संभल लोकसभा / दो दशक पहले मुलायम ने यहां ठोकी थी ताल, 2014 में पहली बार भाजपा ने जीती यह सीट

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  • सपा का गढ़ मानी जाती है संभल लोकसभा सीट
  • 2004 में मुलायम ने छोड़ी सीट तो राम गोपाल यहां से जीते
  • इस चुनाव में यहां मुकाबला भाजपा, कांग्रेस व सपा के बीच

Apr 21, 2019, 04:02 AM IST

संभल. 1977 में संभल सीट अस्तित्व में आई। तब यहां से चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय लोकदल ने इस मुस्लिम और यादव बाहुल्य सीट से अपना परचम लहराया था। 1998 में यह सीट हाईप्रोफाइल हो गई, जब सपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यहां से संसद पहुंचे। इसके बाद 1999 में हुए चुनावों में भी मुलायम यहां से चुने गए। 2004 में मुलायम ने यह सीट छोड़ी तो उनके भाई रामगोपाल यादव यहां से जीते। तब से यह सीट सपा का गढ़ मानी जाती है।   

 

12 प्रत्याशी चुनावी समर में

यहां तीसरे चरण में 23 अप्रैल को चुनाव होना है। इस बार 12 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा के परमेश्वर लाल सैनी, सपा के डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क और कांग्रेस के मेजर जगत पाल सिंह के बीच है। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के करण सिंह यादव भी मैदान में हैं। 3 निर्दलीय समेत 5 क्षेत्रीय दलों के नेता भी अपनी उम्मीदवारी पेश कर रहे हैं। 

 

वंदेमातरम का विरोध कर चुके शफीकुर्रहमान बर्क हैं यहां के बड़े नेता 
तीन बार मुरादाबाद से और एक बार संभल लोकसभा सीट से सांसद रह चुके बर्क का विवादों से पुराना नाता रहा है। संभल में मुस्लिम और यादवों के सर्वमान्य नेता के तौर पर पहचाने जाने वाले बर्क 2013 में संसद वंदेमातरम का विरोध कर चर्चा में आए थे। बर्क बसपा से संभल सीट से 2009 में सांसद रह चुके हैं। 

 

2014 में 5 हजार वोटों के अंतर से हारे थे चुनाव 

2014 में भाजपा से सत्यपाल सैनी को टिकट दिया गया था। क्षेत्र में ज्यादा पकड़ न होने के बाद भी मोदी लहर में सैनी सांसद बने थे। 2014 में भाजपा से सत्यपाल सिंह सैनी को तीन 60 हजार 242 वोट मिले थे, जबकि सपा के शफीकुर्रहमान बर्क को तीन लाख 55 हजार 68 वोट मिले थे। दोनों के बीच पांच हजार 174 वोट का अंतर था। दरअसल, जानकारों का कहना है कि बसपा ने भी मुस्लिम कैंडिडेट अकीलुर्रह्मान खान को उतार दिया था, उन्हें दो लाख 52 हजार 640 वोट मिले थे। जिससे मुस्लिम मतों का बिखराव हुआ और भाजपा के सत्यपाल सैनी जीत गए। 

 

डीपी यादव भी यहां से बन चुके हैं सांसद 
संभल लोकसभा सीट को गठन के बाद यहां से पहली बार महिला प्रत्याशी को संसद भेजने का गौरव भी प्राप्त है। लेकिन यहां से डीपी यादव भी जीत कर संसद पहुंच चुका है। डीपी यादव ने 1996 में बसपा के टिकट पर यहां से जीत दर्ज की थी।

 

एंटीइनकम्बेंसी से बचने के लिए भाजपा ने बदला कैंडिडेट 

भाजपा के वर्तमान सांसद सत्यपाल सैनी से जनता की बेरुखी को देखते हुए भाजपा ने यहां से अबकी बार परमेश्वरलाल सैनी को टिकट दिया है। भाजपा को उम्मीद है कि इससे जनता का गुस्सा कम होगा। 

 

क्या है जातीय समीकरण?
यहां लगभग 8.50 लाख मुस्लिम वोटर हैं। जबकि अनुसूचित जाति के 2.75 लाख, 1.50 लाख यादव और 5.25 लाख में अन्य पिछड़ा और सामान्य वर्ग के वोटर हैं।  
 

साल जीते (पार्टी)
1977 शांति देवी (भारतीय लोक दल)
1980 बिजेंद्र पल सिंह (कांग्रेस)
1984 शांति देवी (कांग्रेस)
1989 श्रीपाल सिंह यादव (जनता दल)
1991 श्रीपाल सिंह यादव (जनता दल)
1996 धर्मपाल यादव (बहुजन समाज पार्टी)
1998 मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)
1999 मुलायम सिंह यादव (समाजवादी पार्टी)
2004 राम गोपाल यादव (समाजवादी पार्टी)
2009 शफीकुर्रहमान बर्क (बहुजन समाज पार्टी)
2014 सत्यपाल सिंह (भारतीय जनता पार्टी)

 

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