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यशस्वी के लिए प्रेरणादायक बना सचिन तेंदुलकर का गिफ्टेड बैट, मां बोली- विराट के साथ खेले बेटा, यही सपना

8 महीने पहले
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  • अंडर-19 वर्ल्ड कप क्रिकेट टीम के लिए यशस्वी जायसवाल का हुआ है चयन
  • भदोही के सुरयावां गांव का रहने वाला है यशस्वी जायसवाल
  • बचपन बेहद आर्थिक तंगी में गुजरा, चाचा के साथ मुंबई गया था यशस्वी
  • पिता बोले- बेटे ने मेरा सपना पूरा किया

भदोही. अंडर-19 वर्ल्ड कप 2020 के लिए भदोही के सुरयावां नगर के यशस्वी जायसवाल का चयन हुआ है। पिता भूपेंद्र पेंट की दुकान चलाते हैं। मां कंचन गृहणी हैं। मां ने कहा- अब मेरी तमन्ना है कि बेटा मोंटी (यशस्वी का घर का नाम) भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली के साथ खेले। भारत को वर्ल्ड कप दिलाए। बताया- पिछले साल मुंबई में सचिन तेंदुलकर ने यशस्वी को अपने घर बुलाकर गिफ्ट में बैट दिया। जिसे उसने अपने ज्वाला सर के ऑफिस में सजा कर रखा है। वो उस अनमोल गिफ्ट बैट को खेलकर खराब नहीं करना चाहता, बल्कि मैंने ही कहा ये प्रेरणा देता रहेगा। 

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पिता ने कहा- जो कभी ताने मारते थे, आज साथ फोटो खिंचाते हैं
पिता भूपेंद्र ने कहा- बेटे ने किराने की दुकान पर काम किया और गोलगप्पे भी बेचे हैं। जो लोग मुझे पागल कहते थे वो आज साथ में फोटो खिंचवाते हैं। जो कहते थे कि बेटे के पीछे बर्बाद हो जाओगे, आज वही लोग पेपर हाथों में लेकर आते हैं। फक्र से कहते हैं, यशस्वी हमारा बच्चा है। बेटे ने मेरा सपना पूरा कर दिया। अब लोग पूछते हैं कि बेटे ने क्या गिफ्ट दिया? मैं यही कहता हूं कि लोग मुझे उसके नाम से जानने लगे, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा गिफ्ट हैं। 

यूं मुंबई पहुंचा यशस्वी

  • बचपन से ही यशस्वी में क्रिकेटर बनने का जुनून था। 10 साल की उम्र में उसने पिता से मुंबई जाने की जिद की। पिता भी बेटे की प्रतिभा को समझ रहे थे। इसलिए, उन्होंने उसे नहीं रोका। मुंबई के वर्ली इलाके में रहने वाले एक रिश्तेदार संतोष के यहां यशस्वी को भेज दिया। यशस्वी 5-6 महीना वहीं रहे। वह यहां से आजाद मैदान में प्रैक्टिस करने जाते थे। लेकिन, रिश्तेदार का घर छोटा था। इतनी जगह नहीं थी वहां लंबे समय तक रह पाते।
  • पिता बताते हैं, 'आजाद मैदान में कई महीने उसे ग्राउंड के बाहर ही दूसरे बच्चों के साथ खेलना पड़ा। नेट तक नहीं पहुंच पाया।' इसके बाद रिश्तेदार संतोष यशस्वी को आजाद ग्राउंड ले गए। वहां पर उनका एक परिचित ग्राउंडमैन सुलेमान था। उनसे बात करके यशस्वी को वहीं पर रहने की व्यवस्था करवाई। यहां करीब तीन साल तक यशस्वी टेंट में रहा और क्रिकेट की बारीकियां सीखीं।'
  • पिता कहते हैं कि उन तीन सालों में उसने बहुत संघर्ष किया। जमीन पर सोता था कीड़े और चींटी काटते थे। फोन करके कहता था-पापा बहुत चींटी काटती है। मैंने कहा- बेटा तकलीफ बहुत है। वापस आ जाओ। लेकिन, उसने कहा- पापा बूट पालिश कर लूंगा। लेकिन, मैं बिना कुछ बने वापस नहीं आऊंगा। ये तकलीफें पापा मुझे एक दिन आगे बढ़ाएंगी। आप परिवार का ख्याल रखिए

एक मुलाकात और बदली तकदीर
पिता के मुताबिक, 'यशस्वी 13 साल की उम्र में अंजुमन ए इस्लामिया की टीम से आजाद ग्राउंड पर लीग खेल रहा था। इस दौरान ज्वाला सर आए, उनकी शांताक्रूज में एकेडमी है। वह यशस्वी के खेल से प्रभावित हुए। उन्होंने उनसे पूछा-कोच कौन है तुम्हारा? उसने जवाब दिया कोई नहीं। यशस्वी ने कहा कि मैं बड़ों को देखकर सीखता हूं।' उन्होंने बताया कि इसके बाद ज्वाला सर ने मुझसे बात की। दो दिन बाद वह यशस्वी को अपनी एकेडमी ले गए। यह उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट था। 

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