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2 लड़कियों ने तोड़ी 450 साल पुरी परंपरा, बुरी नजर से बचने के लिए चुना ये रास्ता

वाराणसी. यहां 450 सालों में पहली बार गोस्वामी तुलसीदास अखाड़े में 2 लड़कियों आस्था और संध्या ने इतिहास रचा।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Feb 01, 2018, 03:07 PM IST

    • वाराणसी की इन दोनों लड़कियों ने अखाड़े में पुरुषों को भी पटखनी दे दी।

      वाराणसी. यहां 450 सालों में पहली बार गोस्वामी तुलसीदास अखाड़े में 2 लड़कियों आस्था और संध्या ने इतिहास रचा। अखाड़े के महंत प्रो. विश्वम्भरनाथ मिश्र ने बताया, य‍हां सिर्फ पुरुष ही कुश्ती खेलने आते थे। लेकिन समाज में लड़कियों को पुरषों की बराबरी देने के लिए पहली बार महिला रेस्लरों को मौका दिया गया। दोनों लड़कियों ने पुरुषों को पटखनी दे दी। 1888 में 3 दिनों के लिए स्वामी विवेकानंद ने यहां आकर कुश्ती के दांव-पेंच सीखे थे।

      जब इस लड़की को बुरी नजर से देखने लगे थे लोग

      - वाराणसी के रहने वाली आस्था फूल-माला बेचने का काम करती है। उसने बताया, बचपन में पिता का साया सिर से उठ गया था।

      - घर चलाने के लिए मैं मां मधु वर्मा के साथ चिंतामणि गणेश मंदिर के सामने फूल-माला बेचने लगी। इसके अलावा ऑर्डर देने पर घरों और दुकानों तक भी माल पहुंचाती हूं।

      - पिता के न होने का असल अहसास उस समय हुआ जब लोगों ने मुझपर बुरी नजर रखनी शुरू कर दी। उसी समय मैंने सोच लिया था कि मैं पहलवान बनूंगी। खुद को इतना मजबूत बनाऊंगी कि मेरी फैमिली पर भी कोई बुरी नजर डालने की हिम्मत न करे।

      - 2008 में दुर्गाचरण इंटर कॉलेज से क्लास 9th में थी, तब कोच गोरखनाथ यादव कुछ लड़कियों को कुश्ती के लिए सिलेक्ट कर रहे थे। लेकिन कोई भी लड़की जाने को तैयार नहीं हुई, मैंने हां कर दी। बाद में मेरे साथ कई और लड़कियां साथ आईं।

      - 2009 में कुश्ती लड़ना शुरू किया, स्कूली गेम्स में पार्ट‍िसिपेट किया। 5 बार सब जूनियर स्टेट खेली। 5 बार नेशनल खेली हूं।

      - गोस्वामी अखाड़ा भी इसीलिए आई और 450 साल से चल रही पुरुषों की कुश्ती में अपना दम दिखाया।

      - मैं अभी हरिश्चंद्र महाविद्यालय से बीए फर्स्ट ईयर की पढ़ाई कर रही हूं। इंटरनेशनल लेवल पर कुश्ती में मैं गोल्ड मेडल जीतना चाहती हूं।

      लड़कों के सामने खुद को मजबूत बनाने के लिए इस लड़की ने चुनी कुश्ती
      - वाराणसी की रहने वाली संध्या ने बताया, हम 6 बहनें और 2 भाई हैं। 12 साल की उम्र में पिता कैलाश प्रजापति की मौत हो गई। वो बैंक में फोर्थ क्लास के इम्प्लाई थे। पापा के जाने के बाद मम्मी ने लोगों के घरों में काम करके परिवार को संभाला।

      - घर की आर्थ‍िक हालत को देखते हुए मैंने हाईस्कूल में ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था, मुझे 3000 रुपए मिलते थे। जिसे में मां के हाथ में दे देती थी।

      - उस दौरान अक्सर लड़के कमेंट पास करते थे। तभी ख्याल आया कि स्पोर्ट्स के जरिए मैं खुद को मजबूत बना सकती हूं और मैंने कुश्ती को चुन लिया।

      - किस्मत ने साथ दिया इंटर में पढ़ते समय चंद महीनों के अंदर मेरा सिलेक्शन साईं हॉस्टल, लखनऊ हो गया। 6 महीने तक मां ने किसी तरह खर्च भेजा। फिर एक दिन फोन करके कहा- पापा के फंड के पैसे भी खत्म हो गए, वापस आ जाओ।

      - मैं मां को टूटने नहीं देना चाहती थी, परिवार को बिखरने से बचाने के लिए बैग पैक किया और घर वापस आ गई। दोबारा से मैंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और बीएचयू से ग्रैजुएशन कंप्लीट किया।

      - वर्तमान में दवा की दुकान पर काम करती हूं, जहां मुझे 10 हजार सैलरी मिलती है।

      - हॉस्टल में रहने के दौरान मैं दर्जनों स्टेट खेली। 3 सीनियर स्टेट खेला, लेकिन प्लेस नहीं लगा। अखाड़े की मिट्टी में प्रैक्टिस करने का अपना अलग ही आनंद होता है।

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