यूपी में निर्भया के गांव से रिपोर्ट / दरिंदों की फांसी की हर अपडेट लेते रहे परिजन; गांव में जश्न का माहौल, लोगों ने मिठाइयां बांटी

चारों दोषियों को फांसी मिलने के बाद गांव में ढोल बजने लगे।
निर्भया के गांव में रातभर फांसी का इंतजार करते रहे ग्रामीण। निर्भया के गांव में रातभर फांसी का इंतजार करते रहे ग्रामीण।
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निर्भया के गांव में रातभर फांसी का इंतजार करते रहे ग्रामीण।निर्भया के गांव में रातभर फांसी का इंतजार करते रहे ग्रामीण।

  • निर्भया जब 16-17 साल की थी, तब आखिरी बार अपने गांव मेडौला कलां आईं थीं
  • निर्भया के पिता बीते 27 सालों से दिल्ली में रहते हैं, गांव में चाचा, चचेरे दादा और चचेरी बहन रहती हैं
  • फांसी के बाद परिजनों के साथ-साथ सभी गांववालों के चेहरे पर सुकून दिखा, महिलाओं ने ढोल बजाकर गीत भी गाए

अमित मुखर्जी

अमित मुखर्जी

Mar 20, 2020, 12:23 PM IST

बलिया.  यूपी का बलिया शहर, लखनऊ और कानपूर जैसे बड़े शहरों से बराबर दूरी लिए हुए है और इसी शहर से 45 किमी दूर है मेडौला कलां गांव। वैसे, अब इस गांव को इस नाम से कम ही जाना जाता है। आसपास और दूर-दराज के गांव के लोग इसे निर्भया का गांव ही कहने लगे हैं। निर्भया के चारों दरिंदों को हुई फांसी से पहले गांव का माहौल जानने के लिए हम भी यहां पहुंच गए। सुबह करीब पांच बजे जब हम यहां आए तो इक्का-दुक्का लोग ही सड़कों पर दिखाई दिए, क्योंकि ज्यादातर लोग घरों में न्यूज चैनलों पर नजर जमाए हुए थे।

हम सीधे निर्भया के दादा लाल सिंह के घर पहुंचे। वे बताते हैं, "बेटी के जन्म से पहले ही बद्रीनाथ (निर्भया के पिता) दिल्ली चले गया था। निर्भया का जन्म भी दिल्ली में ही हुआ। पढ़ाई के चलते पोती कम ही गांव आ पाती थी और 7 साल पहले जो हुआ उसके बाद तो कुछ बचा ही नहीं था। मुझे बस उन दरिंदों की फांसी का इंतजार था जो आज पूरा हो गया। आज भारत से सबसे बड़ा कोरोना खत्म हो गया।"

निर्भया के दादा लाल सिंह (बाएं) ने आरोपियों को फांसी के बाद पूरे गांव में लड्डू बांटे।

वो काली रात थी आज नया सवेरा हुआ है : चाचा सुरेश सिंह

निर्भया के चाचा-चाची समेत पूरा परिवार आज भी इसी गांव में रहता है। चाचा सुरेश सिंह कहते हैं , "दिसंबर 2012 की वो रात एक काली रात थी और आज एक नया सवेरा हुआ है। हमारे लिए तो आज ही होली है और दिवाली भी।" वे बताते हैं कि निर्भया आखिरी बार जब 16-17 साल की थी, तब गांव आई थी। उसे देखे कई साल बीत गए थे और फिर उस काली रात के बाद सब कुछ खत्म हो गया। हमारी बिटिया इंसाफ चाहती थी, लेकिन यह मिलने में बहुत देर लगी। हैदराबाद में बलात्कारियों को जिस तेजी से सजा मिली वैसा ही होता तो ज्यादा खुशी होती।" 

निर्भया के चाचा सुरेश सिंह (बीच में) पोती के हत्यारों को फांसी दिए जाने का रातभर टीवी पर अपडेट लेते रहे।

चाची भाग्यमणि कहती हैं कि , "7 साल से इस दिन का इंतजार कर रहे थे। इतने सालों के इंतजार के बाद अब कलेजे को ठंडक पहुंची है।" निर्भया के चचेरे दादा शिवमोहन भी कहते हैं कि न्याय मिलने में बहुत ज्यादा देरी हुई। इसी देरी के कारण देश में ऐसे दरिंदो की संख्या बढ़ रही है। ऐसे मामलों में तुरंत न्याय मिलना चाहिए।

"आज दीदी को न्याय मिला, इस बात की खुशी है"
निर्भया की मौत के बाद मां आशादेवी और पिता बद्रीनाथ ने अपने इस गांव में 6 साल पहले आशा-निर्भया ट्रस्ट की स्थापना की थी। आज गांव की 30 से ज्यादा बच्चियां इससे जुड़ी हुई हैं। कैम्प में लड़कियों को आत्मरक्षा के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से मजबूत बनाया जाता है। इस कैम्प की ग्रुप लीडर आर्या कहती हैं, "दीदी आज हमारे बीच नहीं है, इसका दुख है लेकिन आज उन्हें न्याय मिल गया, इस बात की खुशी है। इतने सालों बाद आज खुशी का दिन आया है।" बीएससी थर्ड ईयर की स्टूडेंट दिव्यानी कहती हैं कि "ये दरिंदे हमारे समाज में कोरोनावायरस की तरह थे। ऐसे लोगों को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए। इससे आगे ऐसे होने वाले अपराध रूकेंगे और साथ ही लड़कियों के मन से भी डर बाहर निकलेगा।"

निर्भया के दोषियों को हुई फांसी के बाद गांव में लड़कियों ने होली भी खेली।

जैसे-जैसे सुबह होती गई लोग घर के बाहर निकलकर नाच गाने लगे

पूरे गांव को इस दिन का बेसब्री से इंतजार था। दरिंदों को फांसी दिए जाने से पूरे गांव में जश्न का माहौल है। फांसी के बाद जैसे-जैसे सूरज चढ़ता गया, वैसे-वैसे लोग घरों से बाहर निकलकर नाच गाने लगे। निर्भया के गांव के वीरेंद्र कहते हैं कि आज का दिन बहुत खुशी का दिन है। इस फांसी से पूरे गांव को खुशी मिली है।

चारों दोषियों को हुई फांसी के बाद गांव में कुछ इस तरह ढोल बजने लगे।  

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