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शिव मंदिर होकर भी यहां नहीं होती शिवरात्री पूजा, एक श्राप ने किया ये हाल

पंडित से लेकर वैज्ञानिक तक हैं हैरान, आखिर गंगा में क्यों टेढ़ा खड़ा है ये शिव मंदिर।

Danik Bhaskar | Feb 13, 2018, 06:28 PM IST

वाराणसी. तिथि के कन्फ्यूजन की वजह से देश के कुछ हिस्सों में जहां मंगलवार को शिवरात्री मनाई गई, वहीं कुछ क्षेत्रों में वेलेंटाइन्स डे के मौके पर यह व्रत-पूजा की जाएगी। क्या आप जानते हैं कि जिस नगरी में शिवजी शादी के बाद आकर बसे थे, वहां बने उनके एक मंदिर में पूजा नहीं की जाती। महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर बना रत्नेश्वर महादेव मंदिर साल के 9 महीने जल-मग्न रहता है। यही नहीं, यह मंदिर अज्ञात कारणों से टेढ़ा भी बना है। DainikBhaskar.com इसी रहस्यमयी मंदिर से जुड़े मिथ और फैक्ट्स अपने रीडर्स को बता रहा है।

MYTH नंबर 1.

- तीर्थ पुरोहित गोपाल ने बताया, "200 साल पहले अहिल्याबाई होल्कर की दासी रत्ना बाई ने इसे बनवाया था। बाढ़ का समय था। तब बहुत सारे कछुए नदी में आते हैं। कछुओं की वजह से मंदिर की नींव से गिट्टी हटा गईं थीं, जिससे मंदिर टेढ़ा हो गया।"

क्या कहते हैं फैक्ट

- अल्वर मंदिर के प्रमुख पुजारी डॉ. कमला कांत शर्मा ने बताया, "इस मंदिर की स्थापना अहिल्याबाई के समक्ष मराठा महिला रत्ना मां ने की थी। 18वीं शताब्दी में जेम्स प्रिंसेप के रेखा चित्रों में मंदिर स्ट्रेट दिखाई पड़ता है। संभवतः भार की वजह से यह बाद में एक ओर धंस गया।"
- राजस्व रिकॉर्ड में भी मंदिर का निर्माण महरानी अहिल्या बाई होल्कर की सिपहसलाकर रत्ना बाई द्वारा 1825-1830 के बीच दर्ज है। जानकारों के मुताबिक निर्माण के वक्त नींव और पत्थरों में एयर गैप रह गया होगा, जिससे मंदिर झुक गया।

मंदिर की AGE भी है कन्फ्यूजिंग

- इस मंदिर का निर्माण कब हुआ था इसे लेकर भी अलग-अलग दावे हैं। रेवेन्यू रिकॉर्ड के मुताबिक इसका कंस्ट्रक्शन 1825 से 1830 के बीच हुआ। वहीं रीजनल आर्कियोलॉजी ऑफिसर के मुताबिक यह 18वीं शताब्दी में बनकर तैयार हुआ था। घाट के आसपास बसे पुरोहितों का मानना है कि रत्नेश्वर महादेव की स्थापना 15वीं सदी में हुई थी।

इंग्लिश स्पेशलिस्ट कर चुके हैं रिसर्च

- इतिहासकार एसके सिंह के मुताबिक 18वीं शताब्दी के आसपास जेम्स प्रिंसेप ने अपने द्वारा बनाए बनारस के स्केच में रत्नेश्वर महादेव मंदिर को उकेरा था।
- बताया जाता है कि अंग्रेजों ने भी मंदिर के टेढ़ा होने के पीछे काफी रिसर्च की थी।
- कई दिनों तक अंग्रेज विशेषज्ञों की टीम ने दौरा भी किया था।

MYTH नंबर 2. अहिल्या बाई ने दिया था श्राप

 

पुरोहित श्याम शंकर तिवारी के मुताबिक इस मंदिर का निर्माण अहिल्या बाई की दासी ने करवाया था। अहिल्या बाई होलकर शहर में मंदिर और कुण्डों निर्माण करा रही थीं। उसी समय रानी की दासी रत्ना बाई ने भी मणिकर्णिका कुण्ड के समीप शिव मंदिर निर्माण कराने की इच्छा जताई। 

निर्माण के लिए उसने अहिल्या बाई से पैसे उधार लिए थे। वो मंदिर देख प्रसन्न थीं, लेकिन उन्होंने रत्ना बाई से कहा था कि वह इस मंदिर को अपना नाम न दे। दासी ने उनकी बात नहीं मानी और मंदिर का नाम रत्नेश्वर महादेव रखा। इस पर अहिल्या बाई नाराज़ हो गईं और श्राप दिया कि इस मंदिर में बहुत कम ही दर्शन-पूजन हो पाएगी। तभी मंदिर टेढ़ा हो गया और साल में ज्यादातर समय गंगा में डूबा रहता है।

 

 

MYTH नंबर 3. संत के क्रोध ने किया टेढ़ा

 

स्थानीय निवासी रमेश कुमार सेठ ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण किसी राजा ने करवाया था। 18वीं शताब्दी के आस पास कोई महान संत इस मंदिर पर साधना किया करते थे। संत ने राजा से मंदिर के रखरखाव और पूजन करने की जिम्मेदारी मांगी थी। 
राजा ने संत को मंदिर नहीं दिया, जिससे क्रोधित महात्मा ने श्राप दिया- जाओ यह मंदिर कभी पूजा करने लायक नहीं रहेगा, और मंदिर टेढ़ा हो गया।

MYTH नंबर 4. पंडों को मिले श्राप से झुका मंदिर

 

मंदिर की देखभाल करने वाले गोपाल मिश्रा ने भी अपना वर्जन बताया। गोपाल के मुताबिक यहां कभी एक महंत पूजापाठ करते थे। उन्हें यहां के पंडे तंग किया करते थे, जिससे वे क्रोधित होकर श्राप देकर चले गए। तब से आज तक इस मंदिर की पूजा बमुश्किल साल में केवल 4 महीने ही हो पाती है। बाकि 8 महीने मां गंगा ही अभिषेक करती हैं या बाढ़ की मिट्टी गर्भ गृह में पड़ी रहती है।

MYTH नंबर 5. नहीं उतरा मां का कर्ज

 

तीर्थ पुजारी राजकुमार पांडे ने बताया कि कथाओं के अनुसार 15 और 16वीं शताब्दी के बीच कई राजा-रानियां काशी वास के लिए आए। उनमें से एक थे मान सिंह। 
उनका सेवक (नाम का कहीं उल्लेख नहीं है) भी अपनी मां रत्नाबाई को लेकर काशी आया। वह अपनी मां के दूध का कर्ज उतारना चाहता था, जिसके लिए उसने शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
निर्माण के लिए उसने देश के कई हिस्सों से शिल्पकारों को बुलावाया। बेटा दूध का कर्ज उतारना चाहता है इस बात से मां की भावनाओं को ठेस लगी। जब बेटे ने मां से कर्ज की बात कहते हुए मंदिर में दर्शन करने को कहा तो वह बाहर से ही प्रणाम कर चली गई।
बेटे ने रोककर कहा, मां अंदर दर्शन नहीं करोगी क्या? इस पर मां ने कहा कि कैसे करूं यह मंदिर तो सही बना ही नहीं। बेटे ने जैसे ही पलट कर देखा, वैसे ही मंदिर एक तरफ धंस गया और टेढ़ा हो गया।