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कोई भी समाज नहीं कर सकता अदालत का गठन, ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर लगे प्रतिबंध: वसीम रिजवी

रिजवी ने कहा- ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ जहरीले पेड़ की जड़ों की तरह मुस्लिम समाज में फैल रहा है।

Dainikbhaskar.com | Last Modified - Jul 09, 2018, 07:02 PM IST

कोई भी समाज नहीं कर सकता अदालत का गठन, ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर लगे प्रतिबंध: वसीम रिजवी

लखनऊ.यूपी शिया सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने लेटर जारी करते हुए कहा है कि ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर प्रतिबंध लगना चाहिए। उन्होंने लिखा कि भारत में 80 से ज़्यादा शरई अदालतें संचालित करने की बात ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने स्वीकार की है। भारत अपने संविधान के तहत चलता है और संविधान यह इजाज़त नहीं देता कि कोई भी समाज या संगठन किसी भी तरह की कोई अदालत का गठन करे और जज नियुक्त करे।

- आल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से लगातार ज़िलों और शहरों में क़ाज़ी (जज) नियुक्त किये जाते हैं। शरईया कानून के अनुसार क़ाज़ी नियुक्त करने का अधिकार हुकूमत का है। जिस मुल्क में शरीयत के अनुसार इस्लामिक हुकूमत होती है वहां हूकूमत क़ाज़ी नियुक्त करती है। हिन्दुस्तान में शरईया हुकूमत नहीं है। हिन्दुस्तान में क़ाज़ी नियुक्त किया जाना ग़ैर संवैधानिक है। यह प्रकरण प्रकाश में आ चुका है कि संविधान के विपरीत जाते हुए हिन्दुस्तान में 80 से ज़्यादा शरई अदालतें चल रही हैं और लगातार क़ाज़ी नियुक्त किये जा रहे हैं, इससे यह प्रतीत होता है कि हिन्दुस्तान में संविधान के बराबर शरई कानून कट्टरपंथी मुल्ला आज़ादी के बाद से आज तक चला रहे हैं। ऐसा किया जाना देषद्रोह जैसे अपराध की श्रेणी में आता है।


- हुकूमत को चाहिए कि ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर तत्काल प्रतिबन्ध लगाये और बोर्ड के सभी मुल्लाओं पर जो शरई अदालतें खोल कर और क़ाज़ी (जज) नियुक्त करने के लिए जिम्मेदार हैं के विरूद्ध देषद्रोह का मुकदमा क़ायम किया जाए। बोर्ड एक ज़हरीले पेड़ की जड़ों की तरह मुस्लिम समाज में फैल रहा है। बोर्ड की यह मंशा है कि हिन्दुस्तान में कश्मीर जैसा माहौल बना दिया जाये।

क्या कहा था जाफरयाब जिलानी ने: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जफरयाब जिलानी ने ने कहा कि इस समय उत्तर प्रदेश में करीब 40 दारुल-कजा हैं। कोशिश है कि हर जिले में कम से कम एक ऐसी अदालत जरूर हो। जिलानी ने कहा, 'हम इसे शरीयत कोर्ट नहीं मानते हैं, यह दारूल काजा है।

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