकोज की बोतल भी तीमारदारों को खरीदकर लाना पड़ती है। चौरीचौरा की संजू देवी ने कहा- डॉक्टर ने बेड नहीं खाली बोलकर बच्चे को भर्ती करने से मना कर दिया। इलाज के नाम पर खुद डॉक्टर ने बोला कि फातिमा अस्पताल ले जाएं। यहां जब बेड खाली होगा तब लेकर आना। गोरखपुर के मोहम्मदाबाद के सचिन अपने 40 दिन के जुड़वा बच्चों का इलाज 100 बेड वार्ड में करा रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन डॉक्टर बाहर एक मेडिकल स्टोर का नाम बताकर वहां से दवा मंगवाते हैं। रोजाना दो हजार रुपए तक की दवा लग जाती है। ऐसे में गरीब लोग अपने बच्चों का इलाज कैसे कराएं। लोगों ने एक स्वर में बोला कि सुविधाएं क्या? पीने के पानी तक की कोई व्यवस्था नहीं है। मजबूरन तीमारदार पास के कैंटीन से पानी की बोतल खरीदकर लाते हैं।

इंसेफेलाइटिस के केस हुए कम: सीएमओ
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. श्रीकांत तिवारी कहना है कि, जैपनीज इंसेफेलाइटिस के मरीजों की संख्या में साल दर साल गिरावट आ रही है। इसके पीछे जनजागरुकता अहम है। बीमारी के प्रति गांव-गांव कैंप लगाकर लोगों को जागरुक किया गया। बारिश शुरू होने से पहले बच्चों का टीकाकरण किया गया। सफाई और साफ पानी पीने और रखने के लिए जागरूक अभियान चलाया गया। इस काम में नगर निगम और अन्य विभाग द्वारा जागरूकता अभियान चलाया गया। शासन स्तर से आधुनिक उपकरण और वैक्सीन, जांच किट उपलब्ध कराई गई। अब लोग इस बीमारी के इलाज के प्रति काफी संजीदा हुए हैं।

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