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दुनिया बनने से 80 हजार साल पहले बना ये कुंड, गिरा था मां पार्वती का झुमका

DainikBhaskar.com आपको काशी की एक ऐसी प्राचीन जगह के बारे में बता रहा है, जो गंगा अवतरण के पहले का माना जाता है।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Jan 07, 2018, 01:25 PM IST

    • वाराणसी.विश्व की प्राचीनतम नगरी काशी पूरे विश्व में जानी-पहचानी जाती है। जिसको देखने-जानने के लिए देश और विदेश से लोग आते रहते हैं। DainikBhaskar.com आपको काशी की एक ऐसी प्राचीन जगह के बारे में बता रहा है, जो गंगा अवतरण के पहले का माना जाता है। इस बात का उल्लेख स्कंद पुराण के काशीखंड में भी दर्ज है। गंगा के किनारे स्थित इस जगह को मणिकर्णिका कुंड कहते हैं। इसे भगवान विष्णु ने अपने चक्र से बनाया था। इसलिए इसे मणिकर्णिका चक्र पुष्करणी तीर्थ भी कहते हैं।

      इसलिए नाम पड़ा 'मणिकर्ण‍िका', 80 हजार साल है पुराना
      - ऐसी मान्यता है कि यहां दोपहर में आज भी विष्णु और शिव अपने समस्त देवी देवताओं के साथ भी स्नान ध्यान करने आते हैं। इसलिए स्थानीय लोगों के साथ दक्षिण भारतीय लोग यहां दोपहर में स्नान करने आते हैं।
      - कुंड के बगल में स्थित अलवर मंदिर के खानदानी पुजारी कमल कांत शर्मा के मुताबिक, स्कंद पुराण के काशीखंड में लिखा है कि सृष्टि काल के आरंभ में भगवान विष्णु ने यहां 80 हजार वर्षों तक तपस्या की थी। उन्होंने ही इसे अपने चक्र से इसका निर्माण किया था। इसलिए इसे चक्र पुष्करणी भी कहते हैं।
      - बाद में इसमें शिव और पार्वती ने प्रसन्न होकर स्नान किया। स्नान के पहली डुबकी के बाद जब दोनों ने अपना माथा झटका तब शिव की मणि और पार्वती का कुंडल गिर गया। तभी से इसका नाम मणिकर्णिका कुंड पड़ा। वैसे इसका पूरा नाम चक्र पुष्करणी मणिकर्णिका तीर्थ है।

      यहां दोहपर में स्नान करने से मिल जाता है मोक्ष
      - कमल कांत शर्मा ने यहां दोपहर स्नान के बारे में बताया कि आदि शंकराचार्य ने अपने मणिकर्णिका स्रोत में लिखा है- 'माध्याने मणिकर्णिका हरिहरो सायुज्य मुक्ति प्रदौ' यानि दोपहर में यहां स्नान करने वालों को शिव और विष्णु दोनों लोग अपने सानिध्य में लेकर मुक्ति प्रदान कर देते हैं।
      - इसलिए लोग मान्यता के अनुसार, यहां दोपहर में भगवान खुद स्नान करते हैं, इसलिए लोग दोपहर में स्नान करने आते हैं।
      - मणिकर्णिकाकुंड के बाहर विष्णुचरण पादुका है। मणिकर्णिकाकुंड घाट तल से करीब 25 फिट नीचे स्थित है। कुंड में जाने के लिए चारो तरफ से 17-17 सीढियां बनी हुई हैं।
      - कुंड के किनारे दक्षिण दिशा में भगवान विष्नू गणेश और शिव की प्रतिमा भी स्थापित है। यहां लोग स्नान करने के बाद जल चढ़ाते हैं।

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