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देश की आजादी में तवायफों ने की थी मदद, एक्ट्रेस नर्गिस की मां भी थी शामिल

वाराणसी में तवायफों से पुराना रिश्ता रहा है। इन्होंने देश की आजादी में बहुत मदद की।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 26, 2018, 11:11 AM IST

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    जद्दन बाई।

    वाराणसी (यूपी). यहां तवायफों का इतिहास आज भले ही पन्नों में दफन हो चुका है, लेकिन काशी से इनका पुराना रिश्ता रहा है। 19वीं शताब्दी के शुरुआत में यहां के कई चौराहे और गलियों में महफिल सजाई जाती थी। इस दौरान वहां आजादी की रणनीति तैयार की जाती थी। यही नहीं, उनके द्वारा सजाई गई संगीत की महफिल से रईसों से पैसा जुटाकर क्रांतिकारियों को मुहैया कराया जाता था। DainikBhaskar.com ऐसी ही कुछ तवायफों के बारे में बताया, जिन्होंने देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

    फिल्म अभिनेत्री नर्गिस की मां थी जद्दन बाई...

    - ''लागत करेजवा में चोट'' वृन्दावनी श्रृंगार कि ये ऐसी बंदिशे हैं। जो जद्दन बाई की याद को ताजा करती हैं। ये अपने समकालीन गायिकाओं में सबसे सुंदर थी। अपने जमाने की मशहूर फिल्म अभिनेत्री नर्गिस इन्ही की बेटी थी।
    - बनारस में चौक थाने के पास इनकी महफ़िल सजती थी। जद्दन बाई ने संगीत की शिक्षा दरगाही मिश्र और उनके बेटे जो सारंगी वादक थे। उस जमाने में जद्दन बाई के कई गीत ग्रामोफोन में भी रिकार्ड किए गए।
    - बताया जाता है कि जद्दन बाई अपने धर्म की बड़ी पाबंद थी। उन्हें महफ़िल में जलालत बिल्कुल बर्दास्त नहीं था। बिहार में एक बार सजी महफ़िल छोड़कर काशी चली आई थी।
    - कुछ दिन बाद बनारस छोड़ जद्दन बाई मुंबई चली गई थी। लगभग 2 दशक तक वो बनारस में चौक और दालमंडी इलाके में रही हैं। जद्दन बाई के यहां बच्चे भी संगीत की शिक्षा लेने जाया करते थे। मुख्य रूप से ये ठुमरी और ख्याल गाती थी।

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    गौहर जान।

    गौहर जान को था इस बात का घमंड


    - गौहर जान की महफिल कोलकाता में सजती थी। काशी के रईस संगीत का आनंद लेने वहां भी जाया करते थे। गौहर को इस बात का भी काफी घमंड था कि उनकी महफ़िल की फीस आम आदमी के बस की नहीं थी।
    - 1916-17 के आसपास काशी के रईस ललन जी छगन जो 2 भाई हुआ करते थे। जो संगीत के काफी शौकीन थे। दोनों भाइयों ने मुंह मांगे फीस पर गौहर बनारस बुलाया और 10 दिनों तक बिना संगीत सुने फीस देते रहे।
    - 11 दिन बाद गौहर जान ने नौकर से पूछा बिना फीस दिए सेठ साबित क्या करना चाहते हैं, तब छगन जी भाई गौहर जान के सामने आए और बोले- यही हैं बनारस, आज शाम गणेश बाग में संगीत की महफ़िल सजेगी।
    - काशी के कई रईस इस संगीत की संध्या में शामिल हुए। ऐसा सिलसिला काफी दिनों तक चला। गौहर जान ठुमरी, चैती, कजरी, ख्याल गाती थी।

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    सिद्धेश्वरी देवी।

    मणिकर्णिका घाट पर सजती थी महफ‍िल

    - सिद्धेश्वरी देवी चंदा बाई की लड़की थी। सिद्धेश्वरी देवी ने सन् 1900 के आसपास सीयाजी महाराज से संगीत की तालीम ली। मणिकर्णिका घाट के पास इनका अपना घर हुआ करता था।
    - सिद्धेश्वरी देवी का कोठा घर पर ही हुआ करता था। जहां संगीत के कद्रदानों की महफ़िल शाम होते ही सजने लगती थी। महफ़िल जमाने के लिए सिद्धेश्वरी देवी खेमटा, कहरवा, सादरा, टप्पा, ख्याल की बंदिशे गाती थी।
    - बाद में इन्होने आजादी के समय कई देश भक्ति गीत भी गाए थे। कहा जाता हैं, इनकी महफ़िल जब सजती थी तो लोग कहते थे ये 'स्वर जीवनी' हैं।

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    रसूलन बाई।

    महफ‍िल में होती थी रणनीति पर चर्चा

    - 'फुलगेंदवा न मारों मैका लगत जोवनवा में (करेजवा )चोट... शंभू खां, रसूलन बाई के उस्ताद थे। जिनसे उन्होंने संगीत की तालीम ली थी। इनका कोठा दालमंडी में था। बनारस के चौक इलाके में रसूलन बाई की जब महफ़िल लगा करती थी तो रईस कद्रदानों की भारी भीड़ उमड़ा करती थी।
    - 1920-22 के आसपास रसूलन बाई की संगीत की महफ़िल में आज़ादी की लड़ाई की रणनीति भी तैयार की जाती थी। बाद में रसूलन बाई ने आभूषण तक पहनना छोड़ दिया था।
    - अपने कोठे पर लोगों को आजादी के तराने सुनाया करती थी। ब्रिटिश हुकूमत ने रसूलन बाई को काफी प्रताड़ित भी किया था। रसूलन बाई को संगीत और तहजीब की मिसाल कहा जाता है।
    - बताया जाता हैं की काशी के रईस अपने बच्चों के साथ इनकी संगीत की महफ़िल में सिरकत करते थे। रसूलन बाई ठुमरी, टप्पा चैती प्रमुख रूप से गाती थी ।

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Web Title: Republic Day Special News Of Varanasi Tawaif
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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