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ऐसी है ये फैमिली- बेटे-दामाद ने PAK को चटाई धूल तो बेटी ने पकड़ा था ISI एजेंट

यूपी के वाराणसी में एक ऐसा परिवार है, जिसमें पिता, बेटा और दामाद ने इंडियन आर्मी से जुड़कर पाकिस्‍तान को धूल चटाई है।

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2018, 09:00 PM IST
सीडी मिश्रा ने बताया, बाद में 2002 में कश्मीर में मेरी बेटी रश्मि भी सेना के इंटेलिजेंस में लेफ्टीनेंट बनकर आ गई। सीडी मिश्रा ने बताया, बाद में 2002 में कश्मीर में मेरी बेटी रश्मि भी सेना के इंटेलिजेंस में लेफ्टीनेंट बनकर आ गई।

वाराणसी. 15 जनवरी को आर्मी डे है। यूपी के वाराणसी में एक ऐसा परिवार है, जिसमें पिता, बेटा और दामाद ने इंडियन आर्मी से जुड़कर पाकिस्‍तान को सबक सिखाया और बेटी ने सबसे यंग ऑफिसरबनकर ISI के एजेंट को पकड़ा। DainikBhaskar.com आपको ऐसे ही परिवार के बारे में बताने जा रहा है। आगे पढ़िए इस परिवार की पूरी कहानी...

 

- रिटायर कर्नल सीडी मिश्रा ने बताया, वो 1965 से 2005 तक गोरखा रेजीमेंट का हिस्सा रहे। उन्होंने कहा- ''कारगिल युद्ध के समय मैं, मेरा बेटा सुमित मिश्रा, दामाद आशुतोष ने एक साथ पाकिस्तान के दांत खट्टे किए थे।''
- ''बाद में 2002 में कश्मीर में मेरी बेटी रश्मि भी सेना के इंटेलिजेंस में लेफ्टि‍नेंट बनकर आ गई। कारगिल युद्ध के बाद हमें स्थान नहीं छोड़ना था। इस दौरान हम लोगों ने कश्मीर में 10 महीने काटे। लेकिन कभी एक-दूसरे से मुलाकात और बात भी नहीं हुई।''
- ''इस दौरान भी कई बार सीमा पर पाकिस्तान ने फायरिंग की, जिसका हमलोगों ने बखूबी जवाब दिया।''

 

रश्मि ने पकड़ा था ISI एजेंट
- रश्म‍ि ने बताया, ''2002 में सबसे यंग ऑफिसर बनकर कोलकाता आईएसजी (इंटरनल सिक्‍युरिटी ग्रुप) में गई। वहां कवर्ड ऑपरेशन (खुफिया) आईएसआई के एजेंट को पकड़ा था।''
- ''2002 में ही मुझे इंडियन आर्मी में कश्मीर में इंटेलिजेंस में बुलाया गया। पठानकोट में मैंने महत्वपूर्ण ऑपरेशन को अंजाम दिया। इस समय मैं बीकानेर में लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर कार्यरत हैं।''
- ''मैंने अपनी पढ़ाई देहरादून से पूरी की है। मैं सुरक्षा की वजह से आईएसआई की डिटेल नहीं बता सकती।''

 

बेटा सुमित ने पाकिस्‍तानी टुकड़ियों पर किया था अटैक
- सीडी मिश्रा ने बताया, ''बेटा सुमित 1998 से 2006 तक इंडियन आर्मी में रहा। कारगिल में कैप्टन बनकर उसने पाकिस्तानी टुकड़ियों पर अटैक किया।''
- ''दुश्मनों के कई बेस पर कब्जा जमाया। हिल्स पर नीचे से फायरिंग करते हुए ऊपर दुश्मन के ठिकानों तक गया। कश्मीर में कई आतंकियों को उनकी टुकड़ी ने शूट किया। सुमित की पढ़ाई-लिखाई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से हुई है।''

 

दामाद आशुतोष 1998 में हुए थे सेना में भर्ती
- वो बताते हैं- ''13 साल की उम्र में आरआईएमसी (राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज दून) चले गए। बाद में इंडियन मिलिट्री एकेडमी दून से एनडीए किया।''
- ''सितंबर 1998 में सेना, 190 मीडियम रेजीमेंट (तोपखाना) ज्वाइन किया। कैप्टन होने के नाते कारगिल युद्ध में उन्‍होंने दुश्मनों पर बोफोर्स से खूब गोले दागे।''
- ''सटीक इंफॉर्मेशन के साथ हिल्स पर गोला दागने का काम खतरनाक था। गोला लुढ़कता हुआ वापस न आ जाए। हिल्स टूटकर अपने ऊपर न गिरे। कितने पौंड का गोला दागना है। अपनी टुकड़ी के लिए वो खुद तय करते थे। अभी ये कर्नल के पद पर बीकानेर में पोस्‍टेड हैं।''

 

सुमित के पिता कर्नल चंद्रदेव मिश्रा ने कहा
- ''मैं 1965 से 2005 तक थल सेना गोरखा राइफल में था। कारगिल युद्ध में कुपवाड़ा, उधमपुर और गुरेजगंज में 10 महीने रहे। उन्‍होंने बताया कि हम लोगों ने स्लोगन दिया था- 'कायर होने से मर जाना अच्छा है। खुखरी से दुश्मनों का सिर कलम करना मकसद रहा है।' पाकिस्‍तानी हिल्‍स पर दुश्‍मनों का कैंपस पता कर कब्‍जा करना मकसद था।''
- ''कई-कई दिनों तक अपनी टुकड़ी के साथ जोंक की तरह पत्थर पर चिपका रहता था। मौका मिलते ही फायरिंग कर दुश्मन को मौत की नींद सुला दिया जाता था।''
- ''काफी दिनों तक मैं उग्रवादियों के हिट लिस्ट में था। वो जान से मारना चाहते थे।''
- ''रिटायर होने के बाद मैंने 30 से ऊपर बच्‍चों को जरूरत के मुताबिक, एजुकेशन गाइडलाइन तैयारी करवाया है। आज भी बच्चे उनसे जुड़कर शिक्षा लेते हैं और बहादुरी के किस्से सुनते हैं।''

 

क्यों मनाते हैं आर्मी डे?
- आर्मी डे, भारत में हर साल 15 जनवरी को लेफ्टिनेंट जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) के. एम. करियप्पा के भारतीय थल सेना के मुख्य कमांडर का पदभार ग्रहण करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।
- उन्होंने 15 जनवरी 1949 को ब्रिटिश राज के समय के भारतीय सेना के अंतिम अंग्रेज शीर्ष कमांडर (कमांडर इन चीफ, भारत) जनरल रॉय बुचर से ये पदभार ग्रहण किया था।
- इस दिन उन सभी बहादुर सेनानियों को सलामी भी दी जाती है जिन्होंने कभी ना कभी अपने देश और लोगों की सलामती के लिये अपना सर्वोच्च न्योछावर कर दिया।

पिता कर्नल चंद्रदेव मिश्रा 1965 से 2005 तक थल सेना गोरखा राइफल में थे। पिता कर्नल चंद्रदेव मिश्रा 1965 से 2005 तक थल सेना गोरखा राइफल में थे।
Army Family Who Fight Bravely From Pakistan
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सीडी मिश्रा ने बताया, बाद में 2002 में कश्मीर में मेरी बेटी रश्मि भी सेना के इंटेलिजेंस में लेफ्टीनेंट बनकर आ गई।सीडी मिश्रा ने बताया, बाद में 2002 में कश्मीर में मेरी बेटी रश्मि भी सेना के इंटेलिजेंस में लेफ्टीनेंट बनकर आ गई।
पिता कर्नल चंद्रदेव मिश्रा 1965 से 2005 तक थल सेना गोरखा राइफल में थे।पिता कर्नल चंद्रदेव मिश्रा 1965 से 2005 तक थल सेना गोरखा राइफल में थे।
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