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दिन में तीन दिन चलाता है रिक्शा, इकट्ठा हुए पैसों से कर रहा B.H.U. में पीएचडी

फेसबुक पर तेजी से वायरल हो रहे हैं रिक्शा चलाने वाले मुकेश मिश्रा, ये है पीएचडी का वायरल सच।

DainikBhaskar.com | Last Modified - Feb 15, 2018, 03:31 PM IST

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    वाराणसी. एक रिक्शा चलाने वाला अपनी मेहनत से न सिर्फ परिवार का पेट पाल रहा है, बल्कि भाई को भी पढ़ा रहा है। वो नेट एग्जाम क्वालिफाई कर चुका है और इकोनॉमिक्स में प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पीएचडी भी कर रहा है। फेसबुक पर तेजी से शेयर हो रही यह पोस्ट लोगों के लिए प्रेरणा बन रही है।

    कुछ ऐसी है इस वायरल पोस्ट की डीटेल्स

    यह हैं मुकेश मिश्र। बनारस में अपनी पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के लिए हफ्ते में तीन दिन रिक्शा चलाकर धन अर्जित करते हैं।
    पिता का देहांत हो चुका है। मुकेश अपने एक छोटे भाई को पॉलिटेक्निक (सिविल) करवा रहे हैं। मुकेश स्वयं Net Exam निकाल चुके हैं और Economics (अर्थशास्त्र) विषय से अभी वर्तमान समय में पीएचडी कर रहे हैं।
    मुकेश मिश्र से पूछा गया कि आप की पारिवारिक दुर्दशा पर क्या कभी कोई सरकारी मदद आपको मिला है ?


    उन्होंने हंस कर मुझे जवाब दिया, "क्या सर जी, ब्राह्मण हूं जन्म से। भीख मांग लूंगा, यह करना हमारा स्वभाव है। हमने भीख मांगकर देश का निर्माण किया है। दान ले कर दूसरे को और समाज को दान में सब कुछ दिया है। हम सरकार से अपेक्षा क्यों करें? हम स्वाभिमान नहीं बेच सकते। हम आरक्षण के लिये गिड़गिड़ा नहीं सकते। हम मेहनत कर सकते हैं। रिक्शा चलाने में अपना स्वाभिमान समझते हैं। किसी का उपकार लेकर जीना पसन्द नहीं है। परशुराम के वंशज हैं। हम पकौड़ा तल कर अपने और अपने भाई की पढ़ाई पूरी कर सकते हैं, करेंगे। आप देखियेगा, कल हम खड़े हो जायेंगे। पीएचडी पूरी कर कहीं लग जायेंगे। रिक्शा भी चलाते हैं । मेहनत से पढ़ाई भी पूरी करते हैं। पीएचडी मेरी तैयार है। टाइप वगैरह के लिये थोड़ा और रिक्शा चलाऊंगा। भाई की पढ़ाई भी पूरी होने वाली है। माता की सेवा भी करता हूं। मां को कुछ करने नहीं देता। वे बस हमें दुलार कर साहस दे देती हैं।

    आगे पढ़ें, ये है पोस्ट की सच्चाई

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    ये है पोस्ट की सच्चाई

    - DainikBhaskar.com ने रिक्शावाले का पता लगाने की कोशिश की। बीएचयू के इकोनॉमिक्स डिपार्टमेंट के H.O.D. आद्या प्रसाद पांडे ने बताया, "हमारे करंट रिकॉर्ड्स में किसी मुकेश मिश्र का नाम दर्ज नहीं है। अगर पिछले 4-5 सालों में कोई ऐसा स्टूडेंट आता भी, तो उसे रिक्शा तो कतई नहीं चलाना पड़ता। नेट क्वालिफाई करने वाले स्टूडेंट को यूनिवर्सिटी 8 हजार रुपए का फिक्स्ड स्टाइपेंड देती है। ऐसे में उसे रिक्शा चलाने की इजाजत नहीं होती।"

    - पोस्ट वायरल होने के बाद मुकेश की मदद के लिए यूनिवर्सिटी को कई फोन कॉल आ रहे हैं। एचओडी के मुताबिक यह पूरी तरह फर्जी पोस्ट है।

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    ये है एक रिक्शेवाले के संघर्ष की सच्ची कहानी, बेटे को बनाया IAS

    - गोविंद 2007 बैच के IAS अफसर हैं। वे इस समय गोवा में सेक्रेट्री फोर्ट, सेक्रेट्री स्किल डेवलपमेंट और इंटेलि‍जेंस के डायरेक्टर जैसे 3 पदों पर तैनात हैं। उनके प‍िता नारायण जायसवाल ने बताया, ''मेरी 3 बेटियां (निर्मला, ममता, गीता) और एक बेटा गोविंद है। अलईपुरा में हम किराए के मकान में रहते थे। मेरे पास 35 रिक्शे थे, जिन्हें किराए पर चलवाता था।''
    - ''सब ठीक चल रहा था। इसी बीच पत्नी इंदु को ब्रेन हैमरेज हो गया, जिसके इलाज में काफी पैसे खर्च हो गए। 20 से ज्यादा रिक्शे बेचने पड़े, लेकिन वो नहीं बची।''
    - ''पत्नी की मौत के समय बेटा गोविंद 7th क्लास में था। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी। तीनों बेट‍ियों की शादी में सारे रिक्शे बिक गए, सिर्फ एक रिक्शा बचा, जिसे मैंने खुद चलाना शुरू किया, ताकि गोविंद की पढ़ाई अच्छे से हो सके।''
    - ''पैसे नहीं थे, इसलिए बेटे के लिए सेकंड हैंड किताबें खरीदकर लाता था। कई बार हम दोनों ने सूखी रोटियां खाकर रात काटी, लेकिन बेटे ने कभी किसी चीज की मांग नहीं की। मैं खुद उसे रिक्शे पर बैठाकर स्कूल छोड़ने जाता था। लोग ताने भी देते थे कि देखो ये रिक्शावाला बेटे को IAS बनाएगा।''
    - ''हरिश्चंद्र महाविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद 2006 में गोविंद सिविल सर्विस की तैयारी के लिए दिल्ली चला गया। वहां उसने ट्यूशन पढ़ाकर खुद का खर्च निकाला। 2007 में वो पहले ही अटेम्प्ट में IAS के लिए सिलेक्ट हो गया।''
    - गोविंद की बड़ी बहन ममता कहती हैं, ''भाई बचपन से ही पढ़ने में तेज था। मां के देहांत के बाद भी उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी। उसके दिल्ली जाने के बाद पिता जी बड़ी मुश्क‍िल से पढ़ाई का खर्च भेज पाते थे। घर की हालत देख भाई ने चाय और एक टाइम का टिफिन भी बंद कर दिया था।''

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    अब इस आलीशान मकान में रहती है आईएएस गोविंद की फैमिली।

    IAS ने बताया, दोस्त के प‍िता ने बेइज्जत कर घर से क‍िया था बाहर

    - गोविंद ने बताया, ''बचपन में एक बार दोस्त के घर खेलने गया था, उसके पिता ने मुझे कमरे में बैठा देख बेइज्जत कर घर से बाहर कर दिया और कहा कि दोबारा घर में घुसने की हिम्मत न करना। उन्होंने ऐसा सिर्फ इसलिए किया, क्योंकि मैं रिक्शाचालक का बेटा था।''
    - ''उस दिन से किसी भी दोस्त के घर जाना बंद कर दिया। उस समय मेरी उम्र 13 साल थी, लेकिन उसी दिन ठान लिया कि मैं IAS ही बनूंगा, क्योंकि यह सबसे ऊंचा पद होता है।''
    - ''हम 5 लोग एक ही रूम में रहते थे। पहनने के लिए कपड़े नहीं थे। बहन को लोग दूसरों के घर बर्तन मांजने की वजह से ताने देते थे। बचपन में दीदी ने मुझे पढ़ाया।''
    - ''दिल्ली जाते समय पिता जी ने गांव की थोड़ी जो जमीन थी, वो बेच दी। इंटरव्यू से पहले बहनों ने बोला था कि अगर सिलेक्शन नहीं हुआ तो परिवार का क्या होगा। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी।''
    - ''आज मैं जो कुछ भी हूं, पिता जी की वजह से हूं। उन्होंने मुझे कभी अहसास नहीं होने दिया कि मैं रिक्शेवाले का बेटा हूं।''
    - गोविंद जायसवाल ने बताया, ''फर्स्ट अटेम्ट में ही मेरी 48वीं रैंक आई थी। मेरी शादी 2011 में IPS चंदन से हुई थी। वो भी गोवा में ही तैनात हैं।''
    - बता दें, किराए के एक कमरे में रहने वाला गोविंद का परिवार अब वाराणसी शहर में बने आलीशान मकान में रहता है।

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