मान्यता / काशी के कोतवाल हैं काल भैरव, इनकी इजाजत के बिना यमराज भी नहीं ले सकते किसी के प्राण



Even without permission of Kashi's Kotwal, Yamraj cannot defeat anyone's life
काशी के कोतवाल काल भैरव का मंदिर। काशी के कोतवाल काल भैरव का मंदिर।
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Even without permission of Kashi's Kotwal, Yamraj cannot defeat anyone's life
काशी के कोतवाल काल भैरव का मंदिर।काशी के कोतवाल काल भैरव का मंदिर।

  • भैरव अष्टमी आज, भैरव बाबा को माना जाता है महादेव शिव का पाचवां रुद्र अवतार
  • वाराणसी के काल भैरव मंदिर में धूमधाम से मनाई जाती है भैरव अष्टमी, श्रद्धालु पहुंचे

Dainik Bhaskar

Nov 19, 2019, 10:25 AM IST

वाराणासी (अमित मुखर्जी). उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक नगरी काशी में भैरव अष्टमी काफी धूमधाम से मनायी जाती है। इस बार भी 19 नवम्बर को गोलघर स्थित काल भैरव मंदिर में धूमधाम से यह अष्टमी मनाई जाएगी। काल भैरव को काशी के काेतवाल की संज्ञा से विभूषित किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि खुद यमराज भी बिना इजाजत के यहां किसी के प्राण नहीं हर सकते। मंदिर के महंत मोहित जोगेस्वर ने बताया कि काल भैरव शिव के पांचवे रुद्र अवतार माने जाते हैं।

 

कैसे बाबा भैरव बने काशी के कोतवाल

कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। इसके बाद सभी भगवान शिव के पास गए। कुछ बातों को लेकर ब्रह्मा जी, भगवान शिव को भला-बुरा कहने लगे। इसके बाद भगवान शिव को गुस्सा आ गया। भगवान शिव के गुस्से से ही काल भैरव जी प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्मा जी का सिर काट दिया था।

 

काल भैरव पर लगा था ब्रह्म हत्या का दोष 
काल भैरव पर ब्रह्म हत्या का दोष लगने के बाद वह तीनों लोकों में घूमे। लेकिन उनको मुक्ति नहीं मिली। इसके बाद भगवान शिव ने आदेश दिया कि तुम काशी जाओ, वहीं मुक्ति मिलेगी। इसके बाद वह काल भैरव के रूप में वो काशी में स्वयं भू प्रकट हुए।

 

काशी के कोतवाल हैं काल भैरव

कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ काशी के राजा हैं और काल भैरव उनके कोतवाल, जो लोगों को आशीर्वाद भी देते हैं और सजा भी। यमराज को भी यहां के इंसानों को दंड देने का अधिकार नहीं है। महंत के मुताबिक, काल भैरव के दर्शन मात्र से शनि की साढ़े साती, अढ़ैया और शनि दंड से बचा जा सकता है।

 

बाजीराव पेशवा और अहिल्याबाई ने कराया मंदिर का जीर्णोद्धार
बाजीराव पेशवा और कालांतर में रानी अहिल्या बाई होलकर ने मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया। मंदिर का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता है। बाबा की इतनी श्रद्धा और भक्ति है कि बगल के थाने (कोतवाली) में कोई प्रशासनिक अधिकारी कभी निरीक्षण नहीं करता और न ही अपनी कुर्सी पर थानाध्यक्ष बैठता है। यहां के कोतवाल बाबा भैरव ही हैं। 

 

चारों पहर होती है भैरव की आरती
ईशान कोण पर स्थित मंदिर तंत्र साधना का बड़ा केंद्र है। शनि की साढ़े साती से मुक्ति यहां तेल अर्पण करने से होता है। बाबा को दाल बरा,मदिरा,पेड़ा ,मलाई खूब प्रिय है। भैरव की चारों प्रहर की आरती होती है, जहां भक्तों की काफी भीड़ लगती है।

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