गरीबी में जैसे-तैसे पढ़ाई कर बनी बैंक मैनेजर, अब स्लम एरिया में करती है ये काम / गरीबी में जैसे-तैसे पढ़ाई कर बनी बैंक मैनेजर, अब स्लम एरिया में करती है ये काम

उज्जवल सिंह

Jan 30, 2018, 05:05 PM IST

तरुणा विधेय निर्भेद फाउंडेशन के जरिए 1752 गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रही हैं।

आज तरुणा के फाउंडेशन की चार ब्रांच है, जहां 1752 बच्चों को पढ़ाया जाता है। आज तरुणा के फाउंडेशन की चार ब्रांच है, जहां 1752 बच्चों को पढ़ाया जाता है।

गाजियाबाद. गरीबी में पली-बढ़ी इस बैंक मैनेजर ने गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देकर एक मिसाल पेश की है। बैंक मैनेजर तरुणा विधेय बैंक से 2 साल की स्टडी लीव लेकर गाजियाबाद में कई स्थानों पर खुले आसमान के नीचे क्लास लगाकर स्लम एरिया के बच्चों को शिक्षा मुहैया करा रही हैं। इसके लिए तरुणा ने अपने एक बैचमेट और रेलवे अफसर सुशील कुमार के साथ निर्भेद फाउंडेशन बनाया है। अब यह संस्था स्लम एरिया के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दे रही हैं। 1752 बच्चों का भविष्य सुधार रही तरुणा की टीम...

निर्भेद फाउंडेशन के इस अभियान के तहत गाजियाबाद के विजयनगर और ट्रांस हिंडन में चार जगहों पर खुले आसमान के नीचे 1752 बच्चों का भविष्य संवारा जा रहा है। ये स्लम एरिया में पहले जाकर बच्चों का सर्वे करते हैं। इसके बाद वहां पर स्कूल की शुरुआत करते हैं। सभी लोग कामकाजी हैं इसलिए शिफ्ट के हिसाब से बच्चों को पढ़ाने का काम करते हैं।

बचपन से ही ब्राइट स्टूडेंट रहीं

तरुणा विधेय उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर की रहने वाली हैं। तरुणा के पिता रजाई-गद्दे का व्यवसाय करते हैं। तीन भाई-बहन में तरुणा सबसे छोटी हैं। तरुणा बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज थी। बचपन से ही तरुणा के अन्दर कुछ अलग करने का जज्बा था। वही जज्बा आज तरुणा को गरीब बच्चों की मदद के लिए प्रोत्साहित करता है।

बचपन से ही आर्थिक तंगी में बीता है जीवन


तरुणा बताती हैं- "पापा की छोटी सी दुकान थी। हम तीन भाई बहन की पढ़ाई का खर्च निकाल पाना काफी मुश्किल होता था, लेकिन किसी तरह से पिताजी ने हम तीनों भाई-बहन को पढ़ाया। लिमिटेड इनकम में तीन बच्चों की पढ़ाई का खर्च और परिवार को चलाना पापा के लिए किसी संघर्ष से कम नही था। लेकिन, शुरू से ही उनका लक्ष्य था कि मेरे बच्चे आगे चल कर कुछ बनें। बस इसी लक्ष्य के साथ वो अपने काम में लगे रहते थे। उनका यही संघर्ष आज हम तीनों भाई-बहन के लिए इंस्पिरेशन बन गया।"

आगे की स्लाइड्स में जानें कैसे तरुणा ने बैंक से छुट्टी लेकर शुरू किया गरीब बच्चों का भविष्य सुधारने का काम...

Special Story on Taruna Vidhay for teaching poor children in ghaziabad

2012 में मिली बैंक जॉब तो साकार हुए सपने

 

 

तरुणा बताती है कि "2012 में मुझे गाजियाबाद के एक बैंक में मैनेजर की पोस्ट पर जॉब मिली। मुझे नौकरी करते हुए तकरीबन दो साल बीत गए। अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों में मैंने देखा था कि कैसे गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चे पैसे के आभाव में अच्छी शिक्षा से वंचित रह जाते हैं। बचपन से ही मैं एक बात हमेशा सोचती थी कि जिस दिन मैं सफल हुई उस दिन जरूर कुछ लोगों को काबिल बना दूंगी। बस यही सोच मुझे बार-बार कुछ करने को प्रेरित करती थी और एक दिन मैंने फैसला ले लिया।"

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स्लम एरिया का जीवन देखकर बदल गई सोच

 


उन्होंने बताया- "एक दिन मैं बैंक के एक क्लाइंट से मिलने गई थी। उनके घर जाने का रास्ता एक बहुत बड़े स्लम एरिया से होकर जाता था। मैंने रुक कर वहां रहने वाले बच्चों को देखा तो मुझे लगा कि शायद मेरी जिन्दगी का मकसद अब मिल गया है। उसी दिन से मैं स्लम एरिया में विजिट करने लगी। मेरा पहला काम होता था ऐसे बच्चों को चिन्हित करना जो किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते. मैंने ऐसे कई बच्चों को चिन्हित किया और अपने सोसाइटी में ही बुलाकर उन्हें पढ़ाने लगी, जहां मैं रहती थी। दो बच्चों से मैंने जो सफर शुरू किया था वह धीरे-धीरे 50 बच्चों तक पहुंच चुका था।"

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सोसाइटी के लोग करने लगे थे विरोध

 


तरुणा ने कहा- "मैं बैंक से शाम 5 बजे वापस आती थी तब बच्चों को पढ़ाती थी, लेकिन बच्चों की संख्या काफी ज्यादा हो चुकी थी। इसका सोसाइटी में रहने वाले कुछ लोग और सोसाइटी प्रबन्धन विरोध करता था। हांलाकि, मैंने उन्हें मनाने की काफी कोशिश की, लेकिन उन्होंने सोसाइटी में बच्चों के आने पर रोक लगा दी। इसके बाद मैं खुद स्लम एरिया में जाकर खुले आसमान के नीचे बच्चों को पढ़ाने लगी।"

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बैचमेट का मिला साथ तब बन गया कारवां

 


तरुणा बताती हैं- "मेरे एक बैचमेट सुशील कुमार रेलवे में सेक्शन ऑफीसर हैं। उन्हें भी ऐसे कामों में काफी रूचि थी। एक दिन मैंने उनसे मुलाकात करके अपनी इस मुहीम के बारे में चर्चा किया। उन्होंने मेरा साथ देने के लिए हामी भर दी। इसके बाद तो मानो कारवां सा बन गया। हमने एक संस्था निर्भेद फाउंडेशन की नीव रखी।"

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संस्था में मदद को बढ़ने लगे हाथ

 


तरुणा ने बताया- "धीरे-धीरे संस्था के बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। जब इसकी जानकारी लोगों को हुई तो कुछ लोगों ने मदद को हाथ भी बढ़ाया। लेकिन, हम लोगों ने कैश मदद लेने से इनकार कर दिया। हमारा साफ तौर पर कहना है कि जिसे हमारी मदद करना है वह हमें किताबें, कापियां, गरीब बच्चों के लिए कपड़े आदि दे सकता है। कुछ लोग और संस्थाओं ने इसमें भी मदद की।"

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40 लोग पढ़ा रहे 1752 बच्चों को

 


उन्होंने बताया कि "जब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी तब हमने हमारे द्वारा पढ़ाए जा रहे तेज बच्चों की एक टीम बनाई और उसने छोटे बच्चों को पढ़वाने का काम शुरू किया। आज नतीजा ये है कि हमारी कुल 4 ब्रांच चल रही हैं, जिसमें से एक ब्रांच को मैं खुद संभालती हूं।"

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आज तरुणा के फाउंडेशन की चार ब्रांच है, जहां 1752 बच्चों को पढ़ाया जाता है।आज तरुणा के फाउंडेशन की चार ब्रांच है, जहां 1752 बच्चों को पढ़ाया जाता है।
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