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इस जवान ने युद्ध में खोया अपना एक हाथ, पैर और आंख, फिर भी डटा रहा मोर्चा पर

1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान सबसे अगली पंक्ति में संभाला था मोर्चा।

Danik Bhaskar | Jan 15, 2018, 12:53 PM IST
रिटायर्ड नायक धर्मवीर सिंह 17वीं राजपूत बटालियन में तैनात थे। रिटायर्ड नायक धर्मवीर सिंह 17वीं राजपूत बटालियन में तैनात थे।

मेरठ (यूपी). भारतीय सेना आज 15 जनवरी को आर्मी डे मना रही है। भारतीय सेना के जांबाज जवानों की शौर्य गाथाओं की कोई कमी नहीं है। देश के लिए सीमा पर दुश्मनों से लड़ते हुए सेना के जवान अपना सब कुछ न्यौछावर करने से नहीं हिचकते। ऐसे ही एक जवान ने वर्ष 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान सबसे अगली पंक्ति में मोर्चा संभाला। इस दौरान दुश्मन की बिछाई गई माइन से इस जवान को अपना एक हाथ, एक पैर और एक आंख गंवानी पड़ी। लेकिन इस जवान ने हिम्मत नहीं हारी और डटकर दुश्मनों का मुकाबला किया।

धमाके में उड़ा था हाथ-पैर...

- कैंट एरिया में शहीद पार्क कालोनी में रहने वाले सेना से रिटायर्ड नायक धर्मवीर सिंह 17वीं राजपूत बटालियन में तैनात थे। उन्होंने बताया, ''1971 की पाकिस्तान से हुई लड़ाई में मेरी बटालियन उस वक्त पश्चिमी सेक्टर की फतेहपुर चेकपोस्ट पर तैनात थी।''

- ''कमांडर ने टीम का सेशन कमांडर बनाकर मुझे दुश्मन से मोर्चा के लिए के लिए भेजा, टीम में शामिल सभी 10 जवान देश के लिए कुछ करने और दुश्मन को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़ रहे थे।''

- ''मेरी टीम रीवा नदी क्षेत्र में पहुंची तो वहां दुश्मन ने अपनी सुरक्षा के लिए नॉन डिटेक्टिव माइन बिछा रखी थी। चायना मेड ये माइन दुश्मन ने चारों ओर बिखेर रखी थी, माइन डिटेक्ट नहीं हो रही थी, अचानक एक माइन पर मेरा पैर पड़ा और वह फट गई।''

- ''चारों ओर धुआं फैल गया, कुछ धुआं कम हुआ तो देखा मेरे पैर से खून बह रहा है। संभलने के लिए दूसरी ओर जमीन पर बैठने के लिए हाथ का सहारा लिया तो उनके हाथ के दबाव से फिर एक माइन फट गई। इस माइन के फटने से बायां हाथ और बाई आंख खत्म हो गई।''

दुश्मन पर फतह हासिल करने का जुनून

- ''इस हादसे के बाद भी मेरा हौंसला कम नहीं हुआ। अपने साथियों को आगे बढ़ने को कहा- उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कुछ जवानों ने बेस कैम्प तक पहुंचाया। सेना जब दुश्मन के साथ आमने-सामने की लड़ाई लड़ती है तो उसे केवल दुश्मन पर फतह हासिल करने का जुनून रहता है।''

- ''उस वक्त कोई सगा संबंधी याद नहीं आता, याद रहता है तो केवल देश पर मर मिटने का जज्बा और भगवान। 16 दिसंबर को जब दुश्मन पर अटैक किया गया था, उस दिन कड़ाके की ठंड थी। उनकी टुकड़ी ने शाम के समय दुश्मन पर अपना हमला करने की योजना के तहत लड़ाई शुरू की थी।''

- ''कड़ाके की ठंड में उनकी राइफल इस तरह से ठंडी थी कि उन्हें छूने से लगता था कि बर्फ छू ली हो। फि‍र भी हमनें दुश्मन क्षेत्र में 50 मीटर अंदर तक कब्जा कर लिया था।''

माइन फटने से नायक का हाथ और पैर का पंजा गायब हो गया। माइन फटने से नायक का हाथ और पैर का पंजा गायब हो गया।