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मुखर महिलाएं:दलित होने के नाते नहीं मिली नौकरी तो आंबेडकर से प्रेरित होकर शुरू किया YouTube चैनल, किसी ने कम पढ़कर भी निकाला अखबार

एक वर्ष पहलेलेखक: मीना
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अकबर इलाहाबादी का शेर ‘खींचो न कमानों को न तलवार निकालो/जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो’...अब यही तोप बनने की कोशिश कर रही हैं नए भारत की नई महिलाएं। वे खुद, महिलाओं के लिए और महिलाओं द्वारा वैकल्पिक मीडिया की शुरुआत करके महिलाओं के एक नए लोकतंत्र की शुरुआत कर रही हैं। मीना कोटवाल, नीतू सिंह और मीरा जाटव जैसी महिलाएं दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों के लिए पत्रकारिता कर रही हैं। वुमन भास्कर ने जानना चाहा कि ये महिलाएं समाज में किस तरह का बदलाव देखना चाहती हैं और मेनस्ट्रीम मीडिया होने के बावजूद इन्हें इस तरह के वैकल्पिक मीडिया की जरूरत क्यों पड़ी?
मेनस्ट्रीम, वैकल्पिक और बहुजन मीडिया में महिलाएं नहीं
द मूकनायक की फाउंडर मीना कोटवाल का कहना है, “बीबीसी में काम करने के दौरान मैंने जो कास्टिज्म झेला उसके बाद मैंने सोशल मीडिया पर बीबीसी में दलित पत्रकार होने की चुनौतियों और भेदभाव के बारे में लिखा। उसके बाद मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में कहीं कोई नौकरी नहीं मिली।
मेनस्ट्रीम मीडिया हो या वैकल्पिक मीडिया किसी भी मीडिया में दलित नहीं हैं। अगर आप दलित हैं और मुखर हैं तो वैसे ही आपको नौकरी नहीं दी जाती। मैंने कुछ समय फ्रीलांस काम किया। बहुजन मीडिया में भी महिलाएं नहीं थीं। 31 जनवरी को ही बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर ने ‘मूकनायक’ अखबार की शुरुआत की थी, उन्हीं के नाम में थोड़ा हेर-फेर करके मैंने 2021 में ‘द मूकनायक’ वेबसाइट और यूट्यूब चैनल शुरू किया।

मीना कोटवाल अपनी छोटी सी बेटी को गोद में लेकर रिपोर्टिंग करने निकलती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं से ही बदलाव आएगा।
मीना कोटवाल अपनी छोटी सी बेटी को गोद में लेकर रिपोर्टिंग करने निकलती हैं। उनका मानना है कि महिलाओं से ही बदलाव आएगा।

महिलाओं का समाज पहले ही हाशिए पर खड़ा है। ऊपर से दलित महिला पत्रकार होने की वजह से हमें हर स्तर पर खुद को प्रूव करना पड़ता है। दलित, आदिवासी समाज की महिलाएं पिछड़ गई हैं, ऐसे में उन्हें आगे बढ़ने पर कई स्तरों पर परेशानियों को सामना करना पड़ता है।”
मानसिक जातिवाद से लड़ाई, खुद का माइक बनाया
लोग कहते हैं कि शहरों में जातिवाद नहीं है, लेकिन शहरों में जातिवादिता लोगों के दिमाग में दिखती है, जिसे पहचानना भी मुश्किल है और उससे लड़ना भी मुश्किल। जब किसी ने अपना माइक नहीं दिया तो मैंने खुद का माइक बनाया। खुद का संस्थान बनाया। अब इस टीम में आदिवासी, ओबीसी, क्विर और पाशमांदा मुस्लिम भी हैं। मैं अपनी पत्रकारिता के जरिए सम्मान की लड़ाई लड़ रही हूं, बदले की नहीं।
हाशिए के समाज के मुद्दे उठा रहीं नीतू सिंह
लखनऊ में रहने वाली नीतू सिंह ग्रामीण महिलाओं की कहानियों को दुनिया के सामने अपने यूट्यूब चैनल के जरिए सामने ला रही हैं। वे आदिवासी महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यक समाज की महिलाओं की कहानी को भी उनकी ही जुबानी बयां करती हैं। नीतू का कहना है कि वे कानपुर देहात में पली-बढ़ीं।
सामुदायिक रेडियो और गांव कनेक्शन में काम करने के बाद उन्होंने अपना खुद का ‘शेड्स ऑफ रूरल इंडिया’ नाम से चैनल शुरू किया। अबसुदूर गांवों में जाकर महिलाओं, बच्चियों से बात करती हैं। नीतू का सपना है कि वे हर महिला की परेशानी सामने ला पाएं, उनका महिलाओं की स्थिति में सुधार ही उनका काम है।

नीतू सिंह को चमेली देवी और लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है। वे महिला पत्रकारिता के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानती हैं।
नीतू सिंह को चमेली देवी और लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है। वे महिला पत्रकारिता के लिए खुद को प्रतिबद्ध मानती हैं।

यूट्यूब बन रहा है बदलाव की बयार
यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स महिलाओं को अपनी आवाज बड़ी आबादी तक पहुंचाने में सहारे का काम कर रहे हैं। पिछले कई दिनों से हर अखबार पर यूट्यूब खुद ये दावा कर रहा है कि यूट्यूब पर क्रिएटिव उद्यमियों ने भारत में रोजगार के इतने अवसर पैदा करने में मदद की है, जो 6,83,900 फुल-टाइम नौकरियों के बराबर हैं। यूट्यूब पर महिला हो या एलजीबीटी समुदाय के लोग सभी को अपनी बात रखने का मौका मिल रहा है।
डिजिटल से इतर पारंपरिक पत्रकारिता
डिटिजल प्लेटफॉर्म से इतर पारंपरिक पत्रकारिता को क्रांति की तरह देखने वाली मीरा जाटव का कहना है कि उन्होंने जब ‘खबर लहरिया’ शुरू किया था, तब ऑनलाइन प्लेटफॉर्स इतने नहीं थे, लेकिन उन्हें महिलाओं को उनके आसपास घट रही घटनाओं और उनके हकों के लिए जागरूक करना था, इसलिए उन्होंने साल 2002 में खबर लहरिया अखबार की शुरुआत की।

खबर लहरिया की फाउंडर मीरा जाटव का कहना है कि हम पहले ऐसे मीडिया संस्थान हैं जो महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा और महिलाओं के लिए बना।
खबर लहरिया की फाउंडर मीरा जाटव का कहना है कि हम पहले ऐसे मीडिया संस्थान हैं जो महिलाओं के लिए, महिलाओं द्वारा और महिलाओं के लिए बना।

गांव की महिलाओं को बनाया पत्रकार
मीरा कहती हैं, ‘मैं चाहती हूं कि पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी, तभी हम बराबर से काम कर सकते हैं। क्योंकि महिलाएं जिस तरह से अपने घर परिवार को चलाती हैं, उसी नजरिये के साथ वह जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ को मजबूत करके लोगों के अंदर की बातों को बाहर निकाल कर औरों तक पहुंचा पाएंगी। साथ ही अपनी कलम की ताकत से लोगों की आवाज को देश और दुनिया तक पहुंचा पाएंगी।
वे कहती हैं कि अब तक खबर लहरिया जैसा कोई संस्थान नहीं था, जो महिलाओं द्वारा चलाया जाता हो। हमने गांव की महिलाओं को पत्रकार बनाया। उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया। अब वे पत्रकार बन कर खुद में बदलाव के साथ अपने परिवार और बच्चों की शिक्षा को आगे बढ़ा रही हैं। अपनी बात को खुद बोल पाती हैं, आत्मनिर्भर हो कर काम कर पाती हैं।
महिलाओं के लिए मीडिया शुरू करके इन महिलाओं ने उन्हें एक नई जमीन दी है। अब महिलाओं के मुद्दे मुखर होकर बाहर आ पाते हैं। महिलाएं हर दिशा से कह रही हैं कि अब अपनी आवाज बुलंद करने का टाइम आ गया है।