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पैरों से लाचार इस लड़के का निशाना है अचूक, पिता की गोद में जाता है स्कूल

शूटर चेतन राणा अब तक 7 गोल्ड और 3 ब्रॉन्ज मेडल जीत चुके हैं।

Danik Bhaskar | Jan 25, 2018, 06:41 PM IST

लखनऊ. हौसले बुलंद हों और इरादे मजबूत तो किसी भी मंजिल को हासिल करना नामुमकिन नहीं। इसी कहावत को सच कर दिखाया है मेरठ के चेतन राणा ने। दिव्यांग होने के बावजूद चेतन ने केरल में 31 दिसंबर 2017 को आयोजित 61वीं नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में 2 गोल्ड और 1 सिल्वर मेडल अपने नाम कर लिया। 18 साल की उम्र में जीते 7 गोल्ड मेडल...

महज 18 साल के मेरठ के रोहडा रोड स्थित तेज बिहार कॉलोनी में रहने वाले चेतन अब तक कुल 7 गोल्ड और 3 सिल्वर मेडल जीत चुके हैं। बता दें कि वो अपने पैरों पर खड़े भी नहीं हो सकते।

चेतन को कहीं आने-जाने के लिए व्हील चेयर या फिर किसी व्यक्ति का सहारा लेना पड़ता है। वहीं, चेतन और उनके बड़े भाई अंकुर राणा ने Dainikbhaskar.com से खास बातचीत में अपने लाइफ के स्ट्रगल को शेयर किया।

पापा गोद में ले जाते है स्कूल

- चेतन बताते हैं कि "मेरा जन्म 29 जून 2000 को बागपत के बड़ौत में हुआ था। पिता कांट्रेक्टर और मां हाउस वाइफ है। घर में मेरा एक बड़ा भाई भी है। आज मैं जिस मुकाम पर हूं अपने फैमिली मेंबर्स के बदौलत ही पहुंच सका हूं।"

- उन्होंने बताया, "जन्म से ही रीढ की हड्डी में घाव होने के कारण पैर पैरालाइज हो गया था। तीन दिन का था तब मेरे दोनों पैरों का पहली बार ऑपरेशन हुआ था। इसके बाद जब तीन साल का हुआ तब पैरों का दोबारा ऑपरेशन हुआ, लेकिन उसका भी कुछ खास असर नहीं हुआ। तब से मैं व्हील चेयर पर हूं।"

आगे की स्लाइड्स में जानें कि ये शूटर पापा की गोद में बैठकर जाता है स्कूल...

पापा की गोद में जाता है स्कूल

 

- स्कूल के दिनों की बातें शेयर करते हुए चेतन ने बताया कि "पापा मुझे अपनी गोद में उठाकर स्कूल के तीसरी मंजिल पर स्थित मेरे क्लास में पहुंचाया करते थे। इसके बाद पापा की अक्सर तबीयत बिगड़ जाती थी। इसके बावजूद भी वो रोज वहीं करते थे।"

 

- उन्होंने बताया, "हाईस्कूल मैंने फर्स्ट डिविजन से पास किया। फिलहाल मैं 12वीं में हूं और मेरा सेंटर काफी दूर पड़ा है। अब फैमिली मेंबर्स को इस बात की चिंता है कि मैं एग्जाम देने कैसे जाऊंगा।"

हर महीने जाना पड़ता है अस्पताल

 

- चेतन बताते हैं कि "कुछ साल पहले मेरे सिर में  पानी भर जाने से सिर दर्द और बेहोशी छा जाती थी।  डॉक्टरों ने ऑपरेशन के बाद पानी तो निकाल दिया, लेकिन मुझे हर महीने चेकअप के लिए हॉस्पिटल जाना पड़ता है।"

 

- चेतन ने बताया, "मेरे बड़े भाई अंकुर राणा स्टेट लेबल के शूटर हैं। वो पिस्टल से निशाना लगाते हैं और स्टेट लेवल शूटिंग चैंपियनशिप में 1 ब्रॉन्ज मेडल जीत चुके हैं।"

'मेरी वजह से भाई को नहीं मिल पाया गोल्ड'

 

- "भाई ने ही मेरा एडमिशन अगस्त 2016 में शूटिंग एकेडमी में कराया था। उनका पूरा दिन मेरी हेल्प करने में ही बीत जाता है। मेरी वजह से भाई अपने प्रैक्टिस पर ठीक से ध्यान भी नहीं दे पाते। इस वजह से वो गोल्ड मेडल हासिल करने से चुक गए।"

 

- "मैं रायफल से 10 मीटर रेंज में निशाना लगाता हूं। भाई ने मेरी शूटिंग की प्रैक्टिस में काफी हेल्प की थी। अंकुर गोल्ड मेडल जीतने के लिए मेरे साथ ही अभी ट्रेनिंग एकेडमी में प्रैक्टिस करते हैं। लेकिन, उनका ज्यादा ध्यान अपने मेरे प्रैक्टिस पर रहता है।"

घर खर्च की चिंता

 

- वहीं, अंकुर राणा बताते हैं कि "हम मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करते हैं। पिता कांट्रेक्टर है। उनकी कोई फिक्स जॉब नहीं है। इसलिए घर खर्च के लिए भी चिंता बनी रहती है।"

 

- अंकुर राणा कहते हैं कि "पापा ने किसी तरह पैसों का अरेंजमेंट करके भाई कोई रायफल दिलाई, ताकि वो अपनी प्रैक्टिस जारी रख सके। शूटिंग एकेडमी की फीस भी जमा करने में कई बार प्रॉबलम फेस करनी पड़ती है।"

यूपी सरकार नहीं देती पैसे

 

- अपनी प्रॉबलम्स शेयर करते हुए उन्होंने बताया, "हरियाणा सरकार निशानेबाजी में एक गोल्ड मेडल जीत कर लाने पर 3 लाख रुपये देती है, लेकिन यूपी सरकार कोई पैसा नहीं देती।"  

 

- चेतन अब तक घर से 40-50 हजार रुपये खर्च कर शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लेने के लिए जा चुके हैं। दोनों भाई चाहते हैं कि सरकार हमारी मदद करे, ताकि उन्हें पैसों की कमी के कारण अपनी प्रैक्टिस को बंद ना करना पड़े।