Hindi News »Uttar Pradesh »Varanasi» Passion Of Kabutar Bazi In Varanasi

यहां एक इशारे पर अासमान से वापस आ जाते हैं कबूतर, ऐसे होती है ट्रेनिंग

वाराणसी. काशी के लोगों को खान-पान के साथ कबूतरबाजी के शौक के लिए भी जाना जाता है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 13, 2018, 01:54 PM IST

    • वाराणसी.काशी के लोगों को खान-पान के साथ कबूतरबाजी के शौक के लिए भी जाना जाता है। DainikBhaskar.com आपको सबसे बड़े कबूतरबाजों के बारे में बता रहा जो, शौक में अलग-अलग प्रजाति के एक हजार से ज्यादा कबूतरों को पाले हुए हैं। ये कबूतर इतने वफादार हैं कि इनके एक इशारे पर आसमान में चले जाते है और कई किलोमीटर जाने के बाद एक आवाज पर वापस आ जाते हैं।

      20 साल पाल रहे हैं कबूतर

      - सोनारपुरा के रहने वाले कबूतरों के शौकीन रोहित यादव ने बताया, ''20 साल से कबूतर रखे हैं। कुछ कबूतर अंडा देते हैं, वो कम उड़ते है। तो कुछ केवल कॉम्पटीशन में काम आते हैं।''

      - कबूतर की वैराइटी के हिसाब से दरबे बने हुए हैं। इसमें अंडा देने वाले कबूतर, उड़ान भरने वाले, अनट्रेंड कबूतरों को अलग, बीमार कबूतरों का अलग-अलग रखा जाता है।

      - इन कबूतरों की कई प्रजात‍ियां हैं, जिनमें 5 बहुत खास मानी जाती हैं। इनकी कीमत 10 हजार रुपए पेयर तक है।

      ये हैं पांच प्रजात‍ियां

      1. कागदी कबूतर

      - ये बिल्कुल सफेद होते हैं। बड़े साइज के और बड़ी चोंच वाले होते हैं। ये अंडा देकर प्रजाति बढ़ाने के काम आते हैं। इनकी कीमत 4 हजार रुपए पेयर होती है।

      2. नीलेह्यूमर कबूतर

      बड़े साइज के ये कबूतर अपनी तेज रफ्तार के लिए जाने जाते हैं। इनकी इतनी रफ्तार होती है की ये पहाड़ों पर गिरते झरने को चीरते हुए क्रॉस करके पहाड़ो में अंडे देने जाते हैं। ये 3 हजार से 20 हजार रुपए पेयर मिलते हैं।

      3. कावरा कबूतर

      देखने में सुंदर लगते हैं। महंगे होते हैं, इनकी कीमत 10 हजार रुपए पेयर होती है।

      4. खाल कबूतर

      ये छोटे-छोटे और सुंदर दिखते हैं, ये भी 10 हजार पेयर मिलते हैं।

      5. सराजी कबूतर

      देखने में सुंदर और उड़ने में और कॉम्पटीशन में बहुत ही कुशल होते हैं। इनकी कीमत 5 हजार रुपए पेयर होती है।

      ऐसे होती है कबूतरों की ट्रेनिंग

      - कबूतरों के ट्रेनर लल्ली ने बताया कि इनकी ट्रेनिंग बहुत ही खास होती है।
      - पहले इन्हें 15 दिन छत पर ऐंगल पर जाल बांधकर रखा जाता है, ताकि लिमिट ऊंचाई में उड़ें और दिशा ज्ञान हो पाए। साथ ही हमारी आवाज और अपनी छत को पहचानना सीख जाएं।
      - 15 दिन बाद इन्हें निकालकर चारे के सहारे दरबे के ऊपर-नीचे उड़ना सिखाते हैं।
      - एक महीने बाद खुले आसमान में आवाज और इशारों पर उड़ना सिखाते हैं।
      - इसके बाद जब अच्छी तरह अपनी छत और मालिक की आवाज पहचानने लगते तब लम्बी उड़ान के लिए छोड़ते हैं।

      - ये एक बार में लगभग 5 किलोमीटर तक उड़कर वापस आते हैं।

      - ट्रेनर बुच्चन यादव ने बताया, ''खाने में मक्खन, सरसों, बजड़ा, चना, घी, रोटी, पिस्ता, बादाम बहुत पसंद होता है।

      - बच्चों की तरह इनकी परवरिश की जाती है। सजाने के लिए किसी-किसी को पायल, छोटा माला भी पहनाया जाता है।

    • यहां एक इशारे पर अासमान से वापस आ जाते हैं कबूतर, ऐसे होती है ट्रेनिंग
      +2और स्लाइड देखें
    • यहां एक इशारे पर अासमान से वापस आ जाते हैं कबूतर, ऐसे होती है ट्रेनिंग
      +2और स्लाइड देखें
    आगे की स्लाइड्स देखने के लिए क्लिक करें
    दैनिक भास्कर पर Hindi News पढ़िए और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट | अब पाइए News in Hindi, Breaking News सबसे पहले दैनिक भास्कर पर |

    More From Varanasi

      Trending

      Live Hindi News

      0

      कुछ ख़बरें रच देती हैं इतिहास। ऐसी खबरों को सबसे पहले जानने के लिए
      Allow पर क्लिक करें।

      ×